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Published / 2026-04-30 19:16:40
चमकते भारत के पीछे थके हुए हाथ

  • चमकते भारत के पीछे थके हुए हाथ
  • विशेष- मजदूर दिवस 2026: चमकते भारत के पीछे थके हुए हाथ

राजकुमारी पाण्डेय

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। पहली मई का दिन हर वर्ष हमारे सामने एक ऐसा आईना लेकर आता है, जिसमें हम अपने समाज और विकास की वास्तविक तस्वीर देख सकते हैं। यह दिन केवल उत्सव का नहीं, बल्कि आत्ममंथन का दिन है। जब हम मजदूर दिवस कहते हैं, तो यह शब्द अपने भीतर केवल एक वर्ग का उल्लेख नहीं करता, बल्कि उस व्यापक मानव समुदाय का प्रतिनिधित्व करता है, जिसकी मेहनत, धैर्य और संघर्ष ने आधुनिक दुनिया की नींव रखी है। 

सड़कों की चकाचौंध, शहरों की रफ्तार, उद्योगों की निरंतरता और खेतों की हरियाली इन सबके पीछे एक समान तत्व है और वह है श्रम। इतिहास हमें बताता है कि श्रमिकों के अधिकारों की यात्रा सरल नहीं रही है। औद्योगिक क्रांति के समय जब उत्पादन के साधन तेजी से विकसित हो रहे थे, तब श्रमिकों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। काम के घंटे अनिश्चित थे, मजदूरी अत्यंत कम थी और कार्यस्थल की सुरक्षा का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं था। 

श्रमिकों को केवल उत्पादन के एक साधन के रूप में देखा जाता था, न कि एक संवेदनशील और अधिकार-संपन्न इंसान के रूप में। ऐसे समय में जब मजदूरों ने अपने अधिकारों के लिए आवाज उठायी, तब यह केवल आर्थिक सुधार की मांग नहीं थी, बल्कि यह मानव गरिमा की पुनर्स्थापना का संघर्ष था। आठ घंटे कार्यदिवस की मांग, जो आज हमें सामान्य लगती है, एक समय में एक क्रांतिकारी विचार थी।

 इसके पीछे वह सोच थी कि मनुष्य केवल काम करने के लिए नहीं बना है, बल्कि उसे विश्राम, परिवार और व्यक्तिगत विकास के लिए भी समय चाहिए। इस विचार ने श्रम के प्रति दृष्टिकोण को बदलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मजदूर दिवस इसी ऐतिहासिक चेतना का प्रतीक है, जो हमें यह याद दिलाता है कि जो अधिकार आज हमें सहज लगते हैं, वे किसी समय संघर्ष और बलिदान के परिणाम थे। भारत के संदर्भ में मजदूर दिवस का महत्व और भी व्यापक हो जाता है। 

यहां श्रमिक वर्ग अत्यंत विविधतापूर्ण है कृषि मजदूर, निर्माण कार्य में लगे श्रमिक, कारखानों में काम करने वाले कर्मचारी, घरेलू कामगार, रिक्शा चालक, छोटे व्यापारों में लगे सहायक और अब डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े गिग वर्कर ये सभी उस व्यापक श्रम शक्ति का हिस्सा हैं, जो देश की अर्थव्यवस्था को चलाती है। लेकिन इस विविधता के साथ एक बड़ी चुनौती भी जुड़ी है असमानता। भारत में श्रमिकों का एक बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र में कार्यरत है। 

इस क्षेत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ रोजगार की कोई स्थिरता नहीं होती, वेतन अनिश्चित होता है और सामाजिक सुरक्षा का अभाव होता है। यह वह वर्ग है, जो रोज कमाता है और रोज खाता है। इनके जीवन में किसी भी प्रकार की आर्थिक या सामाजिक अस्थिरता सीधे उनके अस्तित्व को प्रभावित करती है। मजदूर दिवस के अवसर पर यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हमारे विकास मॉडल में इस वर्ग के लिए पर्याप्त स्थान है? बीते कुछ दशकों में भारत ने आर्थिक विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है।

बुनियादी ढांचे का विस्तार हुआ है, उद्योगों का विकास हुआ है और तकनीकी क्षेत्र में नयी ऊंचाइयां प्राप्त की गयी हैं। लेकिन इस विकास के साथ एक विडंबना भी जुड़ी है आर्थिक वृद्धि के लाभ समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से नहीं पहुंच पाये हैं। श्रमिक वर्ग, विशेष रूप से असंगठित क्षेत्र के श्रमिक, आज भी उस स्तर की सुरक्षा और सम्मान से वंचित हैं, जिसकी उन्हें आवश्यकता है। तकनीकी परिवर्तन ने इस स्थिति को और जटिल बना दिया है। 

स्वचालन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने उत्पादन प्रक्रियाओं को अधिक दक्ष बना दिया है, लेकिन इसके साथ ही पारंपरिक रोजगार के अवसरों में कमी भी आयी है। गिग इकॉनमी और फ्रीलांस कार्य ने रोजगार के नये अवसर तो प्रदान किये हैं, लेकिन इनकी प्रकृति अस्थायी और अनिश्चित है। ऐसे में श्रमिकों के सामने यह चुनौती है कि वे लगातार बदलती परिस्थितियों के अनुरूप खुद को ढालें। 

इस संदर्भ में कौशल विकास और शिक्षा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि श्रमिकों को नयी तकनीकों और कार्य पद्धतियों के अनुरूप प्रशिक्षित किया जाये, तो वे न केवल अपनी आजीविका को सुरक्षित कर सकते हैं, बल्कि अपने जीवन स्तर को भी बेहतर बना सकते हैं। लेकिन इसके लिए आवश्यक है कि प्रशिक्षण कार्यक्रम केवल औपचारिक न हों, बल्कि वे वास्तव में श्रमिकों की जरूरतों के अनुरूप हों। 

कोविड-19 महामारी ने श्रमिकों की स्थिति को एक नयी दृष्टि से देखने का अवसर प्रदान किया। जब पूरे देश में लॉकडाउन लागू हुआ, तब सबसे अधिक प्रभावित वही वर्ग हुआ, जो पहले से ही सबसे कमजोर था। लाखों प्रवासी श्रमिकों का शहरों से अपने गाँवों की ओर पलायन एक ऐसी घटना थी, जिसने पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया। यह केवल एक मानवीय संकट नहीं था, बल्कि यह हमारी आर्थिक और सामाजिक संरचना की कमजोरियों का भी प्रतीक था। 

इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि श्रमिकों के लिए केवल रोजगार उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके जीवन की स्थिरता और सुरक्षा सुनिश्चित करना भी आवश्यक है। सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का विस्तार, स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता, और संकट के समय सहायता प्रदान करने के लिए प्रभावी तंत्र ये सभी ऐसे कदम हैं, जो श्रमिकों के जीवन को अधिक सुरक्षित बना सकते हैं। 

मजदूर दिवस का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह हमें श्रम के प्रति अपने दृष्टिकोण को बदलने के लिए प्रेरित करता है। आज भी समाज में शारीरिक श्रम को कमतर आंका जाता है, जबकि वास्तविकता यह है कि हर प्रकार का श्रम समान रूप से महत्वपूर्ण है। एक इंजीनियर की योजना तब तक अधूरी है, जब तक उसे जमीन पर उतारने वाला श्रमिक न हो। एक किसान की मेहनत के बिना शहरों का जीवन संभव नहीं है। 

