एबीएन एडिटोरियल डेस्क। शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्- अर्थात शरीर ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का प्रथम साधन है। हजारों वर्ष पहले भारत के ऋषि-मुनियों ने इस सत्य को समझा और स्वस्थ शरीर के लिए एक सम्पूर्ण विज्ञान विकसित किया, जिसका नाम है आयुर्वेद। आयुर्वेद दो शब्दों से बना है- आयु: यानी जीवन और वेद यानी ज्ञान। अर्थात आयुर्वेद का शाब्दिक अर्थ है जीवन का विज्ञान। यह केवल रोगों की चिकित्सा नहीं, बल्कि स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा और रोगी के रोग का शमन करने की समग्र पद्धति है।
आयुर्वेद की उत्पत्ति वैदिक काल में हुई। चरक संहिता, सुश्रुत संहिता और अष्टांग हृदय इसके तीन प्रमुख ग्रंथ हैं। महर्षि चरक को चिकित्सा का पितामह और महर्षि सुश्रुत को शल्य चिकित्सा का जनक कहा जाता है। सुश्रुत संहिता में 300 से अधिक शल्य क्रियाओं और 120 शल्य उपकरणों का वर्णन मिलता है, जो दर्शाता है कि 2500 वर्ष पहले भी भारत में सर्जरी कितनी उन्नत थी।
आयुर्वेद का मूल आधार है त्रिदोष सिद्धांत- वात, पित्त और कफ। ये तीनों दोष पंचमहाभूतों यानी पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से बने हैं। जब ये तीनों दोष संतुलन में रहते हैं, तो शरीर स्वस्थ रहता है। असंतुलन ही रोग का कारण बनता है। आयुर्वेद हर व्यक्ति की प्रकृति को अलग मानता है। किसी की वात प्रकृति है, किसी की पित्त या कफ। इसलिए एक ही रोग की दवा हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकती है। यह वैयक्तिक चिकित्सा की अवधारणा आज का आधुनिक विज्ञान भी अपना रहा है।
आधुनिक एलोपैथी मुख्यत: रोग होने के बाद उपचार करती है। आयुर्वेद का मूल मंत्र है- स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणं, आतुरस्य विकार प्रशमनं। यानी पहले स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करो, फिर रोगी का इलाज करो। इसके लिए आयुर्वेद ने दिनचर्या, ऋतुचर्या और आहार-विहार के नियम बताए हैं। सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठना, उषापान, योग, तिल के तेल से अभ्यंग, सात्विक आहार, समय पर सोना- ये सब रसायन की तरह काम करते हैं और रोगों को पास नहीं आने देते।
कोविड-19 महामारी ने पूरी दुनिया को फिर से प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्युनिटी का महत्व समझाया। उसी दौर में भारत सरकार के आयुष मंत्रालय द्वारा बताये गये काढ़े, हल्दी वाला दूध, गिलोय, अश्वगंधा, तुलसी जैसे आयुर्वेदिक उपाय घर-घर में अपनाए गए। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी 2022 में गुजरात के जामनगर में ग्लोबल सेंटर फॉर ट्रेडिशनल मेडिसिन की स्थापना की, जो आयुर्वेद की वैश्विक स्वीकार्यता का प्रमाण है। आज 2026 में आयुर्वेदिक उत्पादों का वैश्विक बाजार 10 लाख करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच चुका है।
आज की भागदौड़, तनाव, जंक फूड और प्रदूषण ने मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा, अनिद्रा जैसी लाइफस्टाइल डिजीज को जन्म दिया है। एलोपैथी इनमें लक्षणों को नियंत्रित करती है, पर आयुर्वेद जड़ पर काम करता है। पंचकर्म जैसी शोधन चिकित्सा शरीर से विषाक्त तत्व निकालकर दोषों को संतुलित करती है। शिरोधारा, अभ्यंग, नस्य जैसी क्रियाएं तनाव और माइग्रेन में अत्यंत लाभकारी हैं। त्रिफला, अश्वगंधा, ब्राह्मी, शतावरी जैसे रसायन शरीर और मन दोनों को बल देते हैं।
