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Published / 2026-03-19 18:21:12
हिंदू नववर्ष विक्रम संवत परंपरा, आस्था और नवचेतना का प्रतीक : संजय सर्राफ

एबीएन सोशल डेस्क। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग एवं श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि भारतीय संस्कृति में नववर्ष केवल तिथि परिवर्तन नहीं, बल्कि नयी ऊर्जा, नयी आशाओं और नए संकल्पों का आरंभ होता है। हिंदू नववर्ष, जिसे विक्रम संवत के नाम से जाना जाता है, इस वर्ष विक्रम संवत 2083 के रूप में मनाया जायेगा। 

यह पावन पर्व चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से प्रारंभ होता है, इस वर्ष नवसंवत्सर 19 मार्च से प्रारंभ हो रहा है तथा इसी दिन से चैत्र नवरात्रि का भी शुभारंभ होता है। हिंदू पंचांग के अनुसार नवसंवत्सर का विशेष धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व है। मान्यता है कि इसी दिन सृष्टि की रचना भगवान ब्रह्मा द्वारा की गयी थी, इसलिए इसे सृष्टि का प्रथम दिवस भी माना जाता है।

साथ ही, यह भी कहा जाता है कि सम्राट विक्रमादित्य ने शकों पर विजय प्राप्त कर विक्रम संवत की स्थापना की थी, जिसके कारण यह कालगणना भारतीय परंपरा में अत्यंत प्रतिष्ठित है। नववर्ष का यह पर्व भारत के विभिन्न राज्यों में अलग-अलग नामों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है। महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में उगादि, कश्मीर में नवरेह और सिंधी समाज में चेटीचंड के रूप में यह पर्व मनाया जाता है। 

इन सभी उत्सवों में एक समान भाव है- नयी शुरुआत और सकारात्मकता का स्वागत, नवसंवत्सर का उद्देश्य केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन में अनुशासन,संयम और आत्मचिंतन का संदेश देता है। इस दिन लोग प्रात:काल स्नान कर घरों में ध्वज या पताका लगाते हैं, मंदिरों में पूजा-अर्चना करते हैं और नए कार्यों की शुरुआत करते हैं। यह दिन यह भी सिखाता है कि बीते वर्ष की गलतियों से सीख लेकर आगे बढ़ना चाहिए। 

इस पर्व की महत्ता सामाजिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह लोगों को एकजुट करता है, आपसी प्रेम और भाईचारे को बढ़ावा देता है तथा भारतीय संस्कृति और परंपराओं को जीवंत बनाए रखने का कार्य करता है। नववर्ष के अवसर पर लोग एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं और समृद्धि, सुख-शांति की कामना करते हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी यह समय अत्यंत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि इस अवधि में प्रकृति में परिवर्तन होता है। 

वसंत ऋतु अपने चरम पर होती है, पेड़-पौधों में नई कोंपलें फूटती हैं और वातावरण में नवजीवन का संचार होता है। यह प्रकृति के पुनर्जागरण का प्रतीक है, जो मानव जीवन में भी नयी ऊर्जा भरता है। अत: हिंदू नववर्ष विक्रम संवत केवल एक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की गहराई, आस्था और जीवन दर्शन का प्रतीक है। यह हमें हर वर्ष नयी शुरुआत करने, सकारात्मक सोच अपनाने और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों को निभाने की प्रेरणा देता है।

Published / 2026-03-18 20:39:08
संसद से संसदीय क्षेत्र तक, 2030 तक बाल विवाह के खात्मे के लिए एकजुट हुए सांसद

  • विभिन्न दलों के 20 से अधिक सांसद एमपीज फॉर चिल्ड्रेन के बैनर तले 2030 तक बाल विवाह मुक्त भारत के लक्ष्य के लिए एकजुट हुए। 
  • एमपीज फॉर चिल्ड्रेन की पहल को जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन का समर्थन हैं, जो बाल अधिकारों के संरक्षण के लिए 250 से अधिक नागरिक समाज संगठनों का देश का सबसे बड़ा नेटवर्क है 
  • तेलुगु देशम पार्टी के संसदीय दल के नेता लावू श्रीकृष्ण देवरायालु सहित सभी सांसदों ने बच्चों की सुरक्षा के लिए सोशल मीडिया पर प्रगतिशील और उम्र के अनुरूप प्रतिबंध लागू करने की भी मांग की 

एबीएन सोशल डेस्क। एक नायाब और मजबूत पहल में 2030 तक भारत को बाल विवाह से मुक्त करने की रणनीति तय करने के लिए राष्ट्रीय राजधानी के कांस्टीट्यूशन क्लब में एमपीज फॉर चिल्ड्रेन के बैनर तले विभिन्न राजनीतिक दलों के 20 से ज्यादा सांसद एक साथ जुटे। बाल विवाह और सोशल मीडिया से जुड़े खतरों को बच्चों के लिए बड़ी चुनौती करार देते हुए सांसदों ने इन मुद्दों को आगे लाने के लिए शून्य काल का इस्तेमाल, निजी विधेयक लाए जाएं और अपने संसदीय क्षेत्रों में इसे मजबूती से उठाया जाये।  