इसलिए यह आवश्यक है कि हम श्रम के प्रति सम्मान की भावना विकसित करें। नीतिगत स्तर पर श्रमिकों के कल्याण के लिए कई प्रयास किये गये हैं। श्रम कानूनों में सुधार, सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का विस्तार और कौशल विकास कार्यक्रमों की शुरूआत ये सभी सकारात्मक कदम हैं। लेकिन इनकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वे कितनी प्रभावी ढंग से लागू होते हैं। 

अक्सर देखा गया है कि योजनाओं का लाभ उन लोगों तक नहीं पहुंच पाता, जिनके लिए वे बनायी गयी हैं। इसके अलावा, निजी क्षेत्र और उद्योगों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। यदि उद्योग श्रमिकों को केवल उत्पादन का साधन मानते रहेंगे, तो समावेशी विकास का लक्ष्य प्राप्त नहीं किया जा सकता। श्रमिकों को सुरक्षित कार्य वातावरण, उचित वेतन और सम्मानजनक व्यवहार प्रदान करना केवल कानूनी दायित्व नहीं, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी भी है। 

मजदूर दिवस हमें यह सोचने के लिए भी प्रेरित करता है कि क्या हमारा समाज वास्तव में समावेशी है। क्या हम अपने दैनिक जीवन में उन लोगों के योगदान को पहचानते हैं, जो हमारे जीवन को आसान बनाते हैं? क्या हम उन्हें केवल सेवा प्रदाता के रूप में देखते हैं, या एक ऐसे इंसान के रूप में, जिसकी अपनी भावनाएं, आकांक्षाएं और अधिकार हैं? मजदूर दिवस एक चेतावनी भी है और एक अवसर भी। 

चेतावनी इस बात की कि यदि हम श्रमिकों की उपेक्षा करते हैं, तो विकास की पूरी संरचना असंतुलित हो जायेगी। और अवसर इस बात का कि हम एक ऐसा समाज बना सकते हैं, जहां श्रम को उसका उचित सम्मान मिले, श्रमिकों को सुरक्षा और अवसर प्राप्त हों, और विकास की प्रक्रिया वास्तव में सबके लिए लाभकारी हो।

Published / 2026-04-28 23:11:38
आत्मा की अभिव्यक्ति और संस्कृति की शाश्वत धारा नृत्य

  • आत्मा की अभिव्यक्ति और संस्कृति की शाश्वत धारा नृत्य
  • विश्व नृत्य दिवस 29 अप्रैल विशेष 

डॉ. दीपक प्रसाद

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। अंतर्राष्ट्रीय नृत्य दिवस हर वर्ष 29 अप्रैल को मनाया जाने वाला केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि मानव सभ्यता की उस जीवंत परंपरा का स्मरण है, जिसमें देह, मन और आत्मा एकाकार होकर सृजन की पराकाष्ठा को स्पर्श करते हैं। नृत्य मानव की सबसे प्राचीन अभिव्यक्तियों में से एक है। एक ऐसी भाषा, जिसे शब्दों की आवश्यकता नहीं होती, परंतु जो भावों की सम्पूर्णता को संप्रेषित कर देती है। 

नृत्य की उत्पत्ति उतनी ही प्राचीन है जितनी स्वयं मानव सभ्यता। आदिमानव ने जब पहली बार प्रकृति के साथ संवाद स्थापित किया, तब उसके आनंद, भय, विजय और उत्सव के भाव देह की गतियों में प्रकट हुए। गुफा चित्रों, सिंधु घाटी सभ्यता की मूर्तियों विशेषकर नर्तकी की कांस्य प्रतिमा से यह स्पष्ट होता है कि नृत्य का अस्तित्व हजारों वर्ष पूर्व भी था। भारतीय परंपरा में नृत्य को दिव्यता से जोड़ा गया है। 

भगवान शिव का नटराज रूप सृष्टि, स्थिति और संहार के चक्र को नृत्य के माध्यम से ही अभिव्यक्त करता है। यही नहीं, वैदिक युग में भी नृत्य यज्ञों और अनुष्ठानों का अभिन्न अंग था। भारतीय शास्त्रीय परंपरा में नृत्य और नृत के बीच सूक्ष्म किंतु महत्वपूर्ण अंतर है नृत शुद्ध शारीरिक गतियों का प्रदर्शन, जिसमें भाव या कथा का अभाव होता है। यह तकनीकी दक्षता और ताल-लय की सटीकता पर आधारित होता है। वहीं नृत्य इसमें भाव, रस और अभिव्यक्ति का समावेश होता है। यह दर्शकों के साथ संवाद स्थापित करता है।

इसके अतिरिक्त नाट्य में कथा, अभिनय और संवाद का समावेश होता है। यह त्रिविध विभाजन भारतीय नृत्य की वैज्ञानिकता और गहनता को दर्शाता है। भारतीय नृत्य की आधारशिला नाट्यशास्त्र में निहित है, जिसे भरतमुनि ने रचा। इसमें नृत्य के अंग, उपांग, मुद्राएं, रस, भाव और अभिनय के नियमों का विस्तृत वर्णन है। रस सिद्धांत के अनुसार नृत्य का उद्देश्य दर्शकों में भावों का संचार करना है। श्रृंगार, वीर, करुण, रौद्र, हास्य, भयानक, बीभत्स और अद्भुत। 

नर्तक की देह, नेत्र, मुखमुद्राएं और हस्तमुद्राएं मिलकर इन भावों को सजीव करती हैं। नृत्य का आध्यात्मिक आयाम भारतीय दृष्टि में नृत्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि साधना है। यह योग की तरह आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का माध्यम है। भक्ति आंदोलन में मीराबाई, चैतन्य महाप्रभु जैसे संतों ने नृत्य को ईश्वर भक्ति का साधन बनाया। नृत्य में लय और ताल का समन्वय ब्रह्मांड की गति का प्रतीक है। भारत में शास्त्रीय नृत्य की परंपरा हजारों वर्ष पुराना है।

भारत विविधताओं का देश है, और यहां नृत्य की परंपरा अत्यंत समृद्ध है। यहां की प्रमुख शास्त्रीय नृत्य शैलियां हैं तमिलनाडु भरतनाट्यम, केरल कथकली, मोहिनीअट्टम, उत्तर प्रदेश कथक, ओडिशा ओडिसी, आंध्र प्रदेश कुचिपुड़ी, मणिपुर मणिपुरी, असम सत्रिया इन सभी नृत्य शैलियों की अपनी विशिष्ट शैली, वेशभूषा, संगीत और कथा परंपरा है, किंतु इनका मूल आधार नाट्यशास्त्र ही है। जनजीवन की धड़कन कहीं जाने वाली जो नृत्य है वह है लोक नृत्य।