आयुर्वेद के सामने सबसे बड़ी चुनौती है मानकीकरण और वैज्ञानिक प्रमाण की। हर काढ़ा, हर भस्म एक जैसी गुणवत्ता की हो, इसके लिए आधुनिक शोध, क्लिनिकल ट्रायल और गुणवत्ता नियंत्रण जरूरी है। अच्छी बात है कि आईआईटी, एम्स और सीएसआईआर जैसे संस्थान अब आयुर्वेद पर शोध कर रहे हैं। नयी शिक्षा नीति में भी आयुर्वेद को स्कूली पाठ्यक्रम से जोड़ा जा रहा है ताकि नयी पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ सके।
आयुर्वेद कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि अनुभव और परीक्षण पर आधारित विज्ञान है। यह हमें सिखाता है कि हम प्रकृति का हिस्सा हैं, प्रकृति से अलग नहीं। जब हम प्रकृति के नियमों के विरुद्ध जाते हैं, तो रोग आते हैं। आज जब पूरी दुनिया होलिस्टिक हेल्थ और सस्टेनेबल लिविंग की बात कर रही है, तो आयुर्वेद के पास हर प्रश्न का उत्तर है। आवश्यकता है इसे अंधानुकरण नहीं, बल्कि विवेक और विज्ञान के साथ अपनाने की। जैसा कि चरक संहिता में कहा गया है — धर्मार्थ काम मोक्षाणा मारोग्यं मूलमुत्तमम्। अर्थात धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का मूल आधार आरोग्य ही है। आइये, आयुर्वेद को अपनाकर हम स्वस्थ भारत, समर्थ भारत के स्वप्न को साकार करें।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारतीय शेयर बाजार का प्रदर्शन फीफा वर्ल्ड कप के वर्षों में आमतौर पर मजबूत रहा है। पिछले तीन दशकों के आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि वर्ल्ड कप आयोजित होने वाले अधिकांश वर्षों में बीएसई सेंसेक्स ने निवेशकों को सकारात्मक रिटर्न दिया है।
आंकड़ों के अनुसार, वर्ल्ड कप वाले वर्षों में सेंसेक्स का रिटर्न 3.5 फीसदी से लेकर 46.7 फीसदी तक रहा है। वर्ष 2002 में जापान और दक्षिण कोरिया की संयुक्त मेजबानी में आयोजित टूर्नामेंट के दौरान सेंसेक्स ने करीब 3.5 फीसदी की बढ़त दर्ज की थी।
वहीं 2006 में जर्मनी में हुए फीफा वर्ल्ड कप के दौरान भारतीय बाजार ने सबसे शानदार प्रदर्शन किया और सेंसेक्स लगभग 46.7 फीसदी उछल गया। हालांकि इस ट्रेंड में एक बड़ा अपवाद वर्ष 1998 रहा। उस साल सेंसेक्स में करीब 16.5 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई थी। बाजार पर उस समय कई घरेलू और वैश्विक घटनाओं का असर देखने को मिला था।
मई 1998 में भारत द्वारा किये गये पोखरण परमाणु परीक्षणों के बाद अमेरिका, जापान सहित कई देशों ने आर्थिक और व्यापारिक प्रतिबंध लगाये थे। इन घटनाओं से निवेशकों की धारणा प्रभावित हुई और बाजार दबाव में आ गया। बाद में ये प्रतिबंध हटा लिये गये, लेकिन उस वर्ष बाजार पर इसका असर साफ दिखाई दिया।
वर्ष 1998 भारतीय राजनीति के लिए भी महत्वपूर्ण रहा। आम चुनावों में भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में गठबंधन सरकार का गठन हुआ। राजनीतिक और आर्थिक घटनाक्रमों के बीच शेयर बाजार ने उस वर्ष कमजोर प्रदर्शन किया।
वर्ष 2026 में अब तक भारतीय शेयर बाजार का प्रदर्शन 1998 की याद दिलाता नजर आ रहा है। सेंसेक्स साल की शुरुआत से करीब 13 फीसदी तक टूटकर 73,900 के आसपास पहुंच गया है। बाजार में यह गिरावट ऐसे समय आयी है जब पश्चिम एशिया में जारी युद्ध ने वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं को बढ़ा दिया है।