एमपीज फॉर चिल्ड्रेन की शुरुआत 17 नवंबर 2024 को हुई थी और बाल विवाह एवं बाल यौन शोषण पर चिंता जताते हुए 38 सांसदों ने इसका समर्थन किया। इसे जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन का समर्थन प्राप्त है, जो बाल अधिकारों के संरक्षण का देश का नागरिक समाज संगठनों का सबसे बड़ा नेटवर्क है। इसके 250 से ज्यादा सहयोगी संगठन देश के 450 से अधिक जिलों में काम कर रहे हैं। 

डायलॉग विद पार्लियामेंटेरियंस आन अचीविंग चाइल्ड फुल पोटेंशियल में बोलते हुए तेलुगु देशम पार्टी के नेता और एमपीज फर चिल्ड्रेन के संयोजक लावू श्रीकृष्ण देवरायलु ने कहा, बाल विवाह किसी एक पार्टी या धर्म का मुद्दा नहीं है। इसे खत्म करने पर सभी दलों में आम सहमति है। भारत ने दिखाया है कि जब भी हम सामूहिक संकल्प के साथ काम करते हैं, हमने नतीजे हासिल किए हैं। हमने पोलियो खत्म किया, बच्चों को स्कूल तक पहुंचाया। कोई वजह नहीं कि उसी संकल्प के साथ हम 2030 तक बाल विवाह का खात्मा नहीं कर पाएं। 

तेलुगु देशम पार्टी के संसदीय दल के नेता देवरायलु ने बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर उम्र के आधार पर रोक लगाने की जरूरत बतायी। उन्होंने बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम (पीसीएमए), 2006 को मजबूत बनाने के लिए हाल ही में लोकसभा में एक निजी विधेयक पेश किया। बाल विवाह मुक्त भारत के लक्ष्य को तेजी से हासिल करने के लिए इस विधेयक में सख्त सजा, विशेष बाल विवाह निषेध अधिकारी, विशेष अदालतें और एक डिजिटल रिपोर्टिंग पोर्टल का प्रावधान है। 

समर्थन के लिए सभी सांसदों का आभार जताते हुए जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के संस्थापक भुवन ऋभु ने कहा, हम एमपीज फॉर चिल्ड्रेन फोरम को उनके नेतृत्व के लिए धन्यवाद देते हैं और इस बात की सराहना करते हैं कि उन्होंने संसद तथा संबंधित सरकारी एजेंसियों के भीतर बाल संरक्षण से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों को उठाने की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित किया। बाल संरक्षण केवल एक सामाजिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय प्राथमिकता है। बच्चों को आनलाइन और आफलाइन, दोनों ही तरह के खतरों से सुरक्षित रखना राष्ट्र निर्माण की बुनियादी शर्त है।

भुवन ऋभु ने आगे कहा, हम सांसदों के आभारी हैं कि उन्होंने इस बात पर सहमति जतायी कि भारत सरकार को बाल विवाह मुक्त भारत दिवस घोषित करना चाहिए। एक राष्ट्रीय दिवस की घोषणा न केवल इस अपराध के खात्मे की तात्कालिकता को रेखांकित करेगी, बल्कि यह सुनिश्चित करने के लिए कि कोई भी बच्चा विवाह के लिए मजबूर न हो, पूरी सरकार और पूरे समाज; दोनों की साझा जवाबदेही को भी सुदृढ़ करेगी। 

एमपीज फॉर चिल्ड्रेन संवाद में अन्य सांसदों में भीम सिंह (भाजपा), डॉ धर्मवीर गांधी (कांग्रेस), राजा राम सिंह कुशवाहा (सीपीआई एमएल), लुंबा राम चौधरी (भाजपा), पुष्पेंद्र सरोज (सपा), जोथिमानी (कांग्रेस), डग्गुमल्ला प्रसाद राव (टीडीपी), गजेंद्र पटेल (भाजपा), जॉन ब्रिटास (सीपीएम), अरुण नेहरू (डीएमके), छोटेलाल खरवार (सपा), इकरा चौधरी (सपा), जुगल किशोर शर्मा (भाजपा), महुआ माजी (जेएमएम), संगीता बलवंत (भाजपा), विजयलक्ष्मी देवी (जनता दल (यूनाइटेड), वी शिवदासन (सीपीआई), पीवी अब्दुल वहाब (इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग), बीधा मस्थान राव यादव (टीडीपी) और कोंडा विश्वेश्वर रेड्डी (भाजपा) शामिल थे। 

जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन ने बाल विवाह के खिलाफ भारत सरकार के 100 दिन के गहन जागरूकता अभियान को मजबूती देने के लिए बाल विवाह मुक्ति रथ निकाले थे। पहियों पर चलने वाले इस अभियान को इस तरह से तैयार किया गया था कि यह गांवों और जनसमुदाय तक बाल विवाह के खिलाफ संदेश को सीधा उन तक पहुंचा सके। देश के 28 राज्यों और 439 जिलों में 500 से ज्यादा रथ निकाले गए। 