यदि शास्त्रीय नृत्य आत्मा की साधना है, तो लोक नृत्य जनजीवन की धड़कन है। भारत के प्रत्येक राज्य में लोक नृत्य की अपनी अलग पहचान है जैसे पंजाब भांगड़ा, गिद्धा, गुजरात गरबा, डांडिया, राजस्थान घूमर, बिहार झूमर, जट-जटिन, झारखंड, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल छऊ, लोक नृत्य समाज के उत्सव, कृषि, विवाह और धार्मिक अनुष्ठानों से जुड़े होते हैं। इनमें सहजता, सामूहिकता और आनंद की प्रधानता होती है। झारखंड की धरती नृत्य और संगीत की जीवंत प्रयोगशाला है। यहां के जनजातीय समुदायों के जीवन में नृत्य केवल कला नहीं, बल्कि जीवन पद्धति है। 

झारखण्ड के प्रमुख लोक नृत्य है छऊ नृत्य (सरायकेला) झ्र मुखौटा नृत्य, जिसमें वीरता और पौराणिक कथाओं का प्रदर्शन होता है। जोहड़ा (झूमर) महिलाओं द्वारा किया जाने वाला सौंदर्यपूर्ण नृत्य। डोमकच विवाह अवसर का उल्लासपूर्ण नृत्य। करमा नृत्य प्रकृति और वृक्ष पूजा से जुड़ा हुआ। पाइका नृत्य युद्ध कौशल का प्रतीक माना जाता है। इन नृत्यों में प्रकृति के साथ गहरा संबंध दिखाई देता है। जंगल, पहाड़, नदियां और ऋतु परिवर्तन सभी नृत्य के भावों में समाहित हैं। 

नृत्य न केवल मनोरंजन का माध्यम है, बल्कि यह व्यक्तित्व विकास, शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन का भी सशक्त साधन है। शिक्षा के क्षेत्र में नृत्य आत्मविश्वास बढ़ाता है, अनुशासन सिखाता है, सांस्कृतिक चेतना विकसित करता है, सृजनात्मकता को प्रोत्साहित करता है। आज के डिजिटल युग में जहां मानवीय संवेदनाएं क्षीण होती जा रही हैं, वहां नृत्य हमें हमारी जड़ों से जोड़ता है।

वैश्वीकरण और पाश्चात्य प्रभाव के कारण पारंपरिक नृत्य शैलियां संकट का सामना कर रही हैं। युवा पीढ़ी का झुकाव आधुनिक और फ्यूजन नृत्य की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में आवश्यक है कि विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में नृत्य शिक्षा को बढ़ावा दिया जाए, लोक कलाकारों को मंच और सम्मान मिले, डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग कर परंपराओं को संरक्षित किया जाए।

अंतर्राष्ट्रीय नृत्य दिवस हमें यह याद दिलाता है कि नृत्य केवल कला नहीं, बल्कि जीवन की लय है। यह शरीर की गति में आत्मा की अभिव्यक्ति है। झारखंड जैसे सांस्कृतिक रूप से समृद्ध प्रदेश में नृत्य की परंपरा न केवल अतीत की धरोहर है, बल्कि भविष्य की दिशा भी है। आज आवश्यकता है कि हम नृत्य को केवल मंच तक सीमित न रखें, बल्कि इसे अपने जीवन का हिस्सा बनाएं—ताकि हमारी संस्कृति, हमारी पहचान और हमारी आत्मा सदैव गतिमान बनी रहे। (लेखक असिस्टेंट प्रोफेसर, सांस्कृतिक शोधकर्ता और रंगनिर्देशक हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

Published / 2026-04-24 21:52:03
जानलेवा हो सकती है मलेरिया के इलाज में लापरवाही

  • जानलेवा हो सकती है मलेरिया के इलाज में लापरवाही
  • विश्व मलेरिया दिवस (25 अप्रैल) पर विशेष

योगेश कुमार गोयल

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। मलेरिया एक गंभीर और कभी-कभी प्राणघातक हो जाने वाली बीमारी है, जो आमतौर पर एक निश्चित प्रकार के मच्छर को संक्रमित करने वाले परजीवी के कारण होती है और इन संक्रमित मच्छरों के काटने से मलेरिया होता है। अमेरिका से करीब 70 साल पहले ही मलेरिया को पूरी तरह खत्म घोषित कर दिया गया था लेकिन अभी भी प्रतिवर्ष दो हजार अमेरिकी इससे संक्रमित होते हैं। भारत में तो हर साल लाखों लोग मलेरिया से संक्रमित होते हैं।

चिंता की स्थिति यह है कि दुनियाभर में मलेरिया से हर साल लाखों लोग मौत के मुंह में समा रहे हैं, जिनमें ज्यादातर छोटे बच्चे हैं। पांच साल से कम उम्र के बच्चे मलेरिया से असमान रूप से प्रभावित होते हैं, जो मलेरिया से होने वाली कुल मौतों का करीब 82 प्रतिशत है। 2021 में मलेरिया से दुनियाभर में 6.19 लाख लोगों की मौत हुई थी जबकि 2022 में 6.08 लाख लोग मलेरिया के कारण मारे गये और 2024 में मलेरिया से 6.1 लाख मौतें दर्ज की गयी।

हालांकि मलेरिया ऐसी बीमारी है, जिसकी रोकथाम करके बड़ी संख्या में होने वाली इन मौतों को रोका जा सकता है लेकिन यह दुनियाभर में रोकी जा सकने वाली बीमारी और मृत्यु का एक प्रमुख कारण बना हुआ है। इसीलिए मलेरिया को लेकर लोगों में जागरूकता पैदा करने के उद्देश्य से 2008 से ही 25 अप्रैल को एक खास विषय के साथ विश्व मलेरिया दिवस मनाया जाता है। इस वर्ष मलेरिया दिवस की थीम है- मलेरिया को समाप्त करने के लिए प्रतिबद्ध अब हम कर सकते हैं। अब हमें करना ही होगा। इसका प्रमुख संदेश यही है कि मलेरिया मुक्त विश्व के लक्ष्य को प्राप्त करना है। 

भेदभाव और कलंक को खत्म करना, स्वास्थ्य संबंधी निर्णय लेने में समुदायों को शामिल करना, प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल के माध्यम से स्वास्थ्य देखभाल को उस स्थान के करीब लाना, जहां लोग रहते हैं और काम करते हैं, मलेरिया के खतरे को बढ़ाने वाले कारकों को संबोधित करना, सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज में मलेरिया नियंत्रण हस्तक्षेप इत्यादि मलेरिया दिवस मनाने के प्रमुख उद्देश्य हैं। दरअसल, विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि हर किसी को मलेरिया की रोकथाम, पता लगाने और इलाज के लिए गुणवत्तापूर्ण, समय पर और सस्ती सेवाओं का अधिकार तो है लेकिन यह सभी के लिए वास्तविकता नहीं है। 

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार दुनियाभर में मलेरिया के बीस करोड़ से भी ज्यादा नए मामले दर्ज किये जाते हैं, जिनमें से कई लाख लोगों की हर साल मौत हो जाती है। हालांकि स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि मलेरिया की रोकथाम के मामले में बीते कुछ वर्षों में महत्वपूर्ण प्रगति तो हुई है लेकिन मलेरिया के खिलाफ लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है और मलेरिया मुक्त विश्व के लक्ष्य को प्राप्त करना अभी भी गंभीर चुनौती है। चिंता का विषय यह भी है कि प्रभावित क्षेत्रों में यह बीमारी स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों और अर्थव्यवस्थाओं पर बड़ा बोझ भी डालती है।