विश्लेषकों के अनुसार, पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ा है। तेल महंगा होने से भारत के आयात बिल पर दबाव बढ़ा है, वहीं रुपये में कमजोरी भी देखने को मिली है। इसके साथ ही विदेशी निवेशकों की बिकवाली ने बाजार की गिरावट को और तेज कर दिया है।
बाजार की धारणा पर भारत और अमेरिका के बीच संभावित व्यापार समझौते को लेकर बनी अनिश्चितता भी भारी पड़ रही है। निवेशक फिलहाल किसी स्पष्ट दिशा का इंतजार कर रहे हैं। इस बीच आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़ी वैश्विक तेजी में भारतीय बाजार में बड़े एआई-आधारित निवेश अवसरों की कमी भी निवेशकों को उत्साहित नहीं कर पा रही है।
मॉर्गन स्टेनली के प्रबंध निदेशक और मुख्य भारत इक्विटी रणनीतिकार रिधम देसाई तथा नयंत पारेख की सह-लेखित रिपोर्ट के अनुसार, भू-राजनीतिक तनावों ने निवेशकों के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।
उनका कहना है कि भारत के लिए प्रमुख जोखिम फिलहाल बाहरी कारकों से जुड़े हैं, जिनमें वैश्विक तनाव और दुनिया की धीमी आर्थिक वृद्धि शामिल हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि घरेलू स्तर पर कृषि क्षेत्र की कम उत्पादकता और एम्बॉडीड एआई जैसी उभरती तकनीकों का श्रम बाजार पर संभावित प्रभाव भविष्य की प्रमुख चिंताओं में शामिल है।
विश्लेषकों का मानना है कि यदि भारत में व्यापक आर्थिक स्थिरता बनी रहती है, निजी निवेश में तेजी आती है और आर्थिक वृद्धि दर ब्याज दरों की तुलना में मजबूत बनी रहती है, तो बीएसई सेंसेक्स जून 2027 तक 89,000 अंक के स्तर तक पहुंच सकता है। यह अनुमान भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूत बुनियाद और कॉरपोरेट आय में संभावित सुधार को ध्यान में रखकर लगाया गया है।
अल्फानिटी फिनटेक के सह-संस्थापक और निदेशक व यू आर भट्ट का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष जल्द नहीं सुलझता है, तो अगले छह महीनों तक भारतीय बाजार सीमित दायरे में कारोबार कर सकते हैं। उनके अनुसार निफ्टी 22,800 से 23,400 अंकों के बीच घूमता रह सकता है।
भट ने कहा कि मौजूदा समय में कई ऐसे कारक हैं जो बाजार की दिशा तय करेंगे। ऐसे में वर्ष के अंत तक बाजार में अस्थिरता बनी रह सकती है और उनके आधारभूत अनुमान के अनुसार 2026 के आखिर तक सूचकांक मौजूदा स्तरों के आसपास ही रह सकते हैं।
यू. आर. भट के मुताबिक यदि अगले कुछ महीनों में पश्चिम एशिया का संघर्ष समाप्त हो जाता है और कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आती है, तो भारतीय शेयर बाजार नए रिकॉर्ड स्तर छू सकते हैं। तेल की कीमतों में गिरावट भारत जैसी आयात-निर्भर अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक मानी जाती है, जिससे निवेशकों का भरोसा और मजबूत हो सकता है।
वैश्विक ब्रोकरेज फर्म बर्नस्टीन ने वर्ष के अंत तक निफ्टी के 26,000 अंक तक पहुंचने का अनुमान बरकरार रखा है। यह मौजूदा स्तरों की तुलना में करीब 12 प्रतिशत की संभावित बढ़त दर्शाता है। हालांकि फर्म का अनुमान है कि 2026 के अंत तक कुल रिटर्न लगभग स्थिर रह सकता है।