इस अभियान में 104 से ज्यादा सांसदों ने अपने क्षेत्रों में रथ यात्रा का नेतृत्व किया या उसे रवाना किया। इसके अलावा दो मुख्यमंत्रियों, तीन उपमुख्यमंत्रियों, तीन विधानसभा अध्यक्षों, तीन उपाध्यक्षों, 49 राज्य मंत्रियों, 154 विधायकों और 99 जिला कलेक्टरों ने भी अलग-अलग जिलों में बाल विवाह मुक्ति रथों को हरी झंडी दिखायी। इस खबर से संबंधित और जानकारी के लिए जितेंद्र परमार (8595950825) से संपर्क करें। 

Published / 2026-03-18 20:36:12
गणगौर त्यौहार 21 मार्च को

गणगौर पर्व प्रेम, विश्वास, आस्था, सौभाग्य और सांस्कृतिक परंपरा का अद्भुत संगम : संजय सर्राफ 

टीम एबीएन, रांची। झारखंड प्रांतीय मारवाड़ी सम्मेलन के प्रांतीय संयुक्त महामंत्री सह प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि भारतीय संस्कृति में पर्व-त्योहार केवल उत्सव नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और सामाजिक एकता के प्रतीक होते हैं। इन्हीं में से एक प्रमुख पर्व है गणगौर, जो विशेष रूप से राजस्थान और मारवाड़ी समाज में बड़े श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। गणगौर पर्व चैत्र शुक्ल तृतीया को मनाया जाता है। 

इस वर्ष गणगौर पर्व 21 मार्च दिन शनिवार को मनाया जायेगा। गणगौर पर्व भगवान शिव (गण) और माता पार्वती (गौर) को समर्पित है। यह पर्व मुख्य रूप से सुहागिन महिलाओं द्वारा अपने पति के दीघार्यु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य के लिए तथा अविवाहित कन्याओं द्वारा योग्य वर की प्राप्ति के लिए मनाया जाता है। 

गण का अर्थ शिव और गौर का अर्थ पार्वती है, इसलिए यह पर्व शिव-पार्वती के अटूट दांपत्य प्रेम और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। गणगौर उत्सव होली के दूसरे दिन से प्रारंभ होकर लगभग 16 दिनों तक चलता है। इस दौरान महिलाएं प्रतिदिन माता गौरी की पूजा करती हैं, सुंदर गीत गाती हैं और मिट्टी या लकड़ी की बनी गणगौर प्रतिमाओं को सजाती हैं। 

अंतिम दिन शोभायात्रा निकाली जाती है, जिसमें सजी-धजी महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में गणगौर की प्रतिमाओं को जल में विसर्जित करती हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी भक्ति और समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया और उन्हें अपनी अर्धांगिनी बनाया। 

विवाह के बाद माता पार्वती ने पृथ्वी पर आकर स्त्रियों को सुखी वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद दिया। तभी से महिलाएं गणगौर पर्व मनाकर माता गौरी से अपने दांपत्य जीवन की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।एक अन्य कथा के अनुसार, माता पार्वती ने साधारण स्त्रियों को अपनी सच्ची भक्ति के कारण विशेष आशीर्वाद दिया, जिससे यह पर्व सामाजिक समानता और नारी शक्ति का भी प्रतीक बन गया। 

गणगौर पर्व का मुख्य उद्देश्य वैवाहिक जीवन में प्रेम, विश्वास और समर्पण को मजबूत करना है। यह पर्व नारी शक्ति, त्याग और धैर्य का प्रतीक है। साथ ही यह समाज में सांस्कृतिक एकताऔर पारंपरिक मूल्यों को सहेजने का संदेश देता है। मारवाड़ी समाज में यह पर्व विशेष उत्साह से मनाया जाता है, जहां लोकगीत, नृत्य और सामूहिक आयोजन इसकी सुंदरता को और बढ़ाते हैं। 

गणगौर न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति में नारी के सम्मान और उसकी भावनाओं को भी अभिव्यक्त करता है। गणगौर पर्व भारतीय संस्कृति की जीवंत परंपराओं का प्रतीक है, जो प्रेम, श्रद्धा और  सामाजिक समरसता का संदेश देता है। यह त्योहार हर वर्ष लोगों के जीवन में नयी आशा, सुख और सौभाग्य लेकर आता है तथा हमारी सांस्कृतिक विरासत को सशक्त बनाता है।

Published / 2026-03-17 21:25:10
27 को बड़ागांई से निकलेगी श्रीरामनवमी महोत्सव की भव्य शोभायात्रा

  • डॉ बिरेन्द्र साहु को अध्यक्ष, बसकुमार साहू को मंत्री व मनोज कुमार को बनाया गया कोषाध्यक्ष 
  • दूसरे मंगलवारी के पावन बेला में बड़ागांई मुख्य अखाड़ा बेलटंगरा सहित सभी 9 अखाड़ों में महावीर पताका लगाकर किया गया महोत्सव का शुभारंभ 