मलेरिया एनोफेलीज मादा मच्छर के काटने से होता है, जो प्लाज्मोडियम परजीवी से संक्रमित होता है और जब यह मच्छर किसी को काटता है तो ये परजीवी मानव रक्त में प्रवेश करके लिवर तथा लाल रक्त कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाने लगते हैं और व्यक्ति को बीमार बना देते हैं। इस रोग की गंभीरता परजीवी पर ही निर्भर करती है। मनुष्यों में सबसे आम मलेरिया परजीवी प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम है, जो बीमारी के सबसे घातक रूप के लिए जिम्मेदार है। एनोफेलीज मच्छर वाहक के रूप में कार्य करते हैं, जब वे एक संक्रमित व्यक्ति को काटते हैं और फिर दूसरे व्यक्ति को काटते हैं तो परजीवियों को प्रसारित करते हैं। 

जब परजीवी एक बार मानव शरीर के अंदर यकृत में चले जाते हैं तो ये लाल रक्त कोशिकाओं के अंदर गुणन करते हैं, जिससे कई प्रकार के लक्षण पैदा होते हैं। मनुष्यों को मलेरिया के चार मुख्य प्रकार (प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम, प्लाज्मोडियम विवैक्स, प्लाज्मोडियम ओवले और प्लाज्मोडियम मलेरिया) संक्रमित करते हैं। प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम सबसे खतरनाक प्रकार है जबकि मलेरिया के अन्य प्रकार आमतौर पर हल्की बीमारी का कारण बनते हैं।

गंभीर मलेरिया गंभीर एनीमिया, गुर्दे की विफलता, दौरे, कोमा और यहां तक कि मृत्यु जैसी जटिलताओं का कारण भी बन सकता है, खासकर यदि तुरंत निदान और इलाज नहीं किया जाये। हालांकि दुनियाभर में शोधकर्ता मलेरिया को नियंत्रित करने और अंतत: खत्म करने के लिए टीकों और अन्य नवीन समाधानों पर काम कर रहे हैं लेकिन इसकी रोकथाम के मुख्य उपायों में उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में मच्छरदानी, कीट विकर्षक और मलेरिया-रोधी दवाओं का उपयोग करना शामिल है। 

जटिलताओं और मृत्यु को रोकने के लिए प्रभावी मलेरिया-रोधी दवाओं के साथ शीघ्र निदान और उपचार महत्वपूर्ण है। मलेरिया होने पर आमतौर पर तेज बुखार होता है, जो 103 से 105 डिग्री तक हो सकता है। सिरदर्द, बदन दर्द, घबराहट, अत्यधिक पसीना आना, जी मिचलाना, उल्टी होना, अत्यधिक ठंड लगना, कमजोरी इत्यादि मलेरिया के अन्य प्रमुख लक्षण हैं। इन लक्षणों को लंबे समय तक नजरअंदाज करना भी खतरनाक हो सकता है। 

वैसे तो मलेरिया के लक्षण प्राय: 24 से 48 घंटे में ही नजर आ सकते हैं लेकिन कई बार लक्षण सामने आने में ज्यादा समय भी लग सकता है। मलेरिया की जांच से ही पता चल पाता है कि मरीज किस तरह के मलेरिया से ग्रसित है और उसी के आधार पर विभिन्न दवाओं से उसका इलाज शुरू किया जाता है। साधारण मलेरिया होने पर सही इलाज से मरीज 3-5 दिनों में ठीक हो सकता है लेकिन यदि सीवियर फाल्सीपेरम मलेरिया हुआ तो समय पर और सही इलाज नहीं कराने पर मरीज की मौत भी हो सकती है।

इसलिए बेहद जरूरी है कि मलेरिया की जांच और इलाज में कोताही न बरतें। गर्मी और मानूसन के दौरान मच्छरों की संख्या बहुत बढ़ जाती है, इसलिए आमतौर पर मलेरिया इन्हीं मौसम में सबसे ज्यादा होता है। वैसे मलेरिया के मच्छर अधिकांशत: उन्हीं जगहों पर पनपते हैं, जहां गंदगी होती है या गंदा पानी जमा होता है। इसलिए मलेरिया की रोकथाम के लिए सबसे जरूरी है कि अपने घरों में तथा आसपास गंदगी और गंदा पानी एकत्र न होने दें। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

Published / 2026-04-24 18:02:38
शिक्षा और स्थानीय ज्ञान से ही संभव है मलेरिया उन्मूलन

  • शिक्षा और स्थानीय ज्ञान से ही संभव है मलेरिया उन्मूलन
  • विश्व मलेरिया दिवस (25 अप्रैल) विशेष 

डॉ. दीपक प्रसाद

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। हर वर्ष 25 अप्रैल को पूरी दुनिया विश्व मलेरिया दिवस के रूप में मनाती है। यह दिन केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि मानव सभ्यता को सदियों से चुनौती देती आ रही एक घातक बीमारी मलेरिया के विरुद्ध वैश्विक संकल्प का प्रतीक है। 

वर्ष 2007 में वर्ल्ड हेल्थ आॅगेर्नाइजेशन द्वारा इसकी शुरुआत की गयी थी, ताकि दुनिया भर में इस बीमारी के प्रति जागरूकता बढ़ायी जा सके और इसके उन्मूलन की दिशा में ठोस प्रयास किये जा सकें। मलेरिया, प्लाज्मोडियम नामक परजीवी से फैलने वाली बीमारी है, जो मादा एनोफिलीज मच्छर के काटने से मनुष्य के शरीर में प्रवेश करती है। आज भी यह बीमारी दुनिया के कई विकासशील देशों के लिए गंभीर चुनौती बनी हुई है। 

ताजा वैश्विक आंकड़ों के अनुसार हर वर्ष लगभग 20-25 करोड़ लोग मलेरिया से संक्रमित होते हैं, करीब 6 लाख से अधिक लोगों की मृत्यु हो जाती है। इनमें अधिकतर अफ्रीका और दक्षिण एशिया के गरीब और ग्रामीण क्षेत्र प्रभावित होते हैं। भारत की स्थिति पर नजर डालें तो पिछले कुछ वर्षों में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। भारत ने मलेरिया के मामलों में बड़ी गिरावट दर्ज की है, लेकिन अभी भी देश पूरी तरह सुरक्षित नहीं है।

भारत ने राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम  के माध्यम से मलेरिया नियंत्रण में महत्वपूर्ण प्रगति की है। सरकार का लक्ष्य वर्ष 2030 तक मलेरिया उन्मूलन का है। फिर भी चुनौतियां बनी हुई हैं, दूर-दराज ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्र। स्वच्छ जल और स्वच्छता की कमी, स्वास्थ्य सुविधाओं तक सीमित पहुंच, जागरूकता का अभाव। बात अगर हम झारखंड की करें तो झारखंड जैसे राज्य में मलेरिया एक गंभीर जनस्वास्थ्य समस्या के रूप में उपस्थित है। 