बर्नस्टीन के प्रबंध निदेशक वेणुगोपाल गैरे का कहना है कि मध्य पूर्व और उत्तर अफ्रीका क्षेत्र में तनाव कम होने से बाजार में राहत की तेजी देखने को मिल सकती है, लेकिन यह लंबे समय तक टिकने वाली नहीं होगी। उनका मानना है कि कमजोर व्यापक आर्थिक संकेतक और इक्विटी इश्यूंस में संभावित बढ़ोतरी बाजार की तेजी को सीमित कर सकती है। इसी वजह से उन्होंने निफ्टी के लिए 26,000 का लक्ष्य बनाए रखते हुए अपनी न्यूट्रल रेटिंग बरकरार रखी है।
दुनिया के सबसे बड़े खेल आयोजनों में शामिल फीफा वर्ल्ड कप कई बार ऐसे दौर में आयोजित हुआ है, जब वैश्विक अर्थव्यवस्था किसी न किसी बड़े संकट से गुजर रही थी। बैंक आॅफ अमेरिका सिक्योरिटीज की एक रिपोर्ट में इस दिलचस्प पैटर्न की ओर ध्यान दिलाया गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, 1986 में मेक्सिको में आयोजित फीफा वर्ल्ड कप का समय लैटिन अमेरिकी कर्ज संकट के दौर से मेल खाता था। 1980 के दशक में कई लैटिन अमेरिकी देशों को भारी ऋण और आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ा था, जिसका असर क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं पर लंबे समय तक देखने को मिला।
इसी तरह, 2002 फीफा वर्ल्ड कप की मेजबानी जापान को देने की घोषणा मई 1996 में की गई थी। इसके कुछ ही समय बाद 1997-98 के दौरान एशियाई वित्तीय संकट ने कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं को झकझोर दिया। इस संकट का असर दक्षिण कोरिया, थाईलैंड, इंडोनेशिया समेत पूरे एशिया पर पड़ा था।
रिपोर्ट में कहा गया है कि 2026 फीफा वर्ल्ड कप का आयोजन अमेरिका, मेक्सिको और कनाडा में होना है। हालांकि, टूर्नामेंट से पहले ही वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता का माहौल बन गया है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है, जिससे दुनियाभर के शेयर बाजारों में बिकवाली देखने को मिली है।
भू-राजनीतिक तनाव के बीच कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है। रिपोर्ट के अनुसार, तेल की कीमतें लगभग 65 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 125 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गयी हैं। वहीं सोना और चांदी जैसी कीमती धातुओं की कीमतों में गिरावट देखने को मिली है। विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती अनिश्चितता और ऊर्जा कीमतों में उछाल वैश्विक आर्थिक गतिविधियों पर दबाव बढ़ा सकते हैं।
एबीएन स्पोर्ट्स डेस्क। उसके छक्कों पर हरभजन सिंह, इरफान पठान और अश्विन जैसे दिग्गज स्टैंडिंग ओवेशन देते हैं। आउट हो जाता है तो अनिल कुंबले, संजय बांगड़ जैसे पूर्व खिलाड़ी अपना माथा पीट लेते हैं। उसकी पारी की सराहना करने के लिए पूरा स्टेडियम खड़े होकर ताली बजाता है।
जिस टीम की पूरी बॉलिंग को एक 15 साल के लड़के ने तहस-नहस कर डाला हो, उसकी मालकिन भी सम्मान में खड़ी हो जाए तो मतलब आपने कुछ अद्भुत किया है। आपने अविश्वसनीय पारी खेली है। द गॉड आफ क्रिकेट मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर आपके बैट स्विंग और टेंपरामेंट की तारीफ करते हैं।
युवराज सिंह आपको बेबी बॉस की उपाधि देते हैं। सहवाग जैसे खिलाड़ी आपको विराट कोहली, रोहित शर्मा और एमएस धौनी जैसे खिलाड़ियों की लीक में खड़ा करते हैं। इनमें से किसी के नाम एक सीजन में सबसे छक्के लगाने का रिकॉर्ड नहीं है, आपने आईपीएल के अपने दूसरे ही सीजन में 65 छक्कों के साथ सर्वाधिक सिक्सर का रिकॉर्ड अपने नाम किया है, तो सचमुच स्पेशल हैं आप।
