टीम एबीएन, रांची । झारखंड में गर्मी अब सिर्फ तापमान से नहीं, बल्कि बढ़ती आर्द्रता यानी ह्यूमिडिटी से और ज्यादा परेशान कर रही है। मौसम केंद्र, रांची के ताजा आंकड़ों के मुताबिक राज्य के कई जिलों में नमी का स्तर काफी ऊंचा दर्ज किया गया है, जिससे लोगों को चिपचिपी और उमस भरी गर्मी का सामना करना पड़ रहा है।
सबसे ज्यादा असर बोकारो और जमशेदपुर में देखने को मिल रहा है। बोकारो में अधिकतम आर्द्रता 92% और जमशेदपुर में 91% तक पहुंच गई है। इतनी ज्यादा नमी के कारण यहां तापमान भले ही कुछ जगहों से कम हो, लेकिन लोगों को असल में ज्यादा गर्मी महसूस हो रही है।
ज्यादा ह्यूमिडिटी की वजह से पसीना सूख नहीं रहा और उमस लगातार बेचैनी बढ़ा रही है। वहीं, चाईबासा में भी आर्द्रता 66% दर्ज की गई है, जिससे यहां भी गर्मी का असर सामान्य से ज्यादा महसूस हो रहा है।
राजधानी रांची में 57% और डाल्टनगंज में करीब 59% आर्द्रता दर्ज की गई है, जिससे यहां भी हल्की से मध्यम उमस बनी हुई है।
इन जिलों में ज्यादा गर्मी से लोग बेहाल
पिछले 24 घंटों में राज्य के कई हिस्सों में तापमान सामान्य से ऊपर दर्ज किया गया, जिससे लोगों को भीषण गर्मी का सामना करना पड़ा।
सबसे ज्यादा तापमान पलामू के डाल्टनगंज में 44.9 डिग्री सेल्सियस रिकॉर्ड किया गया, जो राज्य में सबसे अधिक रहा। इसके अलावा चाईबासा में 42.4 डिग्री और रांची में 40.2 डिग्री तापमान दर्ज किया गया। गुमला में भी पारा 40.4 डिग्री तक पहुंच गया, जिससे यह साफ है कि दक्षिणी और मध्य झारखंड के कई इलाके हीट वेव जैसी स्थिति झेल रहे हैं।
इन जिलों में सामान्य से ज्यादा तापमान
रिपोर्ट के अनुसार, रांची में अधिकतम तापमान सामान्य से 3.5 डिग्री अधिक रहा, जबकि डाल्टनगंज में 4.0 डिग्री की बढ़ोतरी दर्ज की गई। चाईबासा में भी तापमान सामान्य से 4.1 डिग्री ऊपर रहा, जो गर्मी की तीव्रता को दर्शाता है।
हालांकि जमशेदपुर में अधिकतम तापमान 37.5 डिग्री रहा, जो सामान्य से थोड़ा कम है। वहीं बोकारो में भी 35.1 डिग्री दर्ज किया गया। लेकिन अधिकांश जिलों में न्यूनतम तापमान भी सामान्य से ऊपर बना हुआ है, जिससे रात में भी गर्मी से राहत नहीं मिल रही।
टीम एबीएन, रांची। झारखंड के कई हिस्सों में भीषण गर्मी का असर जारी है। पिछले 24 घंटों के दौरान कुछ स्थानों पर हल्की बारिश और गरज के साथ छींटे भी दर्ज किए गए हैं, लेकिन इससे गर्मी में खास राहत नहीं मिली है। राज्य में सबसे अधिक तापमान पलामू के डालटनगंज में 43.4 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। वहीं सबसे कम न्यूनतम तापमान गुमला में 17.7 डिग्री सेल्सियस रहा।
जमशेदपुर में अधिकतम तापमान 42.4 डिग्री और न्यूनतम 25.6 डिग्री दर्ज किया गया, जहां 0.2 मिमी बारिश भी हुई। चाईबासा में अधिकतम 42.4 और न्यूनतम 25.8 डिग्री, सरायकेला में अधिकतम 42.4 और न्यूनतम 23.0 डिग्री, बोकारो में अधिकतम 42.1 और न्यूनतम 22.1 डिग्री दर्ज किया गया।
