एबीएन एडिटोरियल डेस्क। जनसंख्या संबंधित समस्याओं पर वैश्विक चेतना जागृत करने के लिए प्रतिवर्ष 11 जुलाई को विश्व जनसंख्या दिवस मनाया जाता है। भारत के संदर्भ में देखें तो तेजी से बढ़ती आबादी के कारण ही हम सभी तक शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतों को पहुंचाने में पिछड़ रहे हैं। देश में बेरोजगारी की समस्या विकराल हो चुकी है। हालांकि विगत दशकों में विभिन्न योजनाओं के माध्यम से नए रोजगार जुटाने के कार्यक्रम चलाए गए लेकिन बढ़ती आबादी के कारण ये सभी कार्यक्रम ऊंट के मुंह में जीरा ही साबित हुए। देश में आबादी और संसाधनों के बीच असंतुलन बढ़ता जा रहा है। वास्तविकता यही है कि विगत दशकों में देश की जनसंख्या जिस गति से बढ़ी, उस गति से कोई भी सरकार जनता के लिए आवश्यक संसाधन जुटाने की व्यवस्था करने में सफल हो ही नहीं सकती थी।
आज देश की बहुत बड़ी आबादी निम्न स्तर का जीवन जीने को विवश है। देश में करीब 40 प्रतिशत आबादी आजादी के बाद से ही गरीबी के आलम में जी रही है। गरीबी में जीवन गुजार रहे ऐसे बहुत से लोगों की यही सोच रही है कि उनके यहां जितने ज्यादा बच्चे होंगे, उतने ही ज्यादा कमाने वाले हाथ होंगे किन्तु यह सोच वास्तविकता के धरातल से परे है।
लगातार बढ़ती महंगाई के जमाने में परिवार बड़ा होने से कमाने वाले हाथ ज्यादा होने पर जितनी आय बढ़ती है, उससे कहीं ज्यादा जरूरतें और विभिन्न उत्पादों की कीमतें बढ़ जाती हैं, जिनकी पूर्ति कर पाना सामर्थ्य से परे हो जाता है। इसलिए जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रमों की सफलता के लिए सर्वाधिक जरूरी यही है कि घोर निर्धनता में जी रहे ऐसे लोगों को परिवार नियोजन कार्यक्रमों के महत्व के बारे में जागरूक करने की ओर खास ध्यान दिया जाए क्योंकि जब तक इस कार्यक्रम में इन लोगों की भागीदारी नहीं होगी, तब तक लक्ष्य की प्राप्ति संभव नहीं है।
देश में जनसंख्या वृद्धि का मुकाबला करने के लिए पिछले काफी समय से कुछ कड़े कानून बनाने की मांग हो रही है लेकिन इस दिशा में कुछ राज्य सरकारें दो से ज्यादा बच्चों वाले परिवारों को सरकारी नौकरी तथा स्थानीय निकाय चुनावों में उम्मीदवारी से अयोग्य अघोषित करने जैसे जिस तरह के उपायों पर विचार कर रही हैं, उन्हें तर्कसंगत नहीं माना जा सकता। हालांकि जनसंख्या वृद्धि मौजूदा समय में गंभीर चुनौती है लेकिन ऐसे उपायों को संवैधानिक नजरिये से भी तर्कसम्मत नहीं माना जाता।
चीन में 1980 से पहले केवल एक बच्चा पैदा करने की अनुमति थी, जिसका उल्लंघन करने पर दम्पति को न केवल सरकारी योजनाओं से वंचित कर दिया जाता था बल्कि सजा भी दी जाती थी लेकिन वहां यह नीति सफल नहीं हुई। इसीलिए चीन सरकार ने 2016 में इस नीति में बदलाव कर दो बच्चों की अनुमति दी और बाद में तीन बच्चों की अनुमति देनी पड़ी। चीन की तानाशाही सरकार द्वारा नीतियों में बड़ा बदलाव करते हुए दम्पत्तियों को तीन बच्चे करने की अनुमति क्यों दी गई, इसके कारण समझना भी जरूरी है। दरअसल वहां लोगों की सामान्य प्रजनन दर में निरन्तर गिरावट आ रही है और कुछ विशेषज्ञों के मुताबिक यही स्थिति भारत में भी होनी है।
जनसंख्या में स्थायित्व और कामकाजी युवाओं की स्थिर संख्या के लिए महिलाओं की सामान्य प्रजनन दर 2.1 होनी चाहिए और चीन में यह दर निरन्तर गिर रही है। 1970 में चीन में यह दर 5.8 थी, जो 2015 में घटकर 1.6 और 2020 में केवल 1.3 ही रह गई जबकि बुजुर्गों की आबादी लगातार बढ़ती गई। नेशनल ब्यूरो आॅफ स्टेटिस्टिक्स (एनबीएस) के अनुसार आने वाले समय में आबादी में अधिक उम्र वालों की संख्या बढ़ने से संतुलित विकास और जनसंख्या को लेकर दबाव बढ़ेगा। 1982 में हुई जनगणना में चीन की जनसंख्या में 2.1 फीसदी की सबसे ज्यादा वृद्धि दर्ज की गई थी लेकिन उसके बाद जनसंख्या में लगातार गिरावट दर्ज की गई, जिसके लिए वहां की कम्युनिस्ट सरकार द्वारा अपनायी गयी दशकों पुरानी वन चाइल्ड पॉलिसी को जिम्मेदार माना जाता है।