आपको गॉड गिफ्टेड टैलेंट कहना आपकी तपस्या की तौहीन होगी। आपके पिता के त्याग का अपमान होगा। आपने मेहनत की आग में खुद को जलाया है, तब कहीं जाकर यह मुकाम पाया है। पैट कमिंस, जसप्रीत बुमराह, जॉस हेजलवुड, कगिसो रबाडा, भुवनेश्वर कुमार, मोहम्मद सिराज और मोहम्मद शमी जैसे गेंदबाजों को जैसे आपने तड़ी दी है, ये मेहनत के बूते कमाये गये यकीन से ही संभव है।
सुनील नारायण, कुलदीप यादव, युजवेंद्र चहल, राशिद खान और मोहम्मद नूर जैसे स्पिनर्स के सामने आपकी टांगें कांपी नहीं है। वे आपकी चक्करघिरनी नहीं बना पाये हैं। आप जब कहते हैं कि मुझे गेंदबाजों से डर नहीं लगता चाहे वो फास्टर्स हों कि स्पिनर्स तो ये घमंड नहीं है। उसने मॉडर्न डे क्रिकेट के महान तेज गेंदबाजों का न केवल सामना किया है, बल्कि बखूबी खेला भी है।
वैभव सूर्यवंशी साफ कहते हैं कि मैं गेंदबाजों के बारे में ज्यादा नहीं सोचता। मैं गेंद पर ध्यान देता हूं और उसके हिसाब से अपना शॉट मैन्युफैक्चर करता हूं।वैभव केविन पीटरसन से कहते हैं कि मुझे बल्लेबाजी पसंद है, चाहे इनिंग पहली हो कि मेरी टीम चेज कर रही हो। अगला टार्गेट टी-20 क्रिकेट में 200 रन बनाने का है।
लड़का बना लेगा एक दिन वो भी। कल ही 29वें गेंद पर छक्का लग जाता तो एक रिकॉर्ड और बनना तय था। वैभव सूर्यवंशी सीजन में सर्वाधिक स्कोर बनाने वाले पहले अनकैप्ड खिलाड़ी बने हैं। सीजन में 230+ का स्ट्राइक रेट भी एक रिकॉर्ड है।
उन्होंने 65 छक्कों के साथ सीजन से सर्वाधिक छक्के लगाने का रिकॉर्ड भी अपने नाम किया है। 29 मई को क्वालीफायर 2 में मौका मिलेगा। वहां जीते तो फाइनल भी है। इसे हम कीर्तिमान अलर्ट कह सकते हैं...।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। आजकल एक प्रचलन प्रसिद्धि पर है, जिसको अंग्रेजी में Motivational Speech और हिंदी में उत्प्रेरित करने वाला भाषण कहते हैं। श्रोता खर्च करके ऐसे आयोजनों में जाते हैं और वक्ता के भाषण को ध्यानपूर्वक कम सुनते हैं और ताली अधिक बजाते हैं।
विचार करने योग्य है कि जीवन में किस चीज का महत्व सबसे अधिक है। व्यावहारिक रूप से तो यही दिखाई दे रहा है कि बचपन से उस दिशा में उत्प्रेरित किया जाता है, जिससे पैसे की आमदनी हो सके। ज्ञान इसलिए अर्जित किया जाता है कि रुपया कमाया जा सके। रुपया इसलिए कि भौतिक सुख सुविधा तो देता ही देता है और जमाना पता नहीं क्यों धनवान को सम्मान भी देता है।
यथार्थ है कि धन अपने आप में बहुत बलशाली है, लेकिन उसके नियोजन के ऊपर निर्भर करता है कि जीवन सुखी रहेगा अथवा विभिन्न प्रकार के रोग-शोक का कारण बन जाएगा। जीवन में संपर्क एवं सानिध्य धनबल से अधिक शक्तिशाली तथा सामर्थ्यवान होता है। संगति क्रिया को प्रभावित करती है, और क्रिया (Action) ही अंततोगत्वा प्रतिक्रिया के स्वरूप में परिणाम उत्पन्न करती है।
रुपया, ज्ञान और संपर्क की की ताकत का परिणाम बुद्धि आधारित हो सकता है, परंतु सबसे महत्वपूर्ण क्रिया का किया जाना जब तक विवेक के ऊपर आधारित नहीं होगा तो सब कुछ रहते हुए भी जिसको वास्तविक सुख एवं संतोष की संज्ञा दी जाती है, उसे प्राप्त नहीं किया जा सकता है।
जब संसार से विदाई लेना ही लेना है तब अंतिम क्षण में मृत्यु का स्वागत तभी किया जा सकेगा जब संतोष से दिल भरा हुआ हो.. और संतोष तब प्राप्त किया जा सकता है जब धन, ज्ञान तथा क्रिया का क्रियान्वयन विवेक-युक्त दिशा की ओर किया जाता रहे।
आदिवासी/जनजाति सांस्कृतिक समागम...