इसके अलावा पाकुड़ में अधिकतम 41.1 और न्यूनतम 25.4 डिग्री, रांची में अधिकतम 38.6 और न्यूनतम 22.8 डिग्री, खूंटी में अधिकतम 37.8 और न्यूनतम 19.7 डिग्री, लोहरदगा में अधिकतम 37.7 और न्यूनतम 22.0 डिग्री और लातेहार में अधिकतम 34.6 और न्यूनतम 24.0 डिग्री तापमान रिकॉर्ड किया गया।
मौसम विभाग ने 22 और 23 अप्रैल को राज्य के उत्तर पूर्वी और मध्य हिस्सों के कुछ जिलों में हीट वेव की चेतावनी जारी की है। इस दौरान बोकारो, धनबाद, जामताड़ा और दुमका जिले प्रभावित हो सकते हैं।
मौसम विभाग के अनुसार, 24 अप्रैल से मौसम में बदलाव के संकेत हैं। इस दिन देवघर, धनबाद, दुमका, गिरिडीह, गोड्डा, जामताड़ा, पाकुड़ और साहिबगंज में गर्जन, वज्रपात और 30 से 40 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से तेज हवा चलने की संभावना है।
25 अप्रैल को रांची, बोकारो, गुमला, हजारीबाग, खूंटी, कोडरमा, लोहरदगा, रामगढ़ सहित मध्य भाग के जिलों में, साथ ही पूर्वी और पश्चिमी सिंहभूम, सिमडेगा और सरायकेला खरसावां जैसे दक्षिणी जिलों में 40 से 50 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से हवाएं चलने और बारिश होने के आसार हैं। उत्तर पूर्वी जिलों में भी इसका असर देखने को मिलेगा। 26 से 28 अप्रैल के बीच पूरे राज्य में आंशिक रूप से बादल छाये रहेंगे और कई स्थानों पर हल्की से मध्यम बारिश या गरज के साथ छींटे पड़ सकते हैं।
राजधानी रांची में 22 और 23 अप्रैल को मौसम शुष्क बना रहेगा और आसमान साफ रहेगा। इस दौरान अधिकतम तापमान 39 से 40 डिग्री सेल्सियस के बीच रहने की संभावना है। हालांकि 25 से 28 अप्रैल के बीच रांची में भी बादल छाने और गर्जन के साथ बारिश होने के संकेत हैं।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। धरती आज केवल गर्म नहीं हो रही, वह मानो भीतर ही भीतर धधक रही है और यह आग प्राकृतिक नहीं, मानवीय लालसाओं की उपज है। हर साल 22 अप्रैल को मनाया जाने वाला विश्व पृथ्वी दिवस मानव सभ्यता के सामने खड़े उस गहन संकट की चेतावनी है, जिसे हमने स्वयं अपने हाथों से जन्म दिया है। विडंबना है कि जलवायु परिवर्तन पर वैश्विक मंचों (दोहा, कोपेनहेगन, कानकुन) में वर्षों से चिंतन, विमर्श और संकल्पों की पुनरावृत्ति होती रही है किंतु धरातल पर परिवर्तन नगण्य है।
विकास की परिभाषा जब केवल आर्थिक वृद्धि, उपभोग और संसाधनों के अधिकतम दोहन तक सीमित हो जाये तो प्रकृति का संतुलन बिगड़ना अपरिहार्य हो जाता है। पिछले कुछ वर्षों में प्रकृति अपने विकराल रूप के माध्यम से लगातार संकेत दे रही है कि संतुलन की सीमा लांघी जा चुकी है। कहीं भीषण सूखा, कहीं अनियंत्रित वर्षा, कहीं असामान्य ठंड और कहीं प्रचंड गर्मी, मौसम अब अनुमान का विषय नहीं रहा। उत्तरी ध्रुव के तापमान में असामान्य वृद्धि और पर्वतीय क्षेत्रों में बढ़ती गर्माहट इस संकट की गंभीरता को और स्पष्ट करती है।
विकास के नाम पर हम प्रकृति से भयानक तरीके से जिस तरह का खिलवाड़ कर रहे हैं, उसके परिणामस्वरूप मौसम का मिजाज कब कहां किस कदर बदल जाए, कुछ भी भविष्यवाणी करना मुश्किल होता जा रहा है। ग्लोबल वार्मिंग के चलते दुनियाभर में मौसम का मिजाज किस कदर बदल रहा है, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि उत्तरी ध्रुव के तापमान में एक-दो नहीं बल्कि करीब 30 डिग्री तक की बढ़ोतरी देखी गयी।