इसके पीछे कई कारण हैं, घने जंगल और आर्द्र जलवायु, आदिवासी बहुल क्षेत्र, जहां स्वास्थ्य सेवाएं सीमित हैं। जलभराव और साफ-सफाई की कमी। राज्य के कई जिले जैसे सिमडेगा, गुमला, गोड्डा, लातेहार और पश्चिमी सिंहभूम मलेरिया के हॉटस्पॉट माने जाते रहे हैं। हालांकि, राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग द्वारा किये गये प्रयासों से स्थिति में सुधार आया है जैसे मच्छरदानी का वितरण, आशा कार्यकर्ताओं के माध्यम से घर-घर जांच। 

इसके बावजूद भी अगर नियमित फॉगिंग और दवा छिड़काव चाहे गांव हो या शहर होता रहे तो इस ओर बहुत सुधार हो सकेगा। फिर भी, हर वर्ष झारखंड में सैकड़ों लोगों की जान इस बीमारी के कारण चली जाती है जो इस बात का संकेत है कि अभी और सतत प्रयास आवश्यक हैं फाइलों में नहीं धरातल पर। मलेरिया कोई नई बीमारी नहीं है। इसका उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में भी मिलता है आयुर्वेद में इसे विषम ज्वर कहा गया है। 

चरक संहिता और सुश्रुत संहिता में इसके लक्षण और उपचार का वर्णन मिलता है। झारखंड की आदिवासी संस्कृति में भी प्राकृतिक उपायों का उल्लेख मिलता है। नीम, तुलसी, गिलोय जैसी औषधियों का प्रयोग घरों के आसपास धुआं करके मच्छरों को भगाना, जल स्रोतों को साफ रखना ये पारंपरिक उपाय आज भी प्रासंगिक हैं, लेकिन आधुनिक चिकित्सा के साथ इनका समन्वय आवश्यक है। 

बचाव ही सबसे बड़ा उपचार है। मलेरिया का सबसे प्रभावी इलाज उसका बचाव है, व्यक्तिगत स्तर पर मच्छरदानी का नियमित उपयोग, पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनना, घर के आसपास पानी जमा न होने देना, समय-समय पर स्वास्थ्य जांच कराना, सामुदायिक स्तर पर स्वच्छता अभियान चलाना। जल निकासी की उचित व्यवस्था करना। 

नियमित सरकार द्वारा गली, मोहल्लों, गांवों, शहरों में फॉगिंग होना अति आवश्यक है। यदि मलेरिया को जड़ से समाप्त करना है, तो शिक्षा को केंद्र में रखना होगा। स्कूल और कॉलेज एवं किसी भी प्रकार की शिक्षण संस्थाओं की भूमिका तय करनी होगी। पाठ्यक्रम में स्वास्थ्य शिक्षा को शामिल करना, मलेरिया जागरूकता सप्ताह का आयोजन करना। नाटक, पोस्टर, रैली और नुक्कड़ नाटक के माध्यम से रोकथाम के लिए प्रचार प्रसार करना। 

मलेरिया से लड़ाई केवल सरकार की नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग की जिम्मेदारी है। विविध प्रकार से जागरूकता फैलाने के उपाय ढूंढ़ा जा सकता है जैसे पंचायत स्तर पर बैठकें हो, सोशल मीडिया और रेडियो का उपयोग करके, स्थानीय भाषा और लोक कला के माध्यम से संदेश फैलाकर। मलेरिया केवल एक बीमारी नहीं, बल्कि यह हमारे सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक ढांचे की परीक्षा है। 

यदि हम इसे हराना चाहते हैं, तो हमें सरकार, समाज, शिक्षा और संस्कृति सभी को एक साथ जोड़ना होगा। विश्व मलेरिया दिवस हमें यह याद दिलाता है कि स्वास्थ्य केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी है। झारखंड जैसे राज्यों में यदि हम स्थानीय परंपराओं, आधुनिक चिकित्सा और शिक्षा को एक सूत्र में पिरो दें, तो वह दिन दूर नहीं जब मलेरिया केवल इतिहास का एक अध्याय बनकर रह जायेगा। (लेखक असिस्टेंट प्रोफेसर, सांस्कृतिक शोधकर्ता और रंगनिर्देशक हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

Published / 2026-04-21 12:40:00
युद्ध नहीं, धरती के संरक्षण का संकल्प

विश्व पृथ्वी दिवस के उपलक्ष में

युद्ध नहीं, धरती के संरक्षण का संकल्प

डॉ. दीपक प्रसाद

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। हर वर्ष 22 अप्रैल को मनाया जाने वाला विश्व पृथ्वी दिवस केवल एक औपचारिक अवसर नहीं है, बल्कि यह हमारी चेतना को जगाने का दिन है, यह याद दिलाने का दिन है कि यह पृथ्वी ही हमारा एकमात्र घर है। आज जब पूरी दुनिया तकनीकी प्रगति और विकास की दौड़ में आगे बढ़ रही है, उसी समय युद्ध, संघर्ष और पर्यावरणीय विनाश की भयावह छाया भी इस धरती को लगातार कमजोर कर रही है।

वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में युद्धों की विभीषिका केवल मानव जीवन को ही नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को गहरी चोट पहुँचा रही है। बमों की गूंज, रासायनिक हथियारों का उपयोग, जंगलों का विनाश, जल स्रोतों का प्रदूषण ये सब मिलकर पृथ्वी को एक असंतुलित और असुरक्षित स्थिति में धकेल रहे हैं। युद्ध का प्रभाव केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका असर हवा, पानी, मिट्टी, पशु-पक्षियों और आने वाली पीढ़ियों तक फैलता है।

भारतीय संस्कृति में पृथ्वी को माता का दर्जा दिया गया है। हमारे ऋषि-मुनियों ने सदैव प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीने की प्रेरणा दी। पेड़-पौधों, नदियों, पर्वतों और जीव-जंतुओं को पूजनीय माना गया। लेकिन आधुनिकता के अंधाधुंध विस्तार और उपभोगवादी मानसिकता ने इस संतुलन को तोड़ दिया है। आज मनुष्य विकास के नाम पर जंगल काट रहा है, नदियों को प्रदूषित कर रहा है और जीव-जंतुओं के अस्तित्व को खतरे में डाल रहा है। युद्ध इस विनाश को और तेज कर देता है।

युद्ध केवल राजनीतिक या सामरिक मुद्दा नहीं है, यह पर्यावरणीय संकट का भी सबसे बड़ा कारण है। युद्ध के दौरान भारी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन होता है, जिससे जलवायु परिवर्तन तेज होता है। रासायनिक और परमाणु हथियारों से मिट्टी और जल स्रोत लंबे समय तक प्रदूषित रहते हैं। लाखों पशु-पक्षी और वन्यजीव अपने आवास खो देते हैं। खेत-खलिहान बंजर हो जाते हैं, जिससे खाद्य संकट उत्पन्न होता है। इस प्रकार युद्ध, मानव और प्रकृति दोनों के लिए विनाशकारी है। 

पृथ्वी केवल मनुष्यों की नहीं है। यह पक्षियों की उड़ान, पशुओं के जीवन, कीट-पतंगों की गतिविधियों और जलचर जीवों का भी घर है। जब जंगल कटते हैं, तो पक्षियों का बसेरा खत्म होता है। जब नदियाँ प्रदूषित होती हैं, तो मछलियाँ मरती हैं। जब हवा जहरीली होती है, तो हर जीव प्रभावित होता है। आज जरूरत है कि हम इस समग्र दृष्टिकोण को समझें पृथ्वी का संरक्षण तभी संभव है जब हम सभी जीवों के अधिकारों को स्वीकार करें। पर समाधान क्या किया जाए? 