टीम एबीएन, रांची। श्री महावीर मंडल, बड़ागांई की आम सभा बेलटंगरा स्थित श्री श्री पंचदेव मंदिर परिसर में अखाड़े धारी सहित समस्त ग्रामीणों की रखी गयी। आम सभा में विहिप के क्षेत्र मंत्री व श्री महाबीर मंडल, बड़ागांई के अध्यक्ष डॉ बिरेन्द्र साहु ने कहा कि श्री रामनवमी महोत्सव रांची का एक पारंपरिक, सांस्कृतिक, धार्मिक व ऐतिहासिक धरोहर है। 

बड़ागांई से निकलने वाली शोभायात्रा इसकी एक प्रमुख कड़ी है। 1956 से लगातार प्रतिवर्ष बड़ागांई ग्राम भ्रमण कर रांची के मुख्य शोभा यात्रा में शामिल होकर तपोवन श्रीराम मंदिर तक जाती है। इस वर्ष भी 27 मार्च को ग्राम के सभी अखाड़े के रामभक्तों द्वारा पारंपरिक गाजे-बाजे, अस्त्र-शस्त्रों, महावीरी पताकों व झांकी के साथ निकाली जायेगी।  

आमसभा में सर्वसम्मति से डॉ बिरेन्द्र साहु को 17वीं बार अध्यक्ष के साथ बसकुमार साहू को मंत्री व मनोज कुमार को कोषाध्यक्ष बनाया गया। वहीं उपाध्याय के रूप में डॉ जीवादन प्रसाद, रामदास साहू, बैजनाथ महतो, विनोद महतो, बलशाय महतो, रामदास महतो, कालीचरण साहू, बनू पाहन, नेपाल महतो, रामचंद्र साहू, महेश साहू, रंजीत साहू, जीतराम साहू, अशोक साहू, सुदेश साहू, बिगलू उरांव, फागु प्रसाद, कामेश्वर प्रसाद, अखिलेशवर प्रसाद, प्रकाश साहू को वरिष्ठ उपाध्यक्ष के रूप में धनसू साहू, नागेश्वर साहू, बालक लोहरा, बालेश्वर लोहरा, गोवर्धन साहू, गोपाल प्रमाणिक, रामसेवक लोहरा, सागर साहू, बलित महतो, अर्जुन महतो, गणेश महतो, पंचम महतो को, सहमंत्री के रूप में नकुल महतो, प्रताप साहू, संजय साहू, दिलीप पहन, आमोद तिर्की, सुनील पहान, रामधनी साहू, संजय महतो, रमेश महतो, अशोक तिर्की, अजय महतो, रोहित साहू, बसंत साहू, दिनेश साहू, अरविंद साहू, शेखर साहू, दीपक साहू, विजय साहू, डब्लू नायक, प्रेम लोहरा को सहकोषाध्यक्ष के रूप में धीरन साहू, उमेश साहू, बसंत साहू, रामलाल महतो, पवन साहू, रामानंद साहू, मनीष सिंह, नरेश साहू, विकास कुमार, शिव प्रसाद साहू को तथा प्रचार मंत्री के रूप राजेश साहू, मनीष साहू, बजरंग रजक, मनोहर साहू, सोनू साहू, एवं प्रेम कुमार को मनोनीत किये गये। 

श्री रामनवमी महोत्सव का शुभारंभ आज दूसरे मंगलवारी के पावन बेला में बड़ागांई मुख्य अखाड़ा बेलटंगरा सहित सभी अखाड़ों में पूजा-अर्चना, हनुमान चालीसा व सुन्दर कांड पाठ कर गाजे-बाजे के साथ महावीरी पताका खड़ा कर किया गया। 

सभा में 19 मार्च को श्री श्री पंचदेव मंदिर में महाआरती, 24 मार्च को श्री रामनवमी महोत्सव मिलन समरोह, 28 मार्च की संध्या 8 बजे से परम्परागत गाजे-बाजे, अस्त्र-शस्त्रों के साथ महावीरी पताकों खड़ा करने व झांकी निकलने का निर्णय लिये गये। उक्त जानकारी श्री महावीर मंडल, बड़ागांई के मंत्री बस कुमार साहु (96312 09285) ने दी।

Published / 2026-03-17 19:46:31
सरहुल पर्व 21 मार्च को

सरहुल संस्कृति, सामाजिक एकता, प्रकृति और आस्था का अद्भुत पर्व : संजय सर्राफ  

टीम एबीएन, रांची। हिंदी साहित्य भारती के उपाध्यक्ष सह झारखंड पेरेंट्स एसोसिएशन के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि भारत की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं में आदिवासी समाज का विशेष स्थान है, जहां प्रकृति को ही ईश्वर का स्वरूप मानकर पूजा की जाती है। इन्हीं प्रमुख पर्वों में से एक है सरहुल, झारखंड और आसपास के इलाकों में मनाया जाने वाला सरहुल पर्व आदिवासी समाज का एक प्रमुख और पवित्र त्योहार है। यह उत्सव प्रकृति की पूजा और उसके संरक्षण का प्रतीक माना जाता है।