मौसम की प्रतिकूलता साल-दर-साल किस कदर बढ़ती जा रही है, यह इसी से समझा जा सकता है कि कहीं भयानक सूखा तो कहीं बेमौसम अत्यधिक वर्षा, कहीं जबरदस्त बर्फबारी तो कहीं कड़ाके की ठंड, कभी-कभार ठंड में गर्मी का अहसास तो कहीं तूफान और कहीं भयानक प्राकृतिक आपदाएं, ये सब प्रकृति के साथ हमारे खिलवाड़ के ही दुष्परिणाम हैं और हमें यह सचेत करने के लिए पर्याप्त हैं कि अगर हम इसी प्रकार प्रकृति के संसाधनों का बुरे तरीके से दोहन करते रहे तो हमारे भविष्य की तस्वीर कैसी होने वाली है।
जलवायु परिवर्तन से निपटने के नाम पर वैश्विक चिंता व्यक्त करने से आगे हम शायद कुछ करना ही नहीं चाहते। हम यह समझना ही नहीं चाहते कि पहाड़ों का सीना चीरकर हरे-भरे जंगलों को तबाह कर हम जो कंक्रीट के जंगल विकसित कर रहे हैं, वह वास्तव में विकास नहीं बल्कि विकास के नाम पर हम अपने विनाश का ही मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। पहाड़ों में बढ़ती गर्माहट के चलते हमें अक्सर घने वनों में भयानक आग लगने की खबरें सुनने को मिलती रहती हैं।
पहाड़ों की इसी गर्माहट का सीधा असर निचले मैदानी इलाकों पर पड़ता है, जहां का पारा अब हर वर्ष बढ़ता जा रहा है। धरती का तापमान यदि इसी प्रकार साल-दर-साल बढ़ता रहा तो आने वाले वर्षों में हमें इसके गंभीर परिणाम भुगतने को तैयार रहना होगा। हमें यह बखूबी समझ लेना होगा कि जो प्रकृति हमें उपहारस्वरूप शुद्ध हवा, शुद्ध पानी, शुद्ध मिट्टी तथा ढेरों जनोपयोगी चीजें दे रही है, अगर मानवीय क्रियाकलापों द्वारा पैदा किए जा रहे पर्यावरण संकट के चलते प्रकृति कुपित होती है तो उसे सबकुछ नष्ट कर डालने में पलभर की देर नहीं लगेगी।
यह केवल आंकड़ों की कहानी नहीं बल्कि उस असंतुलन की सजीव अभिव्यक्ति है, जिसे हमने तथाकथित विकास के नाम पर जन्म दिया है। वनों की अंधाधुंध कटाई ने न केवल जैव विविधता को संकट में डाला है बल्कि कार्बन संतुलन को भी गंभीर रूप से प्रभावित किया है। परिणामस्वरूप, वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा खतरनाक स्तर तक पहुंच गई है। सवाल है कि धरती का तापमान बढ़ते जाने के प्रमुख कारण क्या हैं? इसका सबसे अहम कारण है ग्लोबल वार्मिंग, जो तमाम तरह की सुख-सुविधाएं व संसाधन जुटाने के लिए किये जाने वाले मानवीय क्रियाकलापों की ही देन है।
पेट्रोल और डीजल आधारित ऊर्जा स्रोतों ने वातावरण में कार्बन डाइआक्साइड का स्तर इतना बढ़ा दिया है कि पृथ्वी की तापीय संतुलन प्रणाली चरमराने लगी है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि वातावरण में पहले की अपेक्षा 30 फीसदी ज्यादा कार्बन डाईआॅक्साइड मौजूद है, जिसकी मौसम का मिजाज बिगाड़ने में अहम भूमिका है। पेड़-पौधे कार्बन डाईआॅक्साइड को अवशोषित कर पर्यावरण संतुलन बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं लेकिन पिछले कुछ दशकों में वन क्षेत्रों को बड़े पैमाने पर कंक्रीट के जंगलों में तब्दील किया जाता रहा है।
