एबीएन सेंट्रल डेस्क। यूक्रेन और रूस के बीच शांति वार्ता की तैयारी के बीच रूस ने मंगलवार को यूक्रेन पर एक बड़े पैमाने पर हमला किया। इस हमले में 450 से अधिक ड्रोन और 70 से अधिक विभिन्न मिसाइलों का इस्तेमाल किया गया। हमला विशेष रूप से यूक्रेन के ऊर्जा संयंत्रों और पावर ग्रिड को निशाना बनाकर किया गया, जिससे देश के कई हिस्सों में बिजली गुल हो गई और ठंड में हजारों लोगों की मुश्किलें बढ़ गयी। यह हमला ऐसे समय हुआ जब संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के अबू धाबी में बुधवार और गुरुवार को शांति वार्ता होने वाली है।
इस वार्ता में रूस, यूक्रेन और अमेरिका के अधिकारी हिस्सा लेंगे और इसका उद्देश्य लगभग चार वर्षों से जारी युद्ध को समाप्त करना है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने लंबे समय से इस वार्ता के जरिए संघर्ष को खत्म करने का प्रयास किया है। यूक्रेनी ऊर्जा मंत्री ने बताया कि बीती रात की हवाई हमलों में राजधानी कीव और देश के दूसरे सबसे बड़े शहर खार्किव सहित आठ क्षेत्रों पर हमला किया गया।
इसके कारण बिजली आपूर्ति ठप हो गयी और शून्य से 20 डिग्री सेल्सियस से नीचे तापमान में रहने वाले लोगों की परेशानियां बढ़ गयीं। यूक्रेनी अधिकारियों ने कहा कि इस हमले में नौ लोग घायल हुए हैं। यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने इसे रूस की रणनीति बताया और कहा, भीषण ठंड का फायदा उठाकर लोगों को आतंकित करना रूस की रणनीति है। ऊर्जा संयंत्रों को जानबूझकर निशाना बनाया गया, जिसमें रिकॉर्ड संख्या में बैलिस्टिक मिसाइलों का इस्तेमाल हुआ।
जेलेंस्की ने सहयोगी देशों से अधिक वायु रक्षा प्रणाली मुहैया कराने और रूस पर अधिकतम दबाव डालने का आग्रह किया, ताकि 24 फरवरी 2022 को शुरू हुए युद्ध को समाप्त किया जा सके। नाटो महासचिव ने भी कीव का दौरा किया और कहा कि शांति वार्ता से पहले हुए ये हमले रूस के इरादों पर संदेह पैदा करते हैं।
उन्होंने इसे शांति प्रयासों के लिए बेहद बुरा संकेत बताया। हालांकि, युद्ध के सबसे बड़े विवाद रूस के कब्जे वाली यूक्रेनी जमीन को लेकर दोनों पक्षों के बीच मतभेद बने हुए हैं। इसी मुद्दे पर वार्ता में हल निकालना सबसे बड़ा लक्ष्य है, लेकिन फिलहाल किसी व्यापक समझौते की संभावना कम दिखाई दे रही है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। गणतंत्र दिवस के पावन अवसर पर लंदन स्थित पार्लियामेंट स्क्वायर में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें भावपूर्ण नमन किया।
बापू के सत्य और अहिंसा के आदर्श आज भी हमें उद्देश्य के साथ नेतृत्व करने, समाज की सेवा करने और न्याय के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं। इस अवसर पर झारखंड राज्य से यहां पढ़ने वाले स्कॉलर्स, डायस्पोरा के सदस्यों एवं अन्य उपस्थित लोगों से मिलना हुआ।
एबीएन बिजनेस डेस्क। दुनिया भर में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और आर्थिक अनिश्चितता के बीच निवेशकों का रुझान एक बार फिर सुरक्षित विकल्पों की ओर बढ़ता दिख रहा है। इसी कड़ी में सोने की कीमतों ने नया इतिहास रच दिया है। रविवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना पहली बार 5,000 डॉलर प्रति औंस के स्तर को पार कर गया।