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। आज 24 मई 2026 को दिल्ली के लाल किला मैदान में आदिवासी सांस्कृतिक समागम का आयोजन किया गया है जिसमें देश भर से आदिवासी समाज के नारी एवं नर भारी संख्या में दिल्ली पहुंच चुके हैं जिसके लिए कई राज्यों से विशेष रेल की परिचालन की गई है।
झारखंड के भगवान बिरसा मुंडा की 150 वीं जयंती के शुभ अवसर पर यह समागम आयोजित की गई है। इस समागम में भारत सरकार के गृह मंत्री श्री अमित शाह मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करने वाले हैं। झारखंड से भी लगभग 5,000 से अधिक जनजातीय समुदाय के लोग दिल्ली पहुंच चुके हैं।
आदिवासी समाज के प्रवक्ताओं ने कहा है कि समाज के जो लोग माथांतरण करते हुए ईसाई बन चुके हैं उन्हें आरक्षण के लाभ से वंचित किया जाना चाहिए। आज के समागम में इस विषयक प्रस्ताव पारित किए जाने वाले हैं जिन्हें देश के सर्वोच्च राजनीतिक पदाधिकारी को ज्ञापित किया जाएगा।
जनजातीय सभ्यता, संस्कृति, भाषा और प्रकृति के संरक्षण तथा उन्हें अक्षुण बनाए रखने के लिए संकल्प लिए जाएंगे। आदिवासी समागम का यह कार्यक्रम समय के ऐसे कालखंड में किया जा रहा है जब आदिवासी समाज अपने अधिकारों के प्रति सजग, जागरूक एवं प्रगतिशील हो चुका है।
दुर्भाग्य से आदिवासी समाज के मध्य से ही कुछ आदिवासी नेता इस प्रकार के आयोजन का विरोध कर रहे हैं जिसके पीछे उनका अपना स्वार्थ है, लेकिन वह समय अब आ गया है कि आदिवासियों को उनका संपूर्ण सम्मान एवं स्वाभिमान वापस दिया जाए। (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। अगर हर इंसान आत्मविश्वासी होता तो दुनिया कितनी आसान होती। पर अफसोस, बॉडी शेमिंग आज लाखों लोगों के लिए एक दर्दनाक हकीकत है। यह न सिर्फ आत्मविश्वास तोड़ती है, बल्कि इंसान को बिना वजह खुद पर शर्मिंदा कर देती है। जबकि सच यह है कि हर तरह की बॉडी शेप को गर्व से अपनाया जा सकता है।
आमतौर पर माना जाता है कि बॉडी शेमिंग का शिकार सिर्फ ओवरवेट लोग होते हैं। लेकिन हकीकत में, जो भी व्यक्ति मॉडल जैसी कद-काठी का नहीं है, उसे निशाना बनाया जाता है। रंग, कद, दुबलापन, चेहरा, यहाँ तक कि सफल अभिनेता और मॉडल भी तानों से नहीं बच पाते क्योंकि उनका पेशा ही शरीर से जुड़ा है।
बॉडी शेमिंग दो तरह की होती है। पहली, सीधी और कठोर व्यक्तिगत टिप्पणी। दूसरी, समाज और मीडिया द्वारा फैलाया गया वह ज़हर जहाँ परफेक्ट बॉडी को ही सुंदर माना जाता है। इसका नतीजा होता है डिप्रेशन, ईटिंग डिसऑर्डर, आत्म-सम्मान में कमी और कई बार तो किशोरों द्वारा आत्महत्या तक। अध्ययनों के अनुसार, बॉडी शेमिंग गहरा मनोवैज्ञानिक आघात पहुंचाती है। कई लोग न खाने और फिर ओवर-ईटिंग के चक्र में फंस जाते हैं। वे खुद को आईने में आलोचनात्मक नज़र से देखते हैं।
हर व्यक्ति एक खास शरीर के साथ पैदा होता है और उसे बदलने की ज़रूरत नहीं है। बॉडी शेमिंग तब शुरू होती है जब हम खुद को स्वीकार नहीं करते। याद रखें, ईश्वर की हर रचना सुंदर है। कभी-कभी माता-पिता भी अनजाने में बच्चों को नियंत्रित करने के लिए शरीर पर टिप्पणी कर देते हैं। ज़रूरत है खुद पर गर्व करने की। जब हम अपनी बॉडी की इज़्ज़त करेंगे, तो बुलीज़ के ताने बेअसर हो जाएंगे। अपनी पहचान पर गर्व कीजिए, क्योंकि आप जैसे हैं, वैसे ही खूबसूरत हैं।