विगत एक दशक में चीन की जनसंख्या करीब सात करोड़ बढ़ी लेकिन बुजुर्गों की संख्या बढ़ने से चीन के लिए अलग ही समस्या उत्पन्न होने लगी है। दरअसल चीन को आशंका है कि अगले दस वर्षों में उसकी जनसंख्या में गिरावट आएगी, जिससे कामगारों की संख्या में कमी आने से उसकी खपत भी घटेगी। एनबीएस के आंकड़ों के मुताबिक चीन को जिन जनसांख्यिकीय संकट का सामना करना पड़ा था, वह और गहरा होने की उम्मीद थी, इसीलिए चीन को अपनी जनसंख्या नीति में बदलाव करने पर विवश होना पड़ा।
जहां तक भारत की बात है तो यहां 1994 में महिलाओं की सामान्य प्रजनन दर 3.4 थी, जो घटकर 2015 में 2.2 रह गई थी यानी सामान्य के करीब। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार भारत की जनसंख्या 2050 तक बढ़ने के बाद से गिरनी शुरू हो जाएगी और 2100 तक पहुंचते-पहुंचते सामान्य प्रजनन दर केवल 1.3 ही रह जाएगी। इसका अर्थ है कि तब अधिकांश परिवारों में केवल एक ही बच्चा होगा और भारत उसी स्थिति में खड़ा होगा, जिसमें वन चाइल्ड पॉलिसी के बाद चीन खड़ा हुआ और उसे विगत सात वर्षों में दो बार अपनी जनसंख्या नीति में बड़ा परिवर्तन करना पड़ा। इसलिए टू चाइल्ड पॉलिसी जैसे कानूनों के जरिये जनसंख्या नियंत्रण की कोशिशों को व्यावहारिक नहीं माना जा रहा बल्कि इसके लिए डराने-धमकाने वाले कानूनों के बजाय लोगों में जागरुकता पैदा किया जाना सबसे जरूरी है।
बगैर कड़े कानूनों के देश के ऐसे राज्यों में जनसंख्या वृद्धि दर में कमी आयी सर्वेक्षण के अनुसार भारत में गरीब महिलाओं की प्रजनन दर करीब 3.2 है जबकि सम्पन्न महिलाओं में यह दर केवल 1.5 पाई गई है। इसी प्रकार अनपढ़ महिलाओं के औसतन 3.1 बच्चे होते हैं जबकि शिक्षित महिलाओं में यह संख्या औसतन 1.7 है। इसका स्पष्ट अर्थ है कि जनसंख्या विस्फोट का सीधा संबंध सामाजिक और शैक्षिक स्थितियों से जुड़ा है। शिक्षा के अभाव में ही देश की बड़ी आबादी को छोटे परिवार के लाभ को लेकर जागरूक नहीं किया जा सका है। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारतीय सनातन दर्शन के अनुसार 100 वर्ष की आयु को पुरुषार्थ की दृष्टि से आश्रम के चार भागों में विभक्त किया गया है। 1. ब्रह्मचर्य आश्रम, 2. गृहस्थ आश्रम, 3. वानप्रस्थ आश्रम, 4. सन्यास आश्रम।
25 वर्ष तक की आयु में विद्या अध्ययन, 25 से 50 वर्ष की आयु में पारिवारिक जीवन के कर्तव्यों का निर्वहन, 50 से 75 वर्ष की आयु तक घर में रहते हुए सामाजिक दायित्वों का निर्वहन और 75 से 100 वर्ष की आयु तक गृह का परित्याग करते हुए अर्जित अनुभव के आधार पर सेवा का कार्य करना; प्रथम पुरुषार्थ किस श्रेणी में आता है। जीवन की एक संपूर्ण अवधि में 1.. धर्म 2..अर्थ 3.. काम 4.. मोक्ष; पुरुषार्थ की दूसरी उत्तम श्रेणी में आता है।
दोनों श्रेणी के पुरुषार्थ के लिए स्वयं को तपाना पड़ता है। अंधकार से प्रकाश की ओर कदम बढ़ाना पड़ता है। गर्भस्थ शिशु अंधकार से प्रसव के बाद प्रकाश में अवतरित होता है। पृथ्वी के गर्भ के अंधकार में पड़े बीज धरती को चिर कर बाहर प्रकाश में उगता है और पौधा बनकर फूल फल प्रदान करता है।
पुरुषार्थ के धैर्य, संयम, संघर्ष, सहिष्णुता और कर्म अलंकार होते हैं, जबकि दृढ़ संकल्प पुरुषार्थ का प्राण वायु होता है। पुरुषार्थ की शक्ति से भौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों उद्देश्यों की पूर्ति निश्चित रूप से की जा सकती है, और अंत में पूर्ण संतुष्टि के साथ विदाई में आलिंगनबद्ध हुआ जा सकता है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। कल मंगलवार को इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्राबोवो सुबियांतो ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान वितांक एडिपुरना ऑफ द रिपब्लिक इंडोनेशिया से जकार्ता में आयोजित एक विशेष सम्मान समारोह में सम्मानित किया।