धरती के बढ़ते तापमान का प्रभाव अब केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रहा बल्कि यह मानव अस्तित्व के लिए भी चुनौती बन चुका है। ध्रुवीय क्षेत्रों में तेजी से पिघलती बर्फ समुद्र के जलस्तर को बढ़ा रही है, जिससे विश्व के कई तटीय शहरों के डूबने का खतरा मंडरा रहा है। आने वाले दशकों में तापमान में संभावित 4-5 डिग्री की वृद्धि न केवल जंगलों में आग की घटनाओं को बढ़ाएगी बल्कि विशाल भूभाग को सूखे और मरुस्थलीकरण की ओर धकेल देगी।
यह परिदृश्य कोई भविष्यवाणी नहीं बल्कि वर्तमान संकेतों का तार्किक विस्तार है। इस संकट के मूल में केवल औद्योगिक गतिविधियां ही नहीं, अनियंत्रित जनसंख्या वृद्धि और उपभोगवादी जीवनशैली भी प्रमुख कारण हैं। बढ़ती आबादी की आवश्यकताओं ने प्राकृतिक संसाधनों पर असहनीय दबाव डाला है। पृथ्वी का क्षेत्रफल सीमित है लेकिन मानव की इच्छाएं असीमित। यही असंतुलन आज वैश्विक पर्यावरणीय संकट का मूल कारण बन चुका है।
प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी स्टीफन हॉकिंग की चेतावनी कि यदि यही प्रवृत्ति जारी रही तो पृथ्वी भविष्य में आग का गोला बन सकती है, केवल एक वैज्ञानिक टिप्पणी नहीं बल्कि गंभीर भविष्यसूचक संकेत है। अब प्रश्न यह नहीं कि संकट है या नहीं बल्कि यह है कि क्या हम इसे स्वीकार कर समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाने को तैयार हैं? पृथ्वी दिवस हमें केवल जागरूकता का संदेश नहीं देता बल्कि आत्ममंथन का अवसर भी प्रदान करता है। आवश्यकता इस बात की है कि विकास की अवधारणा को पुनर्परिभाषित किया जाये, जहां आर्थिक उन्नति के साथ पर्यावरणीय संतुलन को भी समान महत्व मिले।
नवीकरणीय ऊर्जा, वनीकरण, जल संरक्षण और सतत विकास की नीतियां अब विकल्प नहीं, अनिवार्यता बन चुकी हैं। यदि हम अब भी नहीं चेते तो आने वाली पीढ़ियां हमें उस पीढ़ी के रूप में याद करेंगी, जिसने अपनी सुविधाओं के लिए पूरी पृथ्वी को संकट में डाल दिया। धरती हमारी विरासत नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों से लिया गया उधार है और इस उधार को सुरक्षित लौटाना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
टीम एबीएन, रांची। रांची सहित राज्यभर में अप्रैल के मध्य में ही गर्मी ने अपने तीखे तेवर दिखाने शुरू कर दिये हैं। रांची का अधिकतम तापमान 38.8 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जो पिछले 24 घंटे में 1.7 डिग्री की बढ़ोतरी दर्शाता है। सुबह की शुरुआत से ही उमस भरी गर्मी लोगों को परेशान कर रही है और दिन चढ़ने के साथ इसका असर और तेज हो रहा है।
तेज धूप और गर्म हवाओं के कारण दिन के समय लोगों का बाहर निकलना मुश्किल हो गया है। हालांकि सुबह और रात के समय मौसम अपेक्षाकृत सामान्य बना हुआ है, लेकिन दोपहर की गर्मी लोगों को बेहाल कर रही है। इसका असर बाजारों और सड़कों पर भी दिख रहा है, जहां दोपहर में भीड़ कम हो गयी है।