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत का रक्षा क्षेत्र आज वहां आ पहुंचा है, जहां तकनीक, अनुसंधान और स्वदेशी क्षमताएं राष्ट्रीय शक्ति का नया आधार बनती जा रही हैं। हाल के वर्षों में सरकार ने रक्षा अनुसंधान को नीति के केंद्र में स्थापित किया है, जिससे देश की सुरक्षा व्यवस्था अधिक सशक्त, आधुनिक और आत्मनिर्भर बन रही है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा व्यक्त विचार इस दिशा में स्पष्ट संकेत देते हैं कि आने वाला समय तकनीकी श्रेष्ठता का होगा और भारत इस दौड़ में पीछे रहने वाला देश नहीं है।
वस्तुत: आज केंद्र सरकार द्वारा रक्षा अनुसंधान एवं विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता देना एक दूरदर्शी कदम माना जा सकता है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) द्वारा अब तक 2,200 से अधिक तकनीकों का उद्योगों को हस्तांतरण इस बात का प्रमाण है कि देश में शोध और उत्पादन के बीच मजबूत पुल तैयार हो चुका है। इस प्रक्रिया ने रक्षा उत्पादन को गति दी है और निजी क्षेत्र को भी नए अवसर प्रदान किए हैं। अनुसंधान पर निरंतर ध्यान बनाए रखना भविष्य के युद्धों में बढ़त दिलाने वाला कारक बन सकता है।
रक्षा अनुसंधान एवं विकास बजट का 25 प्रतिशत हिस्सा उद्योगों, अकादमिक संस्थानों और स्टार्टअप्स के लिए निर्धारित किया जाना एक क्रांतिकारी पहल है। इन संस्थाओं द्वारा 4,500 करोड़ रुपये से अधिक का उपयोग यह दर्शाता है कि देश में नवाचार की ऊर्जा तेजी से बढ़ रही है। इससे एक ओर जहां नयी तकनीकों का विकास संभव हुआ है, वहीं युवाओं को भी रक्षा क्षेत्र में योगदान देने का अवसर मिला है।
नयी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर नीति के तहत शुल्क समाप्त करना उद्योगों के लिए एक बड़ा प्रोत्साहन साबित हुआ है। इससे विकास और उत्पादन में साझेदारी को बढ़ावा मिला है। साथ ही पेटेंट्स को मुफ्त उपलब्ध कराने की नीति ने तकनीकी विकास को नयी गति दी है। परीक्षण सुविधाओं को उद्योगों के लिए खोलना भी सहयोगात्मक विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
यही कारण है कि भारत अब डायरेक्टेड एनर्जी वेपन्स, हाइपरसोनिक हथियार, क्वांटम तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग जैसे अत्याधुनिक क्षेत्रों में तेजी से आगे बढ़ रहा है। ये तकनीकें भविष्य के युद्धों की दिशा तय करेंगी। इन क्षेत्रों में निवेश और अनुसंधान भारत को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बना रहे हैं। हमने पिछले साल देखा भी है कि आॅपरेशन सिंदूर जैसे अभियानों में स्वदेशी तकनीकों का सफल उपयोग देश की बढ़ती सैन्य क्षमता को दशार्ता है। आकाशतीर, आकाश मिसाइल सिस्टम और ब्रह्मोस जैसी उन्नत प्रणालियां इस बात का प्रमाण हैं कि भारत अब आत्मनिर्भर रक्षा शक्ति बनने की दिशा में मजबूती से आगे बढ़ रहा है। यह उपलब्धि हर भारतीय के लिए गर्व का विषय है।
इसके साथ ही कहना होगा कि भारत के लिए वित्त वर्ष 2025-26 में रक्षा उत्पादन का 1.54 लाख करोड़ रुपए तक पहुंचना एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। रक्षा निर्यात का 38,424 करोड़ रुपए तक पहुंचना इस बात का संकेत है कि भारत अब वैश्विक बाजार में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रहा है। पिछले एक दशक में 174 प्रतिशत की वृद्धि और निर्यात में कई गुना विस्तार देश की बदलती पहचान को दशार्ता है। जिसमें कि रक्षा निर्यात में निजी क्षेत्र का लगभग 15,000 करोड़ रुपये का योगदान इस क्षेत्र में आये बड़े बदलाव को दर्शा रहा है। अब रक्षा निर्माण सरकारी संस्थानों की पहुंच से आगे उद्योगों और स्टार्टअप्स की सक्रियता में एक व्यापक इकोसिस्टम बन चुका है।