यह सम्मान इंडोनेशिया की एकता, निरंतरता एवं समृद्धि के लिए योगदान करने वाले व्यक्तियों को दिया जाता है। यह मोदीजी को प्राप्त 35वां विदेशी नागरिक सम्मान है। मोदीजी के बारे में भ्रामक प्रचार किया जाता रहा है कि वे इस्लाम विरोधी सोंच रखने वाले व्यक्ति हैं, जबकि इंडोनेशिया मुस्लिम बहुल आबादी वाला देश है।
इसके पहले मुस्लिम आबादी वाले देश सऊदी अरब, फिलिस्तीन, मालदीव, बहरीन, संयुक्त अरब अमीरात, ओमान मिस्र ने भी अपने देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान मोदीजी को दिया है। दुनिया के भर के देशों के मध्य मतभेदों में मोदीजी के नेतृत्व में भारत को एक सेतु की भूमिका में स्वीकार किया जाना, मोदीजी को प्राप्त हो रहे हैं नागरिक सम्मान से स्वत: सिद्ध हो रहा है।
मोदीजी का सम्मान वास्तव में भारत का सम्मान है। विश्व के मंच पर कभी भारत की अनदेखी की जाती थी लेकिन आज भारत को एक शक्तिशाली, आत्मनिर्भर, सुदृढ़ विकसित अर्थव्यवस्था, ज्ञान विज्ञान कला साहित्य से समृद्ध एक विश्वसनीय राष्ट्र के रूप में जाना जाता है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। 2014 में देश के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने के बाद से मोदीजी के कार्यकाल में भारत दुनिया के मंच में एक दूरदर्शी खिलाड़ी/ Proactive Player के स्वरूप में स्थान बनाया है। आज की तिथि में डोनाल्ड ट्रंप, व्लादिमीर पुतिन, शी जिनपिंग, नितिनयाहू, अयातुल्ला मोजतबा ख़ामेनेई से उनके बीच तनाव एवं विवाद के रहते मोदी जी सबसे बात कर सकते हैं।
रस से बात कर सकते हैं तो यूक्रेन से भी उनकी बात होती है। भारत की छवि उन्होंने एक विश्वसनीय देश के रूप में स्थापित करने की सफलता प्राप्त की है। दुनिया के कई देशों में अपने यहां के सबसे प्रतिष्ठित सम्मान से मोदीजी को सम्मानित किया है।
अभी हाल में ही मोदी जी ने सबसे लंबे निर्वाचित प्रधानमंत्री रहने का रिकॉर्ड बनाया है, जो 144 करोड़ जनता के मध्य उनकी लोकप्रियता को सिद्ध करता है। मोदीजी का मूल मंत्र सबका साथ, सबका विकास, और सब का प्रयास उनकी गारंटी को जनसामान्य का विश्वासपात्र बनाया है।
मोदी की आयु 75 वर्ष की हो चुकी है। प्रधानमंत्री रहते हुए पिछले 12 वर्षों में वे कभी थके हुए दिखाई नहीं दिए, उन्होंने कभी छुट्टी नहीं ली और दुनिया के प्रतिस्पर्धा में आशा एवं आत्मविश्वास से नित्य नए-नए मिल के पत्थरों को स्थापित करते जा रहे हैं।
राजनीतिक दृष्टि से भारतीय जनता पार्टी की गठबंधन नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (NDA) को उन्होंने सशक्त बनाया है परिणाम यह है कि आज देश के 20 राज्यों से अधिक राज्य में डबल इंजन की सरकार चल रही है। परिवारवादी क्षेत्रीय दलों के अधिकांश नेता मोदीजी की कार्य पद्धति और विश्वसनीयता से प्रभावित होकर उनके साथ काम करने की इच्छा रखते हुए उनकी ओर आकर्षित हो रहे हैं।
भारत में लोकतंत्र के संविधान में मोदीजी की गहरी आस्था है, राष्ट्र प्रथम उनकी भावनाओं में प्रवाहित है और उनका व्यक्तिगत जीवन अत्यंत सधा एवं कसा हुआ है; और यही वे मूल कारक हैं जिसके आधारशिला पर मोदी जी का व्यक्तित्व खड़ा हुआ है। (लेखक स्वतन्त्र स्तंभकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। हर वर्ष 30 जून को देश संताल हूल दिवस मनाता है। अधिकांश स्मरण 1855 के भगनाडीह और सिदो-कान्हू, चांद तथा भैरव मुर्मू के नेतृत्व में फूटे उस महान विद्रोह तक सीमित रह जाते हैं, जिसने अंग्रेजी शासन को आदिवासी भारत की संगठित शक्ति का परिचय कराया। किंतु हूल केवल एक दिन, एक वर्ष या एक क्षेत्र की घटना नहीं था। उसकी ज्वाला दामिन-ए-कोह से निकलकर छोटानागपुर, विशेषकर हजारीबाग की धरती पर लंबे समय तक धधकती रही। हूल का वास्तविक इतिहास उसकी निरंतरता में छिपा है।