सरहुल के दौरान साल वृक्ष की पूजा, पारंपरिक नृत्य, गीत और सामुदायिक भोज का विशेष महत्व होता है। इस पर्व के माध्यम से लोग प्रकृति, सूर्य और पृथ्वी के प्रति आभार व्यक्त करते हैं। सरहुल का त्योहार खासतौर पर झारखंड के उरांव, मुंडा और अन्य आदिवासी समुदायों के बीच बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। 

इस अवसर पर गांवों में खुशी और उत्सव का माहौल देखने को मिलता है। सरहुल पर्व वसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक है जब सखुआ (साल) वृक्ष में नये फूल खिलते हैं। सरहुल पर्व चैत्र शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष सरहुल 21 मार्च को मनाया जायेगा। यह पर्व प्रकृति, विशेषकर वृक्षों और धरती माता के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर है। 

आदिवासी समाज मानता है कि धरती और वनस्पति ही जीवन का आधार हैं, इसलिए उनकी पूजा करना मानव का कर्तव्य है। सरहुल का अर्थ ही होता है सरई (साल) के फूलों की पूजा। इस दिन साल वृक्ष के फूलों को पवित्र मानकर पूजा की जाती है। सरहुल केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति संरक्षण का संदेश देने वाला उत्सव है। यह पर्व मनुष्य और प्रकृति के बीच संतुलन बनाए रखने की प्रेरणा देता है। 

आदिवासी समाज का मानना है कि यदि जंगल सुरक्षित रहेंगे, तो जीवन भी सुरक्षित रहेगा। इस दिन लोग वर्षा, अच्छी फसल और समाज की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। सरहुल सामाजिक एकता और सामूहिकता का भी प्रतीक है। गांव के सभी लोग एक साथ मिलकर पूजा करते हैं, नृत्य-गीत करते हैं और आपसी भाईचारे को मजबूत बनाते हैं। यह पर्व पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाने का भी एक महत्वपूर्ण माध्यम है। सरहुल पर्व से जुड़ी एक प्रमुख कथा के अनुसार, धरती माता और सूर्य देव के मिलन से सृष्टि का निर्माण हुआ। इस मिलन का प्रतीक ही सरहुल पर्व है।

आदिवासी समाज के पुजारी, जिन्हें पाहन कहा जाता है, इस दिन विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। वे गांव के सरना स्थल (पवित्र उपवन) में जाकर साल वृक्ष के फूलों से पूजा करते हैं और प्रकृति देवता से आशीर्वाद मांगते हैं। पूजा के बाद पाहन गांववासियों को प्रसाद के रूप में साल के फूल और पवित्र जल वितरित करते हैं। इसके बाद पूरे गांव में पारंपरिक नृत्य और गीतों का आयोजन होता है, जिसमें महिलाएं और पुरुष रंग-बिरंगे पारंपरिक वस्त्र पहनकर भाग लेते हैं। 

सरहुल पर्व आदिवासी संस्कृति की जीवंतता, प्रकृति के प्रति सम्मान और सामाजिक एकता का अद्भुत उदाहरण है। यह पर्व हमें सिखाता है कि प्रकृति के बिना मानव जीवन संभव नहीं है, इसलिए उसका संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। आज के आधुनिक युग में, जब पर्यावरण संकट गहराता जा रहा है, सरहुल जैसे पर्व हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने की प्रेरणा देते हैं। यही इस पर्व की सबसे बड़ी विशेषता और प्रासंगिकता है।

Published / 2026-03-16 18:36:40
दिल्ली में सांसदों से मिलेंगे विहिप के डॉ बीरेंद्र साहु

जनसंख्या असंतुलन, तीर्थ क्षेत्रों की समुचित विकास एवं देश के सभी नागरिकों के लिए अनुच्छेद 29 और 30 के प्रावधान एक हो विषयों पर मिलेंगे सांसदों से : डॉ बिरेन्द्र साहु 

टीम एबीएन, रांची। विश्व हिन्दू परिषद, पटना क्षेत्र (झारखंड बिहार) के प्रतिनिधि मंडल सांसद संपर्क अभियान के तहत दोनों सदनों के सभी सांसदों से दिल्ली में 16 से 20 मार्च तक मिलकर तीन विशेष विषयों पर चर्चा करेंगे। क्षेत्र मंत्री डॉ बिरेन्द्र साहु ने बताया कि विहिप पटना क्षेत्र के प्रतिनिधि मंडल देश के कानून निर्माताओं से निवेदन करेंगे कि वर्तमान समय में जनसंख्या असंतुलन पर एक व्यापक राष्ट्रीय चिंतन की आवश्यकता है। 

पिछली अनेक सरकारों ने इस बारे में अपने-अपने तरीके से काम किया लेकिन अब आवश्यकता इस बात की है कि इसकी बारीकियों पर चिंतन कर एक प्रभावी जनसंख्या नीति बने और नारी सशक्तिकरण, स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार तथा क्षेत्रीय और सांप्रदायिक जनसंख्या संतुलन नीतियों जैसे माध्यमों के साथ जन-मन की सहभागिता से यह कार्य आगे बढ़े। 