  1. युद्ध नहीं, शांति का मार्ग : सबसे पहला और महत्वपूर्ण कदम है विश्व में शांति की स्थापना। राष्ट्रों को यह समझना होगा कि युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं, बल्कि नई समस्याओं की शुरुआत है। संवाद, कूटनीति और सहयोग ही स्थायी समाधान हैं। 
  2. पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी : वृक्षारोपण को जीवन का हिस्सा बनाना होगा। जल संरक्षण के लिए वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देना होगा। प्लास्टिक के उपयोग को कम करना होगा। स्वच्छ ऊर्जा (सौर, पवन) को अपनाना होगा। 
  3. पारंपरिक ज्ञान का पुनर्जीवन : हमारे पूर्वजों ने प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीने की कला सिखाई थी। जल स्रोतों का संरक्षण, सामूहिक खेती, प्राकृतिक संसाधनों का सीमित उपयोग इन परंपराओं को फिर से अपनाना होगा।
  4. जन-जागरूकता और शिक्षा : स्कूलों, कॉलेजों और समाज में पर्यावरण शिक्षा को प्राथमिकता देनी होगी। लोगों को यह समझाना होगा कि छोटी-छोटी आदतें जैसे पानी बचाना, पेड़ लगाना बड़े बदलाव ला सकती हैं। 

जीव-जंतुओं का संरक्षण। वन्यजीवों के लिए सुरक्षित क्षेत्र बनाए जाएं। शिकार और अवैध व्यापार पर कड़ी रोक लगे। पक्षियों के लिए जल और भोजन की समुचित व्यवस्था की जाए। विश्व पृथ्वी दिवस केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि एक सतत जिम्मेदारी का प्रतीक है। यदि हम आज भी नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ियों को एक बंजर, प्रदूषित और असुरक्षित पृथ्वी विरासत में मिलेगी। 

अब समय है कि हम युद्ध की राह छोड़कर शांति और संरक्षण का मार्ग अपनाएं। पृथ्वी हमारी माता है और एक संतान के रूप में हमारा कर्तव्य है कि हम उसकी रक्षा करें। आइए, इस पृथ्वी दिवस पर हम संकल्प लें कि न युद्ध करेंगे, न प्रकृति का शोषण करेंगे, बल्कि मिलकर इस धरती को सुरक्षित और समृद्ध बनाएंगे। (लेखक सांस्कृतिक शोधकर्ता, रंगनिर्देशक, और असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।) 

Published / 2026-04-21 12:32:11
जनजातीय दर्शन में छुपा है प्रकृति संरक्षण

  • जनजातीय दर्शन में छुपा है प्रकृति संरक्षण

डॉ मंजूषा पूर्ति 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। आज जब विश्व पर्यावरणीय संकट के गंभीर दौर से गुजर रहा है तब जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता का ह्रास, जल संकट और प्रदूषण जैसी समस्याएँ पृथ्वी के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न खड़े कर रही हैं, तब समाधान के लिए हमें आधुनिक तकनीकों के साथ-साथ अपनी जड़ों की ओर लौटने की आवश्यकता है। यह जड़ें हमें जनजातीय (आदिवासी) दर्शन में मिलती हैं, जहाँ प्रकृति केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार, पूज्य तत्व और सह-अस्तित्व का साथी है।

जनजातीय दर्शन में प्रकृति संरक्षण केवल एक विचार नहीं, बल्कि जीवन जीने की शैली है। यह दर्शन हमें सिखाता है कि मनुष्य पृथ्वी का स्वामी नहीं, बल्कि उसका एक अंश है। यही विचार भारतीय ऋषि परंपरा और वैदिक संस्कृति में भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। इस प्रकार, जनजातीय और वैदिक दर्शन दोनों ही एक ही मूल चेतना से प्रेरित हैं—प्रकृति के साथ संतुलित सह-अस्तित्व।जनजातीय समाज में प्रकृति को जीवंत माना जाता है। जंगल, पहाड़, नदियाँ, वृक्ष, पशु-पक्षी—सभी को आत्मा युक्त और सम्माननीय समझा जाता है।

जंगल उनके लिए केवल लकड़ी का स्रोत नहीं, बल्कि जीवनदाता है। नदियाँ केवल जल का स्रोत नहीं, बल्कि माँ के रूप में पूजनीय हैं। पशु-पक्षियों को परिवार का हिस्सा माना जाता है। यह दृष्टिकोण पारिस्थितिकी (Ecology) का सबसे व्यावहारिक रूप है, जिसमें मनुष्य और प्रकृति के बीच संतुलन बना रहता है। जनजातीय समाज उतना ही लेता है जितनी उसे आवश्यकता होती है, जिससे संसाधनों का संरक्षण स्वतः सुनिश्चित होता है।

भारतीय वैदिक साहित्य में भी प्रकृति को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः यह मंत्र स्पष्ट करता है कि पृथ्वी हमारी माता है और हम उसके पुत्र हैं। ऋषियों ने पंचमहाभूत पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश को जीवन का आधार माना। उन्होंने इन तत्वों के संरक्षण को धर्म का हिस्सा बनाया। यज्ञ के माध्यम से पर्यावरण शुद्धि का विचार किया। वृक्षों और नदियों की पूजा को जीवन का आधार बनाया। जीवों के प्रति करुणा और अहिंसा अपना कर उसे अपना परिवार बनाया। 

ये सभी सिद्धांत जनजातीय जीवन में भी सहज रूप से देखने को मिलते हैं। स्पष्ट है कि जनजातीय और वैदिक दर्शन में कोई विरोध नहीं, बल्कि गहरा सामंजस्य है। आदिवासी समाज का जीवन पूर्णतः प्रकृति पर आधारित है, और उनका हर कार्य पर्यावरण संतुलन को ध्यान में रखकर किया जाता है।

  1. सीमित उपभोग (Sustainable Use) आदिवासी समुदाय केवल उतना ही संसाधन उपयोग करते हैं, जितना आवश्यक होता है। अत्यधिक संग्रह या दोहन उनकी संस्कृति के विरुद्ध है। 
  2. सामूहिकता और साझेदारी के कारण वन, जल और भूमि को व्यक्तिगत संपत्ति नहीं, बल्कि सामूहिक धरोहर माना जाता है। इससे संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण और संरक्षण सुनिश्चित होता है। 
  3. पारंपरिक ज्ञान प्रणाली के कारण औषधीय पौधों का ज्ञान, मौसम की पहचान, खेती के पारंपरिक तरीके ये सभी पर्यावरण के अनुकूल होते हैं और जैव विविधता को बनाए रखते हैं। 
  4. उत्सव और अनुष्ठान में भी सरहुल, करमा जैसे त्योहार प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का माध्यम हैं। इन अवसरों पर वृक्षों, जल स्रोतों और धरती की पूजा की जाती है। देवी-शक्ति और प्रकृति संरक्षण होने से भारतीय संस्कृति में देवी-शक्ति को प्रकृति का प्रतीक माना गया है दुर्गा, काली, सरस्वती, लक्ष्मी ये सभी शक्तियाँ प्रकृति के विभिन्न रूपों का प्रतिनिधित्व करती हैं।