हूल के दमन के बाद बड़ी संख्या में संताल योद्धाओं और नेताओं को गिरफ्तार कर हजारीबाग जेल में बंद कर दिया गया। अंग्रेज अधिकारियों को लगा कि नेतृत्व को कैद कर देने से प्रतिरोध समाप्त हो जायेगा। लेकिन कुछ ही महीनों बाद यह विश्वास टूट गया। अप्रैल 1856 में सैकड़ों संताल अपने बंदी साथियों को मुक्त कराने के लिए हजारीबाग जेल पर टूट पड़े। जेल भवन में आग लगा दी गई। जेल अस्पताल, मालखाना और संतरी चैकी पर तीरों की बौछार हुई। प्रशासन ने पहले इसे कुछ बरकंदाजों की शरारत मानकर टालना चाहा, किंतु शीघ्र ही स्पष्ट हो गया कि यह किसी छोटे समूह की दुस्साहसिक घटना नहीं, बल्कि जीवित प्रतिरोध की उद्घोषणा थी। संताल अपने नेताओं को मुक्त नहीं करा सके, पर अंग्रेजी शासन को यह संदेश अवश्य दे गए कि हूल अभी जिंदा है।
लगभग एक वर्ष बाद वही हजारीबाग फिर इतिहास के केंद्र में था। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में जब विद्रोही सैनिकों ने जेल पर धावा बोला और फाटक तोड़ा, तब सबसे बड़ी संख्या उन संताल बंदियों की थी जिन्हें हूल और उसके पहले और बाद के संघर्षों में कारावास मिला था। जेल से बाहर निकलते ही वे अपने गाँवों और समुदायों में लौटे। उन्होंने एक बार फिर औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध हथियार उठा लिए। इस प्रकार हूल और 1857 का महासमर हजारीबाग की धरती पर एक-दूसरे से जुड़ गए।
अब संघर्ष का स्वरूप भी बदल चुका था। यह केवल हथियारों का प्रतिरोध नहीं रहा। संतालों ने फसल-दखल आंदोलन आरंभ किया। जिन जमींदारों और महाजनों को वे अंग्रेजी शासन का सहायक मानते थे, उनके खेतों से अनाज अपने अधिकार में लेना शुरू कर दिया। रूपु मांझी के नेतृत्व में यह आंदोलन गोला, चितरपुर, गोमिया, पेटरवार, चास और मानभूम तक फैल गया। यह केवल अन्न प्राप्त करने का प्रयास नहीं था, यह उस भूमि पर अधिकार की घोषणा थी जिसे संतालों अपने श्रम से उपजाऊ बनाया था।
इन घटनाओं ने ब्रिटिश प्रशासन की चिंता को चरम पर पहुंचा दिया। उनका भय था कि यदि संताल ग्रैंड ट्रंक रोड तक पहुंच गए या उसे पार कर गए, तो कलकत्ता और उत्तर भारत के बीच साम्राज्य का सबसे महत्त्वपूर्ण संपर्क मार्ग संकट में पड़ जाएगा। इसी आशंका में बगोदर और बरही के बीच सैनिक बढ़ाये गये, यूरोपीय और सिख सैनिकों की टुकड़ियां भेजी गयीं, टेलीग्राफ कार्यालय को बगोदर से बरही स्थानांतरित करने का निर्णय लिया गया और शेरघाटी में कटते तारों की खबरों ने औपनिवेशिक शासन के होश उड़ा दिये थे।
यह केवल सुरक्षा-व्यवस्था नहीं थी, यह उस भय का प्रमाण था, जो संताल प्रतिरोध ने औपनिवेशिक शासन के भीतर पैदा कर दिया था। उधर रूपू मांझी और उनके साथियों की गतिविधियां रुक नहीं रही थीं। ब्रिटिश समर्थक जमींदार उनके निशाने पर थे। गांवों में अनाज जब्त किया जा रहा था। राजा रामगढ़ स्वयं चिंतित थे और अतिरिक्त सैनिकों की मांग कर रहे थे। अंतत: अंग्रेजी शासन ने स्थानीय जमींदारों, जागीरदारों, सिख सैनिकों और यूरोपीय टुकड़ियों की सहायता से व्यापक सैन्य अभियान चलाया। गांव जलाये गये, नेताओं के घर नष्ट किए गए, इनाम घोषित हुए और सैकड़ों संताल एक बार फिर से गिरफ्तार किये गये। तब जाकर यह प्रतिरोध धीरे-धीरे दबाया जा सका।