डॉक्टर साहु ने बताया कि भारत धर्मप्राण देश है, जिसकी आत्मा तीर्थों में बसती है। तीर्थ विकास के बिना भारत के विकास की कल्पना अधूरी है। तीर्थ यात्राओं का देश की अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय योगदान है। 

इसलिए क्षेत्र के सभी सांसदों से निवेदन करेंगे कि तीर्थक्षेत्रों का समुचित विकास हो और वे भारत की अर्थव्यवस्था, संस्कृति और स्वाभिमान के केंद्र बिंदु बनकर, पुन: धर्म, आध्यात्म और मानव कल्याण के वैश्विक प्रहरी बनें। मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्ति मिले, हिंदू का पैसा हिंदू हित में काम आये तथा तीर्थाटन के विकास के लिए संस्कृति मंत्रालय में एक स्वतंत्र विभाग का गठन कर इनका चहुंमुखी विकास हो।  

तीसरे विषय के रूप में संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 के प्रावधानों को देश के सभी नागरिकों के लिए समान रूप से लागू करने के लिए सांसदों से निवेदन करेंगे, जिससे सभी धर्मों को धार्मिक शिक्षा का भेदभाव रहित सामान संवैधानिक अधिकार सुनिश्चित हो सके। साथ ही अल्पसंख्यक को परिभाषित करने की आवश्यकता को भी रेखांकित करेंगे। 

डॉ साहु ने कहा विहिप प्रतिनिधि मंडल बिना किसी राजनीतिक या विचार भेदभाव के हर दल के, हर मत- पंथ- संप्रदाय के और क्षेत्र के सभी सांसद से मिलकर खुलकर अपनी बात उनके समक्ष रखेंगे।  

प्रतिनिधि मंडल के रूप में झारखंड प्रांत से प्रांत अध्यक्ष चंद्रकांत रायपत, प्रांत सहमंत्री मनोज पोद्दार, विशेष संपर्क प्रांत प्रमुख अरबिंद सिंह व विशेष संपर्क प्रांत सहप्रमुख संतोष कुमार, उत्तर बिहार से प्रांत सहमंत्री इंदु शेखर, प्रांत सहमंत्री विकास भारती व सामाजिक समरसता प्रांत प्रमुख रवि प्रकाश तथा दक्षिण बिहार से विशेष संपर्क प्रांत सह प्रमुख विकास कुमार, सामाजिक समरसता प्रांत प्रमुख मैकू राम, नागेंद्र नागमणी, राकेश सिन्हा व संजय कुमार सिंह होंगे। उक्त जानकारी पटना क्षेत्र (झारखंड बिहार) विश्व हिंदू परिषद के डॉ बिरेन्द्र साहु (7033541040) ने दी।

Published / 2026-03-16 18:25:16
चैत्र नवरात्रि पर्व 19 मार्च से प्रारंभ

चैत्र नवरात्रि शक्ति उपासना, आस्था, श्रद्धा और नवसृजन का पावन पर्व : संजय सर्राफ 

टीम एबीएन, रांची। श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट एवं विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि भारतीय संस्कृति में नवरात्रि का पर्व देवी शक्ति की आराधना और आध्यात्मिक साधना का महत्वपूर्ण अवसर माना जाता है। 

इस वर्ष चैत्र नवरात्रि 19 मार्च से 27 मार्च तक मनायी जायेगी। इन नौ दिनों में माता दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। यह पर्व न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि भारतीय नववर्ष और वसंत ऋतु के आगमन का भी प्रतीक है। 

पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब असुरों का अत्याचार पृथ्वी पर बढ़ गया था, तब देवताओं की प्रार्थना पर देवी दुर्गा ने अवतार लेकर महिषासुर का वध किया था। इसी विजय की स्मृति में नवरात्रि के दौरान शक्ति की उपासना की जाती है। शास्त्रों में वर्णित है कि इन नौ दिनों में माता दुर्गा के नौ स्वरूप- शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। 

प्रत्येक दिन देवी के एक स्वरूप की आराधना से भक्तों को अलग-अलग प्रकार की आध्यात्मिक शक्ति और आशीर्वाद प्राप्त होता है।नवरात्रि से जुड़ी एक प्रमुख कथा के अनुसार भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना चैत्र मास की प्रतिपदा से ही आरंभ की थी। इसी कारण यह दिन भारतीय नवसंवत्सर का प्रारंभ भी माना जाता है। 

एक अन्य मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीराम ने लंका विजय से पहले देवी दुर्गा की आराधना कर शक्ति प्राप्त की थी। उनकी विजय के पीछे माता दुर्गा की कृपा मानी जाती है, इसलिए नवरात्रि का पर्व धर्म, सत्य और विजय का भी प्रतीक है। चैत्र नवरात्रि का उद्देश्य केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि आत्म शुद्धि,संयम और सकारात्मक ऊर्जा को जीवन में स्थापित करना भी है। 

इस दौरान श्रद्धालु उपवास रखते हैं, दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं और भक्ति भाव से माता की आराधना करते हैं। मंदिरों और घरों में कलश स्थापना, अखंड ज्योति तथा कन्या पूजन जैसे धार्मिक अनुष्ठान किये जाते हैं। नवरात्रि के नौ दिन साधना, संयम और आध्यात्मिक उन्नति के लिए अत्यंत शुभ माने जाते हैं। 