इसी प्रकार जनजातीय समाज में भी धरती माता, जाहेर आयो, वन देवी जैसे रूपों में प्रकृति की पूजा की जाती है। यह आस्था केवल धार्मिक नहीं, बल्कि संरक्षण का माध्यम है। जब हम किसी तत्व को देवी मानते हैं, तो उसके प्रति हमारा व्यवहार स्वतः संवेदनशील हो जाता है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में संकट और चुनौतियाँ लगातार बढ़ती जा रही हैं आज आधुनिकता और विकास के नाम पर जो अंधाधुंध दोहन हो रहा है, उसने प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ दिया है। 

जंगलों की कटाई, जल स्रोतों का प्रदूषण, खनन और औद्योगीकरण, वन्यजीवों का विलुप्त होना इन सबका सबसे अधिक प्रभाव जनजातीय समाज पर पड़ रहा है, क्योंकि उनका जीवन प्रकृति से जुड़ा हुआ है। विडंबना यह है कि जो समाज प्रकृति का सबसे बड़ा रक्षक है, वही आज विस्थापन और उपेक्षा का शिकार है। जनजातीय समाज में भी अपने ऋषि या ज्ञान परंपरा के संरक्षक होते हैं बुजुर्ग, पाहन,  ओझा, पुजारी जो पीढ़ी दर पीढ़ी ज्ञान का हस्तांतरण करते हैं।

 वे सिखाते हैं कि प्रकृति का सम्मान करो, जरूरत से ज्यादा मत लो, हर जीव के साथ सह-अस्तित्व में रहो यह ज्ञान आज के वैज्ञानिक सिद्धांतों से भी मेल खाता है और सतत विकास (Sustainable Development) का आधार बन सकता है। तो फिर बात यहीं आकर रूकती है कि हम जनजातीय समाज से क्या सीखें और क्या करें? 

  1. जनजातीय ज्ञान को अपनाना होगा। हमें आदिवासी जीवन शैली से सीख लेकर उसे आधुनिक संदर्भ में लागू करना होगा। 
  2. नीतिगत बदलाव करके सरकारों को विकास परियोजनाओं में पर्यावरण और जनजातीय हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए।
  3. शिक्षा में समावेशन होने से स्कूलों और विश्वविद्यालयों में जनजातीय दर्शन और पारंपरिक ज्ञान को शामिल किया जाए। 
  4. सामुदायिक भागीदारी होने से स्थानीय समुदायों को संरक्षण कार्यों में शामिल किया जाए, क्योंकि वे प्रकृति को सबसे अच्छी तरह समझते हैं। 
  5. आध्यात्मिक दृष्टिकोण का विकास होने से प्रकृति को केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार मानने की मानसिकता विकसित करनी होगी। जनजातीय दर्शन हमें यह सिखाता है कि पृथ्वी का संरक्षण कोई विकल्प नहीं, बल्कि हमारी जिम्मेदारी है। यह दर्शन न केवल पर्यावरणीय संकट का समाधान प्रस्तुत करता है, बल्कि हमें एक संतुलित, शांतिपूर्ण और सामंजस्यपूर्ण जीवन की दिशा भी दिखाता है।

आज आवश्यकता है कि हम अपने अहंकार को त्यागकर प्रकृति के साथ जुड़ें, उससे सीखें और उसे बचाने का संकल्प लें। यदि हम जनजातीय और वैदिक ज्ञान को अपनाते हैं, तो निश्चित ही हम अपनी पृथ्वी को सुरक्षित और समृद्ध बना सकते हैं। यह केवल पर्यावरण का प्रश्न नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व का प्रश्न है और इसका उत्तर हमारी परंपराओं में पहले से मौजूद है। (लेखिका बिरसा महाविद्यालय खूंटी के दर्शनशास्त्र विभाग की विभागाध्यक्ष हैं।) 

Published / 2026-04-21 12:27:22
जनजातीय दर्शन में छुपा है प्रकृति संरक्षण

  • जनजातीय दर्शन में छुपा है प्रकृति संरक्षण

डॉ मंजूषा पूर्ति 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। आज जब विश्व पर्यावरणीय संकट के गंभीर दौर से गुजर रहा है तब जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता का ह्रास, जल संकट और प्रदूषण जैसी समस्याएँ पृथ्वी के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न खड़े कर रही हैं, तब समाधान के लिए हमें आधुनिक तकनीकों के साथ-साथ अपनी जड़ों की ओर लौटने की आवश्यकता है। यह जड़ें हमें जनजातीय (आदिवासी) दर्शन में मिलती हैं, जहाँ प्रकृति केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार, पूज्य तत्व और सह-अस्तित्व का साथी है।

जनजातीय दर्शन में प्रकृति संरक्षण केवल एक विचार नहीं, बल्कि जीवन जीने की शैली है। यह दर्शन हमें सिखाता है कि मनुष्य पृथ्वी का स्वामी नहीं, बल्कि उसका एक अंश है। यही विचार भारतीय ऋषि परंपरा और वैदिक संस्कृति में भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। इस प्रकार, जनजातीय और वैदिक दर्शन दोनों ही एक ही मूल चेतना से प्रेरित हैं—प्रकृति के साथ संतुलित सह-अस्तित्व।जनजातीय समाज में प्रकृति को जीवंत माना जाता है। जंगल, पहाड़, नदियाँ, वृक्ष, पशु-पक्षी—सभी को आत्मा युक्त और सम्माननीय समझा जाता है।

जंगल उनके लिए केवल लकड़ी का स्रोत नहीं, बल्कि जीवनदाता है। नदियाँ केवल जल का स्रोत नहीं, बल्कि माँ के रूप में पूजनीय हैं। पशु-पक्षियों को परिवार का हिस्सा माना जाता है। यह दृष्टिकोण पारिस्थितिकी (Ecology) का सबसे व्यावहारिक रूप है, जिसमें मनुष्य और प्रकृति के बीच संतुलन बना रहता है। जनजातीय समाज उतना ही लेता है जितनी उसे आवश्यकता होती है, जिससे संसाधनों का संरक्षण स्वतः सुनिश्चित होता है।

भारतीय वैदिक साहित्य में भी प्रकृति को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः यह मंत्र स्पष्ट करता है कि पृथ्वी हमारी माता है और हम उसके पुत्र हैं। ऋषियों ने पंचमहाभूत पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश को जीवन का आधार माना। उन्होंने इन तत्वों के संरक्षण को धर्म का हिस्सा बनाया। यज्ञ के माध्यम से पर्यावरण शुद्धि का विचार किया। वृक्षों और नदियों की पूजा को जीवन का आधार बनाया। जीवों के प्रति करुणा और अहिंसा अपना कर उसे अपना परिवार बनाया। 

ये सभी सिद्धांत जनजातीय जीवन में भी सहज रूप से देखने को मिलते हैं। स्पष्ट है कि जनजातीय और वैदिक दर्शन में कोई विरोध नहीं, बल्कि गहरा सामंजस्य है। आदिवासी समाज का जीवन पूर्णतः प्रकृति पर आधारित है, और उनका हर कार्य पर्यावरण संतुलन को ध्यान में रखकर किया जाता है।