राज्य के अन्य जिलों में भी गर्मी का असर तेजी से बढ़ रहा है। मेदिनीनगर में तापमान 43 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है, जो इस सीजन का अब तक का सबसे अधिक तापमान है। वहीं जमशेदपुर में 41.2 डिग्री सेल्सियस तापमान दर्ज किया गया, जिसमें 4.8 डिग्री की उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है।
मौसम विभाग के अनुसार रांची, पलामू, कोडरमा, हजारीबाग और जमशेदपुर में तापमान 40 से 44 डिग्री सेल्सियस के बीच रहने की संभावना है। इसके अलावा बोकारो, देवघर, धनबाद और गिरिडीह जैसे जिलों में तापमान 38 से 42 डिग्री सेल्सियस के बीच रह सकता है, जिससे लू जैसे हालात बन सकते हैं।
फिलहाल गर्म और शुष्क बना रहेगा मौसम
विभाग ने बताया है कि झारखंड का मौसम फिलहाल गर्म और शुष्क बना रहेगा। पलामू, जमशेदपुर, कोडरमा, बोकारो, देवघर, हजारीबाग और धनबाद में दोपहर के समय तेज गर्मी और लू चलने की आशंका है।
वहीं गोड्डा, पाकुड़ और साहिबगंज में आंशिक बादल छाए रह सकते हैं तथा हल्की बारिश की संभावना भी जताई गई है। इस दौरान 40 से 50 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हवाएं चल सकती हैं और अधिकांश मैदानी इलाकों में तापमान सामान्य से 2 से 3 डिग्री अधिक रहने का अनुमान है।
मौसम विभाग ने 21 अप्रैल को राज्य के कई हिस्सों में लू चलने की चेतावनी जारी की है, जिसका असर 23 अप्रैल तक बना रह सकता है। ऐसे में लोगों को दोपहर 12 बजे से 4 बजे के बीच विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी गयी है।
लोगों को अधिक पानी पीने, ओआरएस का सेवन करने तथा हल्के और ढीले कपड़े पहनने की सलाह दी गई है। वहीं 24 अप्रैल को राज्य के उत्तर-पूर्वी हिस्सों में हल्की बारिश की संभावना है, जिससे तापमान में कुछ राहत मिल सकती है। तब तक लोगों को भीषण गर्मी से बचाव के उपाय अपनाने की आवश्यकता है।
टीम एबीएन, रांची। रांची के पुंदाग स्थित श्री राधा कृष्ण प्रणामी मंदिर परिसर में अक्षय तृतीया का पावन पर्व इस वर्ष अत्यंत हर्षोल्लास, श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ मनाया गया। संत शिरोमणि परमहंस स्वामी सदानंद महाराज के सानिध्य में श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट द्वारा आयोजित इस धार्मिक कार्यक्रम ने श्रद्धालुओं के मन को आध्यात्मिक ऊर्जा से ओत-प्रोत कर दिया।
कार्यक्रम का शुभारंभ प्रात:कालीन पूजा-अर्चना से हुआ, जिसमें मंदिर के पुजारी पंडित अरविंद पांडेय ने विधिवत मंत्रोच्चार के साथ भगवान श्री राधा-कृष्ण की पूजा संपन्न कराई। इस पावन अवसर पर श्री राधा रानी का विशेष श्रृंगार किया गया, जो कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण रहा।
उन्हें नवीन भगवा पोशाक एवं जड़ित आभूषणों से सुसज्जित किया गया, जिसकी दिव्यता और सौंदर्य ने श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। पूरे मंदिर परिसर में भक्ति का अद्भुत वातावरण व्याप्त था। ट्रस्ट के सदस्यों द्वारा सुमधुर भजनों की प्रस्तुति दी गई, जिससे वातावरण भक्तिमय हो उठा। राधे-राधे और श्याम नाम के संकीर्तन से श्रद्धालु भाव-विभोर हो गए और सभी ने सामूहिक रूप से भक्ति रस में डूबकर ईश्वर का स्मरण किया।