हूल दिवस केवल अतीत को याद करने का अवसर नहीं है, यह इतिहास को उसकी संपूर्णता में समझने का भी दिन है। यदि हम हूल को केवल 30 जून 1855 की घटना मानते हैं, तो उसके सबसे महत्त्वपूर्ण अध्याय हमारी दृष्टि से ओझल हो जाते हैं। हजारीबाग जेल पर हमला, 1857 के महासमर में संताल बंदियों की निर्णायक भूमिका, फसल-दखल आंदोलन और ब्रिटिश शासन की बढ़ती प्रशासनिक घबराहट इस तथ्य के साक्ष्य हैं कि हूल ने औपनिवेशिक सत्ता को वर्षों तक चुनौती दी। संताल हूल भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष का केवल प्रारंभिक विद्रोह नहीं, बल्कि उस दीर्घ प्रतिरोध परंपरा का आधार स्तंभ है, जिसने अंतत: विदेशी शासन की जड़ों को हिला दिया। आज हूल दिवस पर उन ज्ञात-अज्ञात संताल वीरों को स्मरण करने का सबसे सार्थक तरीका यही है कि उनके संघर्ष को इतिहास के सीमित अध्याय के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय स्वाधीनता चेतना की सतत् और जीवंत धारा के रूप में देखा जाए। (लेखक इतिहास के प्रोफेसर, क्षेत्रीय इतिहास के अध्येता-शोधकर्ता और दर्जन भर पुस्तकों के लेखक हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। राजनीतिक दल भारतीय जनसंघ/भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी जम्मू कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग मानते थे। जम्मू कश्मीर में शेष भारतीयों के लिए प्रवेश के लिए परमिट, अलग झंडा और वहां के लिए विशेष कानून अनुच्छेद 370 का वे प्रबल विरोधी थे।
जम्मू कश्मीर के जमीन से अपना विरोध प्रकट करने के लिए वे 11 मई 1953 को बिना परमिट बनवाए श्रीनगर गए तो वहां की पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल में बंद करते हुए नजरबंद कर दिया। बताया गया कि जेल में उनकी तबीयत बिगड़ने लगी और 23 जून 1953 को जेल में रहते हुए उनकी रहस्य में मृत्यु की घोषणा कर दी गई। उस समय डॉक्टर साहब की आयु मात्र 52 वर्ष की थी।
भारतीय जनता पार्टी 23 जून को उनके राष्ट्र के प्रति समर्पण, देशभक्ति एवं बलिदान के सम्मान में बलिदान दिवस के रूप में मानती चली आ रही है। बहुमुखी प्रतिभा के धनी, राष्ट्रभक्त, दूरदर्शी, अमर शहीद, भारत को उसके पुरातन संस्कृति एवं दिशा की और उन्मुख करने वाले राजनीतिज्ञ डा.श्यामा प्रसाद मुखर्जी की प्रेरणादायक स्मृति को शत-शत नमन।
पीएम मोदी की अगली परीक्षा इतिहास को दोहराने की नहीं, बल्कि भविष्य को संवारने की चुनौती
मोदी और उनके विशाल समर्थक वर्ग के लिए अब समय आ गया है कि वे इस सोच से बाहर निकलें कि प्रधानमंत्री ने किसी की तुलना में देश के लिए क्या किया है
एबीएन सेंट्रल डेस्क। बीते सप्ताह यही बात खबरों में रही कि नरेंद्र मोदी ने निरंतर सबसे लंबी अवधि तक प्रधानमंत्री के रूप में पद संभालने का जवाहरलाल नेहरू का रिकॉर्ड तोड़ दिया। मोदी और नेहरू के बीच यह तुलना खूब होती रही है कि दरअसल किसने भारत के लिए क्या किया। अब वक्त आ गया है कि हम भविष्य की बात करें क्योंकि मोदी अभी भी पद पर हैं। उनके इस कार्यकाल में तीन वर्ष का समय बचा है और यकीनन वह 2029 का चुनाव भी लड़ेंगे और कौन जाने शायद 2034 का भी।
आखिर ट्रंप भी तमाम संवैधानिक सीमाओं के बावजूद अतीत में तीसरे कार्यकाल की बात कर ही चुके हैं, जबकि इसी महीने वह 80 वर्ष के होने वाले हैं। इसके अलावा व्लादीमिर पुतिन को पेइचिंग में तीन सितंबर 2025 को दूसरे विश्वयुद्ध की 80वीं सालगिरह पर आयोजित सैन्य परेड में माइक पर शी चिनफिंग से यह कहते सुना गया कि वर्तमान चिकित्सकीय प्रगति के साथ कोई चाहे तो 150 साल की उम्र तक शासन कर सकता है।
यह अनुमान उचित है कि मोदी इतने लंबे समय तक बने रहेंगे कि हम आगे आने वाली चुनौतियों पर विचार कर सकें। मैं पांच चुनौतियां सामने रखने वाला हूं। पहली चुनौती स्पष्ट है कि उन्हें अतीत से छुटकारा पाना होगा। नेहरू, इंदिरा या अन्य किसी से तुलना अब समाप्त होनी चाहिए। जब नेहरू का निधन हुआ तब मोदी 14 वर्ष के थे और मैं सात वर्ष का भी नहीं था।