ऐसा विश्वास है कि सच्चे मन से की गयी देवी की उपासना से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है। समाज में यह पर्व सकारात्मक ऊर्जा, धार्मिक जागरूकता और सांस्कृतिक एकता को भी मजबूत करता है।चैत्र नवरात्रि भारत की सनातन परंपरा में आस्था, श्रद्धा और शक्ति की उपासना का प्रतीक है। 

यह पर्व हमें सिखाता है कि सत्य और धर्म की विजय अवश्य होती है तथा जीवन में सकारात्मकता और आत्मविश्वास बनाये रखना चाहिए। नवरात्रि के इन पावन दिनों में मां दुर्गा की कृपा से भक्तों के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का संचार होता है, इस प्रकार चैत्र नवरात्रि केवल धार्मिक उत्सव ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक जागरण, नवचेतना और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का महत्वपूर्ण पर्व है।

Published / 2026-03-15 22:01:14
रांची : टाटीसिलवे, डोरंडा और कडरू के विराट सम्मेलन में हिंदू एकजुटता पर फोकस

टीम एबीएन, रांची। रांची में हिंदू समाज की एकता, जागरण और सांस्कृतिक चेतना को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से रांची महानगर मे आज 3 स्थानों पर कार्यक्रम हुए 1. टाटी सिलवे 2. डोरंडा एवं 3. कडरू कपिलदेव मैदान मे विराट हिंदू सम्मेलन का भव्य आयोजन किया गया। महानगर में आयोजित इन सम्मेलनों में समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। 

कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य समाज में संगठन की भावना को मजबूत करना, सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा राष्ट्रहित में समाज की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करना था। कार्यक्रम में समाज से आए बड़ी संख्या में मातृशक्ति एवं सज्जन वृंद उपस्थित रहे। तीनों कार्यक्रम मे लगभग 1100 से अधिक लोगों की सहभागिता ने इस आयोजन को अत्यंत सफल और प्रेरणादायी बना दिया। 

कार्यक्रम का शुभारंभ वैदिक मंत्रोच्चार, हवन एवं दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। इसके पश्चात मंचासीन अतिथियों का स्वागत पुष्पगुच्छ और अंगवस्त्र भेंट कर किया गया। सम्मेलन में विभिन्न क्षेत्रों से आए वक्ताओं ने समाज, संस्कृति, संगठन और राष्ट्र के विषयों पर अपने विचार व्यक्त किए। 
सम्मेलन को संबोधित करते हुए स्वामी सत्यनारायण सौमित्र ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारतीय संस्कृति का मूल संदेश धर्मो रक्षति रक्षित: है।

उन्होंने कहा कि जब समाज अपने धर्म, संस्कृति और मूल्यों की रक्षा करता है, तभी धर्म भी उसकी रक्षा करता है। उन्होंने कहा कि हिंदू समाज को अपनी पहचान, अपने इतिहास और अपनी परंपराओं के प्रति जागरूक होना आवश्यक है। यदि समाज संगठित और जागृत रहेगा तो कोई भी शक्ति उसे कमजोर नहीं कर सकती। उन्होंने युवाओं का आह्वान करते हुए कहा कि उन्हें अपने गौरवशाली इतिहास से प्रेरणा लेकर समाज और राष्ट्र के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। 

स्वामी सौमित्र जी ने कहा कि भारतीय संस्कृति सहिष्णुता, समरसता और मानवता का संदेश देती है, लेकिन इसके साथ-साथ समाज को अपनी सुरक्षा और आत्मसम्मान के प्रति भी सजग रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज के समय में परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी को समझना अत्यंत आवश्यक है। यदि समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन करेगा तो राष्ट्र स्वत: मजबूत होगा। 

कार्यक्रम में निशा उरांव ने सरना और सनातन परंपराओं के संबंध पर अपने विचार रखते हुए कहा कि आदिवासी समाज और सनातन समाज की जड़ें एक ही सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ी हुई हैं। उन्होंने कहा कि दोनों ही परंपराएं प्रकृति को पूजनीय मानती हैं और धरती को माता के रूप में सम्मान देती हैं। उन्होंने बताया कि आदिवासी समाज की पूजा पद्धति और परंपराएं अत्यंत प्राचीन हैं और इन्हें संरक्षित रखने की आवश्यकता है। 

निशा उरांव जी ने कहा कि भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता विविधता में एकता है। अलग-अलग पूजा पद्धतियों और परंपराओं के बावजूद सभी का लक्ष्य मानवता, प्रकृति और समाज के प्रति सम्मान की भावना को बढ़ाना है। उन्होंने कहा कि समाज को विभाजित करने वाली शक्तियों से सावधान रहने की आवश्यकता है और सभी को मिलकर सांस्कृतिक विरासत की रक्षा के लिए प्रयास करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि आदिवासी समाज की परंपराएं, गीत, संगीत और सांस्कृतिक धरोहर अत्यंत मूल्यवान हैं और इन्हें आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रूप से पहुंचाना हम सभी की जिम्मेदारी है। 

