टीम एबीएन, रांची। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, रांची महानगर द्वारा चिन्मय मिशन परिसर में मातृ शक्ति प्रमुख जन गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता स्वामी परिपूर्णानंद जी ने की। गोष्ठी में परिवार, समाज एवं राष्ट्र निर्माण में मातृ शक्ति की भूमिका पर विस्तारपूर्वक चर्चा की गई।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में स्वामी परिपूर्णानंद जी ने कहा कि वर्तमान समय में परिवारों में अनेक प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं। ऐसे समय में परिवार को सशक्त बनाने के लिए गृहिणी एवं मातृ शक्ति का जागरूक और सशक्त होना अत्यंत आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि बच्चों को मोबाइल की लत से बचाते हुए उनमें संस्कार, सेवा और त्याग की भावना विकसित करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि महापुरुष समाज के सामान्य लोगों के बीच से ही निकलकर समाज को दिशा प्रदान करते हैं तथा सनातन परंपरा में संतों एवं संन्यासियों ने अपने ज्ञान और वाणी से समाज को निरंतर जागृत किया है।
उन्होंने बालिकाओं की शिक्षा पर विशेष बल देते हुए कहा कि समाज में सेवा भाव को दृढ़ करना आवश्यक है। त्याग और समर्पण से ही परिवार टिके रहते हैं। आज हिंदू समाज में बढ़ती तलाक की प्रवृत्ति चिंता का विषय है, इसलिए भारतीय परिवार व्यवस्था एवं संस्कारों को सुरक्षित रखना आवश्यक है। भारतीय संस्कृति हमें केवल अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के लिए जीना सिखाती है। कार्यक्रम के अंत में उन्होंने मातृ दिवस के अवसर पर सभी मातृ शक्तियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया।
कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के झारखंड प्रांत प्रचारक श्री गोपाल जी ने कहा कि संघ की स्थापना वर्ष 1925 में हुई थी तथा वर्ष 2025 में संघ ने अपने 100 वर्ष पूर्ण किए हैं। उन्होंने संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के जीवन एवं उनके राष्ट्र निर्माण के संकल्प पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उनका जीवन राष्ट्रभक्ति, संगठन शक्ति और समाज जागरण का प्रेरणादायी उदाहरण है।
बाल्यकाल से ही उनके मन में मातृभूमि के प्रति गहरा प्रेम था। अंग्रेजी शासन के दौरान उन्होंने देश की दयनीय स्थिति को निकट से देखा और अनुभव किया कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं है, बल्कि समाज का संगठित, संस्कारित एवं चरित्रवान होना भी आवश्यक है। इसी उद्देश्य से उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन राष्ट्र सेवा को समर्पित कर दिया।
उन्होंने कहा कि डॉ. हेडगेवार ने समाज में व्याप्त जाति, भाषा, प्रांत एवं ऊँच-नीच के भेदभाव को राष्ट्र की कमजोरी माना। उनका विश्वास था कि जब तक हिंदू समाज संगठित और जागरूक नहीं होगा, तब तक भारत पुनः विश्वगुरु नहीं बन सकेगा। इसी विचार के साथ वर्ष 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की गई, जिसका उद्देश्य व्यक्ति निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण करना था।
उन्होंने आगे कहा कि डॉ. हेडगेवार ने अनुशासन, सेवा, संस्कार एवं संगठन को समाज परिवर्तन का आधार बनाया। उन्होंने स्वयंसेवकों को केवल भाषण देने के बजाय अपने आचरण से समाज के लिए उदाहरण प्रस्तुत करने की प्रेरणा दी। उनका मानना था कि राष्ट्र निर्माण का कार्य किसी एक व्यक्ति या संस्था से नहीं, बल्कि जागरूक एवं चरित्रवान नागरिकों के सामूहिक प्रयास से संभव है।
श्री गोपाल जी ने कहा कि भारत कोई सामान्य देश नहीं, बल्कि वह पवित्र भूमि है जहाँ भगवान अवतरित होते हैं। उन्होंने प्रश्न उठाया कि इतनी समृद्ध परंपरा, ज्ञान एवं संस्कृति होने के बावजूद देश की दुर्दशा क्यों हुई। उन्होंने बताया कि प्राचीन भारत में शत-प्रतिशत साक्षरता थी तथा यहाँ की शिक्षा व्यवस्था मनुष्य निर्माण पर आधारित थी। न्यूटन के नियम का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि सत्य और विज्ञान पहले से विद्यमान होते हैं, आवश्यकता केवल उन्हें पहचानने की होती है।
उन्होंने भारतीय संस्कृति की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि हमारी संस्कृति प्रत्येक जीव में शिव का भाव देखती है। वृक्षों, नदियों एवं पर्वतों में देवत्व का बोध कर उनकी पूजा की जाती है। उन्होंने कहा कि हिंदू समाज को सशक्त बनाना समय की आवश्यकता है तथा जिन मूल्यों और परंपराओं को समाज भूलता जा रहा है, उन्हें पुनः स्मरण कराने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि मैकाले की शिक्षा पद्धति ने भारतीयों के मन में अपनी संस्कृति, धर्म एवं शिक्षा व्यवस्था के प्रति अविश्वास उत्पन्न किया। इसके बावजूद भारत में संत-समाज एवं कुटुंब व्यवस्था के कारण भारतीय संस्कृति सुरक्षित बनी रही। उन्होंने संघ द्वारा चलाए जा रहे पंच परिवर्तन विषय को विस्तार से समझाते हुए कहा कि हमें अपने जीवन में भजन, भोजन, भ्रमण, भाषा एवं स्व-बोध को अपनाने की आवश्यकता है। बच्चों को स्व-आधारित जीवन पद्धति एवं भारतीय संस्कारों से जोड़ना अत्यंत आवश्यक है।
अधिकार और कर्तव्य के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि बिजली प्राप्त करना हमारा अधिकार है, किंतु उसकी बचत करना हमारा कर्तव्य है। पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि पॉलीथिन का उपयोग एवं उसका अनुचित निस्तारण पशुओं और प्रकृति दोनों के लिए हानिकारक है।
स्वामी विवेकानंद का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि मात्र 29 वर्ष की आयु में शिकागो धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद ने विश्व को भारतीय संस्कृति एवं जीवन जीने की कला का संदेश दिया था। कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि भारतीय संस्कृति में नारी को सर्वोच्च सम्मान प्रदान किया गया है। यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता का उल्लेख करते हुए कहा गया कि जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहीं देवताओं का वास होता है।
गोष्ठी में सेवा भारती की उपाध्यक्ष रंजना श्रीवास्तव, रांची विश्वविद्यालय की कुलपति डॉ. सरोज शर्मा, डॉ. जिज्ञासा ओझा, शालिनी सचदेव, डॉ. देबरोती, डॉ. शुभ्रा बंदोपाध्याय, रंजना पांडेय सहित बड़ी संख्या में मातृ शक्ति, सामाजिक कार्यकर्ता एवं संघ के पदाधिकारी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का उद्देश्य परिवार प्रबोधन, भारतीय संस्कारों के संरक्षण एवं समाज में सकारात्मक जागरण का संदेश देना रहा। उक्त जानकारी रांची महानगर के प्रचार प्रमुख स्निग्ध कुमार रंजन ने दी ।
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