  1. सीमित उपभोग (Sustainable Use) आदिवासी समुदाय केवल उतना ही संसाधन उपयोग करते हैं, जितना आवश्यक होता है। अत्यधिक संग्रह या दोहन उनकी संस्कृति के विरुद्ध है। 
  2. सामूहिकता और साझेदारी के कारण वन, जल और भूमि को व्यक्तिगत संपत्ति नहीं, बल्कि सामूहिक धरोहर माना जाता है। इससे संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण और संरक्षण सुनिश्चित होता है। 
  3. पारंपरिक ज्ञान प्रणाली के कारण औषधीय पौधों का ज्ञान, मौसम की पहचान, खेती के पारंपरिक तरीके ये सभी पर्यावरण के अनुकूल होते हैं और जैव विविधता को बनाए रखते हैं। 
  4. उत्सव और अनुष्ठान में भी सरहुल, करमा जैसे त्योहार प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का माध्यम हैं। इन अवसरों पर वृक्षों, जल स्रोतों और धरती की पूजा की जाती है। देवी-शक्ति और प्रकृति संरक्षण होने से भारतीय संस्कृति में देवी-शक्ति को प्रकृति का प्रतीक माना गया है दुर्गा, काली, सरस्वती, लक्ष्मी ये सभी शक्तियाँ प्रकृति के विभिन्न रूपों का प्रतिनिधित्व करती हैं।

इसी प्रकार जनजातीय समाज में भी धरती माता, जाहेर आयो, वन देवी जैसे रूपों में प्रकृति की पूजा की जाती है। यह आस्था केवल धार्मिक नहीं, बल्कि संरक्षण का माध्यम है। जब हम किसी तत्व को देवी मानते हैं, तो उसके प्रति हमारा व्यवहार स्वतः संवेदनशील हो जाता है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में संकट और चुनौतियाँ लगातार बढ़ती जा रही हैं आज आधुनिकता और विकास के नाम पर जो अंधाधुंध दोहन हो रहा है, उसने प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ दिया है। 

जंगलों की कटाई, जल स्रोतों का प्रदूषण, खनन और औद्योगीकरण, वन्यजीवों का विलुप्त होना इन सबका सबसे अधिक प्रभाव जनजातीय समाज पर पड़ रहा है, क्योंकि उनका जीवन प्रकृति से जुड़ा हुआ है। विडंबना यह है कि जो समाज प्रकृति का सबसे बड़ा रक्षक है, वही आज विस्थापन और उपेक्षा का शिकार है। जनजातीय समाज में भी अपने ऋषि या ज्ञान परंपरा के संरक्षक होते हैं बुजुर्ग, पाहन,  ओझा, पुजारी जो पीढ़ी दर पीढ़ी ज्ञान का हस्तांतरण करते हैं।

 वे सिखाते हैं कि प्रकृति का सम्मान करो, जरूरत से ज्यादा मत लो, हर जीव के साथ सह-अस्तित्व में रहो यह ज्ञान आज के वैज्ञानिक सिद्धांतों से भी मेल खाता है और सतत विकास (Sustainable Development) का आधार बन सकता है। तो फिर बात यहीं आकर रूकती है कि हम जनजातीय समाज से क्या सीखें और क्या करें? 

  1. जनजातीय ज्ञान को अपनाना होगा। हमें आदिवासी जीवन शैली से सीख लेकर उसे आधुनिक संदर्भ में लागू करना होगा। 
  2. नीतिगत बदलाव करके सरकारों को विकास परियोजनाओं में पर्यावरण और जनजातीय हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए।
  3. शिक्षा में समावेशन होने से स्कूलों और विश्वविद्यालयों में जनजातीय दर्शन और पारंपरिक ज्ञान को शामिल किया जाए। 
  4. सामुदायिक भागीदारी होने से स्थानीय समुदायों को संरक्षण कार्यों में शामिल किया जाए, क्योंकि वे प्रकृति को सबसे अच्छी तरह समझते हैं। 
  5. आध्यात्मिक दृष्टिकोण का विकास होने से प्रकृति को केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार मानने की मानसिकता विकसित करनी होगी। जनजातीय दर्शन हमें यह सिखाता है कि पृथ्वी का संरक्षण कोई विकल्प नहीं, बल्कि हमारी जिम्मेदारी है। यह दर्शन न केवल पर्यावरणीय संकट का समाधान प्रस्तुत करता है, बल्कि हमें एक संतुलित, शांतिपूर्ण और सामंजस्यपूर्ण जीवन की दिशा भी दिखाता है।

आज आवश्यकता है कि हम अपने अहंकार को त्यागकर प्रकृति के साथ जुड़ें, उससे सीखें और उसे बचाने का संकल्प लें। यदि हम जनजातीय और वैदिक ज्ञान को अपनाते हैं, तो निश्चित ही हम अपनी पृथ्वी को सुरक्षित और समृद्ध बना सकते हैं। यह केवल पर्यावरण का प्रश्न नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व का प्रश्न है और इसका उत्तर हमारी परंपराओं में पहले से मौजूद है। (लेखिका बिरसा महाविद्यालय खूंटी के दर्शनशास्त्र विभाग की विभागाध्यक्ष हैं।) 

Published / 2026-04-19 13:59:16
ठंडे बस्ते में जाता महिला आरक्षण

  • महिला आरक्षण का ठंडा ( Freeze) हो जाना...

त्रिवेणी दास

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। केंद्र की मोदी सरकार ने संसद का विशेष सत्र बुलाकर महिलाओं के लिए 33% आरक्षण तथा सभी राज्यों में 50% लोकसभा सीट बढ़ाने के लिए संविधान संशोधन विधेयक लाया वह मत विभाजन में विपक्ष के विरोध के कारण पारित नहीं किया जा सका। 

विपक्ष सदन में इस घटना को अपनी जीत समझ कर मेज तो थपथपा सकता है, लेकिन देश को कैसे समझ पाएगा कि आधी आबादी के लिए किए जा रहे आरक्षण को उसने आखिर क्यों रोका। दिनांक 18 अप्रैल 2026 को रात्रि 8:30 बजे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए देश की नारी शक्ति से क्षमा याचना की और आरक्षण बिल के नहीं पारित होने पर अपना दुख साझा किया। 

मोदीजी ने विधेयक नहीं पास होने के लिए कांग्रेस सपा रिमूव कांग्रेस और डीएमके को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि देश की महिलाएं इन राजनीतिक दलों को कभी माफ नहीं करेगी। मोदीजी ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि कांग्रेस आरंभ से ही सुधार विरोधी, लटकने और भटकाने वाली पार्टी रही है। महिला आरक्षण  का विरोध करके समाजवादी पार्टी ने लोहिया जी के सपनों को रौंद दिया है जिसे अप की महिला कभी भूल नहीं पाएगी। 

मोदीजी ने यह भी कहा कि परिवारवादी पार्टियों ने अपने भय के कारण कि यदि देश की महिलाएं सशक्त हो जाएंगी तो उनके परिवार के महिलाओं का राजनीति में प्रभुत्व समाप्त हो जाएगा, वे कभी नहीं चाहते हैं कि उनके परिवार के बाहर की कोई भी महिला राजनीति में स्थापित हो सके।

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