इस अवसर पर भगवान को विविध प्रकार के भोग अर्पित किये गये। प्रसाद स्वरूप बेसन के लड्डू, केसरिया पेड़ा, मेवा, फल एवं वेजिटेबल खिचड़ी का विशेष भोग लगाया गया। साथ ही शीतल पेय के रूप में शरबत भी भगवान को अर्पित किया गया। पूजा के उपरांत थालियों में दीप सजाकर भव्य सामूहिक महाआरती का आयोजन किया गया, जिसमें सैकड़ों श्रद्धालुओं ने एक साथ भाग लिया। आरती के दौरान पूरा वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से भर उठा।
महाआरती के पश्चात उपस्थित श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद का वितरण किया गया। श्रद्धालुओं ने भक्ति भाव के साथ प्रसाद ग्रहण किया और इस पुण्य अवसर का लाभ उठाया। कार्यक्रम के दौरान ट्रस्ट के उपाध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद अग्रवाल एवं प्रवक्ता संजय सर्राफ ने अक्षय तृतीया के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि अक्षय तृतीया का पर्व सनातन धर्म में अत्यंत शुभ और पुण्यदायी माना जाता है।
इस दिन किए गए दान, जप, तप एवं धार्मिक कार्य अक्षय फल प्रदान करते हैं, अर्थात इनका पुण्य कभी समाप्त नहीं होता। यही कारण है कि इस दिन धार्मिक आयोजनों का विशेष महत्व होता है। इस भव्य आयोजन ने न केवल धार्मिक आस्था को सुदृढ़ किया, बल्कि समाज में एकता, सेवा और भक्ति की भावना को भी प्रोत्साहित किया।
मौके पर डूंगरमल अग्रवाल, निर्मल जालान, राजेंद्र अग्रवाल, मनोज कुमार चौधरी, सज्जन पाड़िया, पूरणमल सर्राफ, संजय सर्राफ, सुनील पोद्दार, सुरेश अग्रवाल, मधुसूदन जाजोदिया, विष्णु सोनी, अंजनी अग्रवाल, मनीष सोनी, पवन पोद्दार, सुरेश भगत, आदि उपस्थित थे। उक्त जानकारी श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रवक्ता सह मीडिया प्रभारी संजय सर्राफ ने दी।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। हिंदी साहित्य भारती के उपाध्यक्ष सह झारखंड पेरेंट्स एसोसिएशन के प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि हर वर्ष 22 अप्रैल को विश्वभर में विश्व पृथ्वी दिवस मनाया जाता है। यह दिन हमारी धरती के संरक्षण, पर्यावरण संतुलन और प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग के प्रति जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से समर्पित है।
पृथ्वी दिवस का प्रारंभ वर्ष 1970 में अमेरिका के सीनेटर गेलॉर्ड नेल्सन के प्रयासों से हुआ था। बढ़ते प्रदूषण और पर्यावरणीय संकट को देखते हुए उन्होंने एक जन आंदोलन की शुरुआत की, जो आज वैश्विक अभियान का रूप ले चुका है। विश्व पृथ्वी दिवस मनाने का मुख्य उद्देश्य लोगों को यह समझाना है कि पृथ्वी ही हमारा एकमात्र घर है और इसका संरक्षण हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।
वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग, वनों की कटाई, जैव विविधता का ह्रास और प्रदूषण जैसी समस्याएं पृथ्वी के अस्तित्व के लिए गंभीर खतरा बन चुकी हैं। ऐसे में यह दिवस हमें चेताता है कि यदि अभी ठोस कदम नहीं उठाये गये, तो आने वाली पीढ़ियों को गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। इस दिवस की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि जनभागीदारी पर आधारित एक वैश्विक आंदोलन है।
दुनिया भर के 190 से अधिक देशों में करोड़ों लोग इस दिन वृक्षारोपण, स्वच्छता अभियान, प्लास्टिक मुक्त अभियान और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी विभिन्न गतिविधियों में भाग लेते हैं। स्कूलों, कॉलेजों, सामाजिक संगठनों और सरकारी संस्थाओं द्वारा जागरूकता कार्यक्रम, रैलियां और सेमिनार आयोजित किए जाते हैं। विश्व पृथ्वी दिवस का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य सतत विकास को बढ़ावा देना भी है।
इसका अर्थ है कि हम अपने वर्तमान की आवश्यकताओं को इस प्रकार पूरा करें कि भविष्य की पीढ़ियों के संसाधनों पर कोई नकारात्मक प्रभाव न पड़े। जल संरक्षण, ऊर्जा की बचत, पुनर्चक्रण और हरित ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा देना इसी दिशा में आवश्यक कदम हैं।आज के डिजिटल और औद्योगिक युग में पर्यावरण पर बढ़ता दबाव चिंता का विषय है। वायु और जल प्रदूषण के कारण मानव स्वास्थ्य पर भी गंभीर प्रभाव पड़ रहा है।
ऐसे में पृथ्वी दिवस हमें अपने दैनिक जीवन में छोटे-छोटे बदलाव लाने की प्रेरणा देता है, जैसे-प्लास्टिक का कम उपयोग, पेड़ लगाना, जल की बचत करना और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार व्यवहार अपनाना। अंतत: विश्व पृथ्वी दिवस केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी का निरंतर स्मरण है। यदि हम सभी मिलकर पृथ्वी की रक्षा के लिए संकल्प लें और उसे व्यवहार में उतारें, तभी हम एक स्वच्छ, हरित और सुरक्षित भविष्य की कल्पना को साकार कर सकते हैं। पृथ्वी की सुरक्षा ही मानवता की सुरक्षा है,यही इस दिवस का मूल संदेश है।
टीम एबीएन, रांची। रांची सहित राज्य के अलग-अलग हिस्सों में तेज धूप और पछुआ हवा के प्रभाव से तापमान बढ़ा है। इस तपिश भरी गर्मी की वजह से बड़ी संख्या में लोग बीमार होने लगे हैं। रांची के सदर अस्पताल और रिम्स के ओपीडी में सामान्य दिनों की अपेक्षा डेढ़ गुणा मरीजों की संख्या बढ़ी है।
रांची सदर अस्पताल के मेडिसीन विभाग के डॉक्टर लक्ष्मीकांत साय ने बताया कि ज्यादातर लोग तेज गर्मी और धूप की वजह से बीमार पड़ कर अस्पताल पहुंच रहे हैं। डॉ लक्ष्मीकांत साय ने कहा कि जो मरीज पहुंच रहे हैं, उसमें से ज्यादा लोग बुखार, शरीर में दर्द, सुस्ती, डायरिया जैसी शिकायत के साथ अस्पताल पहुंच रहे हैं। उन्होंने बताया कि गर्मी को लेकर लोगों को विशेष सावधानी बरतने और खानपान पर विशेष ध्यान देने की सलाह दी है।
अल्बर्ट एक्का चौक पर वर्षों से गोला चुस्की बेच रहे सचिन कहते हैं कि कुछ दिनों से गर्मी बढ़ने के साथ ही उनकी बिक्री बढ़ गयी है। उन्होंने बताया कि हर आइसक्रीम बेचने वाला चाहता है कि ऐसे ही उसकी बिक्री बनीं रहे।