सम्मेलन में अन्य वक्ताओं ने भी समाज के विभिन्न विषयों पर अपने विचार रखते हुए कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि समाज में आपसी सहयोग, समरसता और संगठन की भावना को मजबूत किया जाए। उन्होंने कहा कि हिंदू समाज की शक्ति उसकी एकता में है। जब समाज एकजुट होकर आगे बढ़ता है, तभी वह किसी भी चुनौती का सामना करने में सक्षम होता है। 

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता दीपक जी, (रांची महानगर कार्यवाह, आरएसएस) ने अपने  संबोधन में सामाजिक समरसता पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि जाति, वर्ग या क्षेत्र के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव समाज को कमजोर करता है। भारतीय संस्कृति का मूल संदेश सर्वे भवन्तु सुखिन: और वसुधैव कुटुम्बकम् है, जो पूरे विश्व को एक परिवार के रूप में देखने की प्रेरणा देता है। इसलिए सभी को मिलकर समाज में समानता और भाईचारे की भावना को बढ़ावा देना चाहिए। 

कार्यक्रम में परिवार व्यवस्था और संस्कारों के महत्व पर भी विस्तृत चर्चा की गई। वक्ताओं ने कहा कि परिवार ही समाज की आधारशिला है। यदि परिवार मजबूत होगा तो समाज और राष्ट्र भी मजबूत होंगे। बच्चों और युवाओं को भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्यों और राष्ट्रभक्ति की भावना से जोड़ना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। माता-पिता और परिवार के वरिष्ठ सदस्यों की जिम्मेदारी है कि वे नई पीढ़ी को अच्छे संस्कार दें और उन्हें अपने इतिहास और परंपराओं से परिचित कराएं। 

सम्मेलन में पर्यावरण संरक्षण के विषय पर भी महत्वपूर्ण विचार रखे गए। वक्ताओं ने कहा कि भारतीय संस्कृति सदैव से प्रकृति के संरक्षण और संतुलित जीवन का संदेश देती आई है। पेड़-पौधों, नदियों, पर्वतों और धरती को माता के रूप में सम्मान देने की परंपरा भारत की सांस्कृतिक पहचान है। आज जब पूरी दुनिया पर्यावरण संकट का सामना कर रही है, तब भारतीय जीवन शैली और परंपराएं पूरे विश्व के लिए मार्गदर्शक बन सकती हैं। 

कार्यक्रम में स्वदेशी जीवन शैली, भारतीय भाषा, वेशभूषा और भोजन के महत्व पर भी जोर दिया गया। वक्ताओं ने कहा कि हमें अपनी मातृभाषा, अपनी संस्कृति और अपनी परंपराओं पर गर्व होना चाहिए। भारतीय वेशभूषा, भोजन और जीवन पद्धति केवल परंपरा ही नहीं बल्कि हमारे सांस्कृतिक आत्मसम्मान का प्रतीक भी है। 

सम्मेलन में युवाओं की भूमिका पर विशेष चर्चा की गयी। वक्ताओं ने कहा कि युवा शक्ति किसी भी समाज और राष्ट्र की सबसे बड़ी ताकत होती है। यदि युवा अपने इतिहास, संस्कृति और राष्ट्र के प्रति जागरूक होंगे तो देश का भविष्य उज्ज्वल होगा। युवाओं को शिक्षा के साथ-साथ सामाजिक कार्यों और राष्ट्र निर्माण की गतिविधियों में भी सक्रिय भागीदारी निभानी चाहिए। 

इस अवसर पर वक्ताओं ने समाज के सभी वर्गों से एकजुट होकर राष्ट्रहित में कार्य करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि समाज की एकता, सांस्कृतिक जागरूकता और सकारात्मक सोच ही राष्ट्र की प्रगति का आधार है। यदि हम अपनी परंपराओं, संस्कारों और मूल्यों को अपनाते हुए आगे बढ़ेंगे तो भारत विश्व में एक मजबूत और आदर्श राष्ट्र के रूप में स्थापित होगा। 

कार्यक्रम के दौरान पूरे वातावरण में उत्साह और प्रेरणा का माहौल देखने को मिला। बड़ी संख्या में उपस्थित मातृशक्ति एवं सज्जन वृंद ने कार्यक्रम को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। समाज के विभिन्न क्षेत्रों से आए लोगों ने एकजुट होकर समाज और राष्ट्र की उन्नति के लिए कार्य करने का संकल्प लिया। 

कार्यक्रम के अंत में सभी उपस्थित लोगों ने सामूहिक रूप से भारत माता की आरती की। आरती के साथ ही देश, समाज और संस्कृति की उन्नति तथा विश्व शांति की कामना की गई। इसके पश्चात सभी उपस्थित श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरण किया गया और सभी ने श्रद्धापूर्वक प्रसाद ग्रहण किया। 
इस प्रकार उत्साह, श्रद्धा और सामाजिक जागरूकता से परिपूर्ण यह विराट हिंदू सम्मेलन समाज को एकजुट करने और सांस्कृतिक चेतना को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ।

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