अब से मोदी को उनके अपने युग से परिभाषित किया जाना चाहिए न कि उस युग से जो भारत में बहुत पहले आया था। सबसे लंबे समय तक लगातार निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में तुलना अब उनके पहले 12 वर्षों में किये गये कार्यों से होनी चाहिए। यदि वह एक स्थायी विरासत बनाना चाहते हैं, तो यह भारत के राजनीतिक इतिहास में सबसे बड़े नेहरू-विरोधी के रूप में नहीं हो सकती। यह उनके अपने नाम पर एक विरासत होगी।
इसके लिए उन्हें अतीत पर निर्भर रहना बंद करना होगा। आज का चालू या पूंजी खाता संकट, कमजोर होता रुपया अब इस तरह नहीं समझाया जा सकता कि क्या आप भूल गये कि 1991 या 2013 में संकट कितना बुरा था। क्या मोदी और भाजपा अब आगे बढ़ सकते हैं? यह अब मोदी की पहली चुनौती है।किसी भी लंबे कार्यकाल वाले प्रधानमंत्री की तरह मोदी ने भी अपने हिस्से के संकट देखे हैं।
इनमें से तीन वैश्विक थे: कोविड, यूक्रेन और पश्चिम एशिया के युद्ध। उनकी दूसरी चुनौती तीसरे से जुड़ी है। इतना शक्तिशाली नेता डॉनल्ड ट्रंप के शेष कार्यकाल से कैसे निपटेगा? अब तक वे उनसे समभाव से निबटते रहे हैं। मोदी यूरोप, और अमेरिका के दूसरे मित्र देशों से संकेत लेते हुए शांत रहने और किसी उकसावे में न आने की नीति अपनाते रहे हैं।
लेनदेन वाला पहलू और मजबूत होगा और भारत इसका प्रबंधन कर सकता है। जैसा कि पश्चिम एशिया का युद्ध दिखाता है, भारत ने पहले ही इजरायल, अमेरिका और संयुक्त अरब अमीरात के रूप में अपना पक्ष चुन लिया है। कोई ऐसा कहेगा नहीं लेकिन तथ्य यही बताते हैं। जल्दी ही अमेरिका के साथ कारोबारी समझौता हो सकता है। कारोबारी रिश्ते और व्यापार भारत के कारोबारी प्रमुखों के सक्रिय सहयोग से जारी रहेंगे।
आमतौर पर आप यह मानकर चल सकते हैं कि ट्रंप चाहे जितना उकसाएं, मोदी के आलोचक चाहे जितने ताने दें लेकिन मोदी उकसावे में नहीं आएंगे। हां, लेकिन बड़ा संकट कभी न कभी उभर सकता है। पाकिस्तान ने ट्रंप के लिए बहुत कुछ किया है, इसलिए वह केवल अपने फील्ड मार्शल की तारीफों से संतुष्ट होने वाला नहीं है। वह चाहता है कि कश्मीर का उल्लेख किया जाए चाहे वह जितने अस्पष्ट तरीके से आये।
चाहे वह केवल ट्रुथ सोशल की पोस्ट में आये। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की हालत खराब है और पश्चिमी मोर्चे पर संघर्ष छिड़ा हुआ है। उन्हें इन सबसे निजात पाने की जरूरत है। मुनीर की नजर में यह कश्मीर मुद्दे को उभार कर और घड़ी की सुइयों को वापस 5 अगस्त, 2019 की ओर ले जाने में है। मोदी इस चुनौती को लेकर क्या प्रतिक्रिया देंगे? उसका समय आ गया है और इसके लिए करीब ढाई साल का रणनीतिक धैर्य रखना होगा।
इसे उचित ठहराने के लिए और रणनीतिक धैर्य बनाए रखने के लिए हमें सैन्य शक्ति की जरूरत है। अगर मोदी अपने 12 साल के कार्यकाल की ओर पलट कर देखते हैं तथा नेहरू और 1962 को भूल जाते हैं तो उन्हें पता चलेगा कि उन्होंने रक्षा पर बहुत अधिक खर्च नहीं किया है। यहां तक कि उपलब्ध राशि को भी पूरी तरह खर्च नहीं किया गया क्योंकि खरीद को लेकर दिक्कतें मौजूद हैं।
काफी सुधार नजर आने वाला है। खासकर निजी क्षेत्र में खुलापन आने वाला है। लेकिन परिणाम आने में समय लगेगा। तब तक एक तात्कालिकता का भाव होना चाहिए क्योंकि मुनीर कभी भी फिर से संकट खड़ा कर सकते हैं। इसके लिए छह महीने, दो साल और पांच साल की योजना की आवश्यकता है। रणनीतिक और सामरिक शक्ति की नींव अर्थव्यवस्था है।
लंबे समय से भारत ने यह दावा करके खुद को सांत्वना दी है कि वह सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था है। लेकिन इतनी बड़ी जनसंख्या के लिए यह पर्याप्त नहीं है। प्रधानमंत्री को अपने न्यूनतम सरकार के वादों पर खरा उतरना होगा और वह स्पष्ट बयान भी सही साबित करना होगा जो उन्होंने महामारी के बाद दिया था।