कारोबार के दौरान इसकी कीमत 5,026 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच गई। सोने के साथ-साथ चांदी में भी जबरदस्त तेजी देखने को मिली। शुक्रवार को चांदी की कीमत पहली बार 102 डॉलर प्रति औंस से ऊपर चली गई थी। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद से ही कीमती धातुओं के भाव लगातार मजबूत बने हुए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका की आक्रामक विदेश नीति, खासतौर पर ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप के बयानों और फेडरल रिजर्व पर बढ़ते राजनीतिक दबाव ने बाजारों में बेचैनी बढ़ा दी है। इसके चलते निवेशक डॉलर और बॉन्ड से दूरी बनाकर सोने को प्राथमिकता दे रहे हैं।
इसके अलावा बीते दो वर्षों से कमजोर अमेरिकी डॉलर, केंद्रीय बैंकों द्वारा बड़े पैमाने पर सोने की खरीद और लगातार ऊंची बनी महंगाई ने भी सोने की कीमतों को मजबूत सहारा दिया है। जनवरी 2024 में जहां सोना करीब 2,000 डॉलर प्रति औंस पर था, वहीं अब यह ढाई गुना से ज्यादा बढ़ चुका है।
हाल ही में ट्रंप द्वारा कुछ यूरोपीय देशों पर टैरिफ लगाने की धमकियों से पीछे हटने के बावजूद अमेरिका और यूरोप के बीच तनाव कम नहीं हुआ है। ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिकी रुख ने व्यापार युद्ध की आशंकाओं को फिर से हवा दे दी है। इसका सीधा असर डॉलर पर पड़ा, जो यूरो के मुकाबले चार महीने के निचले स्तर पर आ गया। वहीं, सोने की कीमतों में और तेजी आई।
सैक्सो यूके के निवेश रणनीतिकार नील विल्सन का कहना है कि जैसे-जैसे वैश्विक राजनीति में तनाव बढ़ा है, वैसे-वैसे सोना नए रिकॉर्ड बनाता चला गया। उन्होंने यह भी कहा कि ग्रीनलैंड में संभावित अमेरिकी सैन्य गतिविधियों को अब बाजार पहले की तरह नजरअंदाज नहीं कर रहा।
इस हफ्ते होने वाली अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व की नीति बैठक को लेकर भी बाजार सतर्क हैं। हाल ही में फेड चेयरमैन जेरोम पॉवेल को भेजे गए कानूनी नोटिस के बाद बैंक की स्वतंत्रता पर सवाल उठने लगे हैं। ट्रंप पहले भी कई मौकों पर पॉवेल की नीतियों और महंगाई को लेकर उनकी टिप्पणियों की आलोचना कर चुके हैं।
हालांकि, दुनिया के कई बड़े केंद्रीय बैंकों के प्रमुखों ने फेड और पॉवेल के समर्थन में बयान दिए हैं। स्वतंत्र विश्लेषक स्टीफन इन्स के मुताबिक, केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता को लेकर बनी अनिश्चितता ने सोने की कीमतों को दीर्घकालिक मजबूती दी है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। अमेरिका और ईरान के बीच तेजी से बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर अब अंतरराष्ट्रीय हवाई सेवाओं पर भी साफ दिखने लगा है। यूरोप की प्रमुख एयरलाइनों केएलएम, लुफ्थांसा और एयर फ्रांस ने मिडिल ईस्ट के कई महत्वपूर्ण गंतव्यों के लिए अपनी उड़ानें अस्थायी रूप से निलंबित कर दी हैं।
इन गंतव्यों में दुबई, रियाद, दम्माम और तेल अवीव जैसे प्रमुख शहर शामिल हैं। एयरलाइनों ने यह कदम क्षेत्र में बिगड़ती सुरक्षा स्थिति और यात्रियों व क्रू की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उठाया है। जानकारी के मुताबिक, फारस की खाड़ी में अमेरिकी नौसैनिक तैनाती बढ़ने और पूरे क्षेत्र में अस्थिरता के माहौल ने एयरलाइनों की चिंताओं को और बढ़ा दिया है।