स्वभाविक तौर पर इससे नवाचार और प्रतिस्पर्धा दोनों को बढ़ावा मिला है। आज इनोवेशंस फॉर डिफेंस एक्सीलेंस, एडीआईटीआई और टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट फंड जैसी योजनाएं रक्षा क्षेत्र में नयी ऊर्जा का संचार कर रही हैं। इन पहलों ने युवाओं और उद्यमियों को रक्षा तकनीकों के विकास में भाग लेने का अवसर दिया है। इससे देश में नवाचार की संस्कृति मजबूत हो रही है।
ऐसे में यह भी ध्यान में आता है कि भारत का लक्ष्य अब तकनीकी संप्रभुता हासिल करना है, जिसमें महत्वपूर्ण तकनीकों का विकास, स्वामित्व और संरक्षण देश के भीतर ही हो। क्वांटम-सिक्योर कम्युनिकेशन जैसी उपलब्धियां इस दिशा में बड़ी प्रगति को दशार्ती हैं। यह क्षमता भविष्य के युद्धों में निर्णायक साबित हो सकती है। बजट 2026-27 में रक्षा क्षेत्र के लिए 6.81 लाख करोड़ रुपए का आवंटन सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। यह पिछले वर्ष की तुलना में उल्लेखनीय वृद्धि है, जोकि रक्षा तैयारियों को और मजबूत बनायेगी।
अत: हम सभी के लिए आज गौरव की बात है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की रक्षा यात्रा एक ऐसे मुकाम पर पहुंच चुकी है, जहां आत्मनिर्भरता, तकनीकी श्रेष्ठता और वैश्विक पहचान एक साथ आकार ले रही हैं। यह परिवर्तन हर भारतीय के लिए गर्व का विषय है। यह तो हम सभी जानते हैं कि देश का रक्षा क्षेत्र सुरक्षा का प्रतीक है, किंतु कहना होगा कि इस दिशा में हो रहे नवाचार आज शक्ति और आत्मविश्वास का भी प्रतिनिधित्व करते हुए दिखाई देते हैं, जोकि हर भारतीय को आशा और उत्साह से भर रहे हैं। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। मातृभूमि के सेवा के लिए जिस संगठन की नींव त्याग, तपस्या और राष्ट्र-साधना रूपी ईंट के उपर रखी गयी हो, उस संगठन का कार्यकर्ता अपना पूरा जीवन एक विचारधारा तथा राष्ट्रभक्ति की भावना को समर्पित कर देता है।
आज कोलकाता के ऐतिहासिक ब्रिगेड मैदान में भारतीय जनता पार्टी की सरकार के गठन के शपथ ग्रहण समारोह में ऐसा ही एक भावभीनी गौरवपूर्ण परिदृश्य विशाल जनसमूह के सामने आया जिसने देशवासियों में गहरा एवं अमिट छाप छोड़ गया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 98 वर्षीय वरिष्ठ कार्यकर्ता माखनलाल सरकार का चरण स्पर्श एवं शाल ओढ़ा कर उनका आशीर्वाद लिया। यह उस साधना, तपस्या, संघर्ष और समर्पण का चरण स्पर्श था जिसने दशकों पहले जनसंघ और राष्ट्रवादी विचारधारा की मजबूत नींव रखी थी।
माखनलाल सरकार वही राष्ट्र-साधक हैं, जिन्होंने डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष किया, जेल और उनके साथ कश्मीर की यात्रा की उनके मृत शरीर को लेकर वापस लौटे और राष्ट्र सेवा में अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया।
राजनीति में किसी भी व्यक्ति का पद एवं सत्ता की शक्ति की आयु एक अवधि के बाद समाप्त हो जाती है, परंतु उसके द्वारा स्थापित आदर्श, संस्कृति, चरित्र और विचारधारा चिरस्थाई हो जाते हैं। (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
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