उन्होंने कहा था कि चूंकि सरकार का कारोबार में कोई काम नहीं है इसलिए वह कुछ रणनीतिक क्षेत्रों को छोड़कर सभी क्षेत्रों से बाहर निकल जाएगी। इन वर्षों में इसका उल्टा हुआ है। कई नई सरकारी कंपनियां स्थापित की गयी हैं और आईडीबीआई की बिक्री जैसे सामान्य अवसर भी लंबित हैं। संकट के समय सरकार ने अपनी गलतियों को वापस लेने की क्षमता दिखाई है।
हम इसे मुक्त व्यापार समझौतों की बाढ़, बॉन्ड में विदेशी निवेश पर करों की वापसी और अब एक नयी उदार द्विपक्षीय निवेश संधि (बीआईटी) की चर्चा में देखते हैं जबकि पहले की सभी संधियां समाप्त कर दी गई थीं। किसी संकट से सीखने वाली और अपनी नीतियों को इतनी नाटकीय रूप से बदलने की इच्छा दिखाने वाली सरकार का होना एक अच्छा संकेत है। भारत को इसकी और भी ज्यादा जरूरत है।
खनन, हाइड्रोकार्बन अन्वेषण, शहरीकरण और यहां तक कि साधारण चीजों जैसे छत पर सौर ऊर्जा। इस क्षेत्र में पाकिस्तान हमसे कहीं आगे है। हमें प्रधानमंत्री द्वारा फरवरी 2024 में घोषित योजना (पीएम सूर्य घर योजना) को गति देने के लिए इससे प्रेरणा लेनी चाहिए। हिंदुत्व के साथ मिलकर यह वृद्धि दर जिसे हम हिंदुत्व वृद्धि दर कह सकते हैं शायद चुनाव जितवा दे। लेकिन यह भारत के लिए कमजोर प्रदर्शन होगा।
चौथी चुनौती, तब, वास्तव में सरकार को कारोबार से दूर करने की होगी। पांचवीं और अंतिम चुनौती राजनीतिक होनी चाहिए। मोदी-शाह संयोजन ने अब तक उल्लेखनीय कौशल दिखाया है। लोक सभा में 240 सीटों के अल्पमत से शुरू करके भी वे भारत को लगभग एक-दलीय प्रणाली में बदलने में सफल रहे। लेकिन राजनीति में चीजें हमेशा एक सी नहीं होतीं।
इस शक्ति का बड़ा हिस्सा नये सहयोगियों पर निर्भर है या अन्य छोटे दलों को तोड़ने पर। किसी समय कोई सहयोगी असंतोष दिखा सकता है, कोई मुख्यमंत्री बड़ी गड़बड़ी कर सकता है। खासकर राज्य की राजधानियों में पार्टी द्वारा चुने गये कुछ प्रतिभाशाली नेताओं को देखते हुए। भले ही भाजपा में कोई उत्तराधिकार की बात नहीं करे लेकिन 2029 के करीब आते-आते पार्टी में किसी प्रकार की प्राथमिक प्रक्रिया की फुसफुसाहट अनिवार्य रूप से शुरू होगी।
कम से कम चार दावेदार 2034 के लिए मौजूद होंगे, हालांकि तब वे भी अपनी उम्र के पांचवें या छठे दशक में होंगे। विपक्ष की वर्तमान स्थिति को देखते हुए कह सकते हैं कि मोदी की राजनीतिक चुनौतियां भाजपा के भीतर से उठेंगी। मोदी के सामने आने वाली पांच सबसे बड़ी चुनौतियां यही हैं। और याद रखिए कि इसमें सबसे पहले अतीत को भूलने की बात है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्- अर्थात शरीर ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का प्रथम साधन है। हजारों वर्ष पहले भारत के ऋषि-मुनियों ने इस सत्य को समझा और स्वस्थ शरीर के लिए एक सम्पूर्ण विज्ञान विकसित किया, जिसका नाम है आयुर्वेद। आयुर्वेद दो शब्दों से बना है- आयु: यानी जीवन और वेद यानी ज्ञान। अर्थात आयुर्वेद का शाब्दिक अर्थ है जीवन का विज्ञान। यह केवल रोगों की चिकित्सा नहीं, बल्कि स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा और रोगी के रोग का शमन करने की समग्र पद्धति है।
आयुर्वेद की उत्पत्ति वैदिक काल में हुई। चरक संहिता, सुश्रुत संहिता और अष्टांग हृदय इसके तीन प्रमुख ग्रंथ हैं। महर्षि चरक को चिकित्सा का पितामह और महर्षि सुश्रुत को शल्य चिकित्सा का जनक कहा जाता है। सुश्रुत संहिता में 300 से अधिक शल्य क्रियाओं और 120 शल्य उपकरणों का वर्णन मिलता है, जो दर्शाता है कि 2500 वर्ष पहले भी भारत में सर्जरी कितनी उन्नत थी।