शरीर में पानी की कमी, उल्टी, तेज बुखार, कमजोरी, सिर दर्द, चक्कर आना, डायरिया, हृदयाघात, मस्तिष्काघात, कार्डियोवास्कुलर जटिलताएं जैसे लक्षण के साथ परेशानी बढ़ सकती है। वहीं, इस मौसम में त्वचा पर रैशेज सहित अन्य समस्याएं होने का भी खतरा बढ़ जाता है।
लू यानी हीट स्ट्रोक से बचाव के लिए बेहद जरूरी है कि अपने शरीर को हाइड्रेट रखें यानी शरीर में पानी और मिनरल की कमी न होने दें। इसके लिए सबसे ज्यादा जरूरी ज्यादा पानी पीना, समय-समय पर स्वस्थ रहने के बाद भी ओआरएस का घोल ले सकते हैं। दोपहर 12 बजे से शाम के 03 बजे तक घर से बाहर न निकलें। अगर बेहद जरूरी काम हो तो पूरे शरीर को ढंककर ही बाहर निकले ताकि गर्म हवा से सीधे शरीर का एक्सपोजर न हो।
लू लगे व्यक्ति को छांव में लिटा दें, ठंडे गीले कपड़े से शरीर को बार बार पोंछे या ठंडे पानी से लू लगे व्यक्ति को नहलायें। अगर इसके बाद भी अगर व्यक्ति की सेहत में सुधार न दिखें तो बिना समय गंवाये अपने नजदीकी अस्पताल ले जायें। गर्मी के दिनों में शरीर को हाइड्रेट करके रखना बेहद जरूरी है। इसलिए ज्यादा से ज्यादा तरल खाद्य पदार्थो को अपने आहार में शामिल करें।
नमक पानी का घोल (ओआरएस), छाछ, नींबू पानी, कच्चा आम का शर्बत, लस्सी, तरबूज, खरबूज, खीरा, ककड़ी का उपयोग करें। तला-भुना, ज्यादा मसालेदार, बासी भोजन से परहेज करें। कोल्ड ड्रिंक से भी दूरी बनाएं, क्योंकि यह गर्मी के दिनों में थोड़ी और क्षणिक राहत तो देता है लेकिन स्वास्थ्य के लिए सही नहीं है।
टीम एबीएन, रांची। जमशेदपुर के चाकुलिया में झारखंड का सबसे बड़ा पार्क बनकर तैयार हो गया है। इस पार्क को वन विभाग ने 23 करोड़ रुपये की लागत से बनाया है, जो 75 एकड़ में फैला हुआ है। जानकारी के मुताबिक, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन जल्द ही चाकुलिया के इकोलॉजिकल डायवर्सिटी पार्क का उद्घाटन करेंगे।
इस पार्क में बच्चों के साथ बुजुर्गों के लिए विशेष सुविधा दी गयी है और पूरे पार्क में झारखंड की संस्कृति देखने को मिलेगी। यह पार्क सैलानियों के बीच आकर्षण का केंद्र होगा।
झारखंड उड़ीसा बंगाल के बॉर्डर पर चाकुलिया में बना यह पार्क सिर्फ घूमने के लिए नहीं, बल्कि झारखंड की संस्कृति के साथ-साथ यहां सैलानियों के लिए रहने के लिए भी व्यवस्था की गयी है। पार्क कॉटेज बनाये गये हैं, जहां सैलानी आकर अपने पूरे परिवार के साथ रूक कर पार्क का आनंद ले सकेंगे।
जमशेदपुर वन प्रमंडल के वन पदाधिकारी सभा आलम अंसारी ने कहा कि पार्क को घूमने में 2 दिन का समय लगेगा, इस पार्क में बच्चों के लिए अलग से क्षेत्र बनाया गया है। वहीं बुजुर्गों के लिए भी योग वॉकिंग स्टेप भी लगाया गया है। साथ ही अगर सैलानी दूर दराजे से आते हैं तो उनके रहने के लिए कॉटेज का भी निर्माण किया गया है।
पूरे पार्क में घूमने के लिए ई रिक्शा भी रखा गया है। ताकि इतने बड़े पार्क में सैलानी ई रिक्शा से भी घूम सकते हैं। वन अधिकारी ने बताया कि झारखंड की कला संस्कृति को भी लोग जान सकेंगे, समझ सकेंगे। उसके लिए भी एक अलग से क्षेत्र तैयार किया गया है।
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