आयुर्वेद का मूल आधार है त्रिदोष सिद्धांत- वात, पित्त और कफ। ये तीनों दोष पंचमहाभूतों यानी पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से बने हैं। जब ये तीनों दोष संतुलन में रहते हैं, तो शरीर स्वस्थ रहता है। असंतुलन ही रोग का कारण बनता है। आयुर्वेद हर व्यक्ति की प्रकृति को अलग मानता है। किसी की वात प्रकृति है, किसी की पित्त या कफ। इसलिए एक ही रोग की दवा हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकती है। यह वैयक्तिक चिकित्सा की अवधारणा आज का आधुनिक विज्ञान भी अपना रहा है।
आधुनिक एलोपैथी मुख्यत: रोग होने के बाद उपचार करती है। आयुर्वेद का मूल मंत्र है- स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणं, आतुरस्य विकार प्रशमनं। यानी पहले स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करो, फिर रोगी का इलाज करो। इसके लिए आयुर्वेद ने दिनचर्या, ऋतुचर्या और आहार-विहार के नियम बताए हैं। सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठना, उषापान, योग, तिल के तेल से अभ्यंग, सात्विक आहार, समय पर सोना- ये सब रसायन की तरह काम करते हैं और रोगों को पास नहीं आने देते।
कोविड-19 महामारी ने पूरी दुनिया को फिर से प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्युनिटी का महत्व समझाया। उसी दौर में भारत सरकार के आयुष मंत्रालय द्वारा बताये गये काढ़े, हल्दी वाला दूध, गिलोय, अश्वगंधा, तुलसी जैसे आयुर्वेदिक उपाय घर-घर में अपनाए गए। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी 2022 में गुजरात के जामनगर में ग्लोबल सेंटर फॉर ट्रेडिशनल मेडिसिन की स्थापना की, जो आयुर्वेद की वैश्विक स्वीकार्यता का प्रमाण है। आज 2026 में आयुर्वेदिक उत्पादों का वैश्विक बाजार 10 लाख करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच चुका है।
आज की भागदौड़, तनाव, जंक फूड और प्रदूषण ने मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा, अनिद्रा जैसी लाइफस्टाइल डिजीज को जन्म दिया है। एलोपैथी इनमें लक्षणों को नियंत्रित करती है, पर आयुर्वेद जड़ पर काम करता है। पंचकर्म जैसी शोधन चिकित्सा शरीर से विषाक्त तत्व निकालकर दोषों को संतुलित करती है। शिरोधारा, अभ्यंग, नस्य जैसी क्रियाएं तनाव और माइग्रेन में अत्यंत लाभकारी हैं। त्रिफला, अश्वगंधा, ब्राह्मी, शतावरी जैसे रसायन शरीर और मन दोनों को बल देते हैं।
आयुर्वेद के सामने सबसे बड़ी चुनौती है मानकीकरण और वैज्ञानिक प्रमाण की। हर काढ़ा, हर भस्म एक जैसी गुणवत्ता की हो, इसके लिए आधुनिक शोध, क्लिनिकल ट्रायल और गुणवत्ता नियंत्रण जरूरी है। अच्छी बात है कि आईआईटी, एम्स और सीएसआईआर जैसे संस्थान अब आयुर्वेद पर शोध कर रहे हैं। नयी शिक्षा नीति में भी आयुर्वेद को स्कूली पाठ्यक्रम से जोड़ा जा रहा है ताकि नयी पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ सके।
आयुर्वेद कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि अनुभव और परीक्षण पर आधारित विज्ञान है। यह हमें सिखाता है कि हम प्रकृति का हिस्सा हैं, प्रकृति से अलग नहीं। जब हम प्रकृति के नियमों के विरुद्ध जाते हैं, तो रोग आते हैं। आज जब पूरी दुनिया होलिस्टिक हेल्थ और सस्टेनेबल लिविंग की बात कर रही है, तो आयुर्वेद के पास हर प्रश्न का उत्तर है। आवश्यकता है इसे अंधानुकरण नहीं, बल्कि विवेक और विज्ञान के साथ अपनाने की। जैसा कि चरक संहिता में कहा गया है — धर्मार्थ काम मोक्षाणा मारोग्यं मूलमुत्तमम्। अर्थात धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का मूल आधार आरोग्य ही है। आइये, आयुर्वेद को अपनाकर हम स्वस्थ भारत, समर्थ भारत के स्वप्न को साकार करें।
Subscribe to our website and get the latest updates straight to your inbox.
टीम एबीएन न्यूज़ २४ अपने सभी प्रेरणाश्रोतों का अभिनन्दन करता है। आपके सहयोग और स्नेह के लिए धन्यवाद।
© www.abnnews24.com. All Rights Reserved. Designed by Inhouse