एयरलाइनों का कहना है कि वे हालात पर लगातार नजर बनाये हुए हैं और स्थिति सामान्य होने पर ही सेवाएं बहाल की जायेंगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका-ईरान टकराव और गहराता है, तो मिडिल ईस्ट के हवाई मार्गों पर लंबे समय तक असर पड़ सकता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय यात्रियों और वैश्विक एविएशन सेक्टर को भारी नुकसान होने की आशंका है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। चीन में एक बार फिर वायरस को लेकर चिंता बढ़ गयी है। कोविड-19 के बाद अब नोरोवायरस ने लोगों में दहशत पैदा कर दी है। दक्षिणी चीन के ग्वांगडोंग प्रांत में स्थित फोशान शहर के एक सीनियर हाई स्कूल में 100 से ज्यादा छात्र इस वायरस की चपेट में आ गये हैं। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, कुल 103 छात्रों में संक्रमण की पुष्टि हुई है।
स्थानीय अधिकारियों ने बताया कि राहत की बात यह है कि सभी संक्रमित छात्रों की हालत सामान्य है। किसी भी छात्र को गंभीर समस्या नहीं हुई है और न ही किसी तरह की मौत की सूचना है। एहतियात के तौर पर स्कूल परिसर को पूरी तरह से सैनिटाइज कर दिया गया है और छात्रों की सेहत पर लगातार नजर रखी जा रही है।
संक्रमित छात्रों में पेट से जुड़ी परेशानियां सामने आयी हैं। उन्हें उल्टी और दस्त जैसी दिक्कतें हुईं, जो नोरोवायरस के आम लक्षण माने जाते हैं। सभी छात्रों को जरूरी इलाज दिया जा रहा है और वे चिकित्सकों की निगरानी में हैं। साथ ही यह पता लगाने के लिए जांच भी चल रही है कि वायरस किस वजह से फैला।
ग्वांगडोंग प्रांत के रोग नियंत्रण विभाग के अनुसार, इस इलाके में हर साल अक्टूबर से मार्च के बीच नोरोवायरस के मामले ज्यादा सामने आते हैं। ठंड के मौसम में यह वायरस तेजी से फैलता है और खासतौर पर स्कूलों, हॉस्टल और भीड़भाड़ वाली जगहों पर इसका खतरा बढ़ जाता है।
नोरोवायरस एक बेहद संक्रामक वायरस है, जो पेट के संक्रमण का कारण बनता है। इसे आम बोलचाल में स्टमक फ्लू भी कहा जाता है, हालांकि इसका फ्लू से कोई सीधा संबंध नहीं होता। इस वायरस से संक्रमित होने पर अचानक उल्टी, दस्त, पेट दर्द और कमजोरी महसूस होती है। यह वायरस बहुत तेजी से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैल सकता है, खासकर दूषित खाने, पानी या संक्रमित सतहों के संपर्क में आने से।
दुनिया भर में हर साल करोड़ों लोग नोरोवायरस से प्रभावित होते हैं। आंकड़ों के अनुसार, सालाना करीब 68 करोड़ से ज्यादा लोग इसकी चपेट में आते हैं। इनमें 5 साल से कम उम्र के लगभग 20 करोड़ बच्चे शामिल होते हैं। यह वायरस हर साल करीब 2 लाख लोगों की जान भी ले लेता है, जिनमें करीब 50 हजार बच्चे होते हैं। इसका सबसे ज्यादा असर गरीब और विकासशील देशों में देखने को मिलता है, जहां इलाज की सुविधाएं सीमित होती हैं।
आर्थिक रूप से भी यह वायरस दुनिया को भारी नुकसान पहुंचाता है। इलाज और कामकाज के नुकसान को मिलाकर हर साल करीब 60 अरब डॉलर का आर्थिक असर पड़ता है। अमेरिका में तो यह वायरस खाने से फैलने वाली बीमारियों की सबसे बड़ी वजह माना जाता है।
नोरोवायरस का पहला बड़ा मामला साल 1968 में अमेरिका के ओहायो राज्य के नॉरवॉक शहर में सामने आया था। उस समय एक स्कूल में एक साथ कई लोग बीमार पड़ गये थे। इसी घटना के बाद वैज्ञानिकों ने इस वायरस पर रिसर्च शुरू की थी। चूंकि यह बीमारी सबसे पहले नॉरवॉक शहर में पहचानी गई थी, इसलिए शुरुआत में इसे नॉरवॉक वायरस कहा गया, जो बाद में नोरोवायरस के नाम से जाना जाने लगा।
मौसम के हिसाब से भी इस वायरस का असर अलग-अलग जगहों पर अलग समय में देखने को मिलता है। दुनिया के उत्तरी हिस्सों में यह बीमारी नवंबर से अप्रैल के बीच ज्यादा फैलती है, जबकि दक्षिणी हिस्सों में अप्रैल से सितंबर के बीच इसके मामले बढ़ते हैं। जो देश भूमध्य रेखा के पास स्थित हैं, वहां यह वायरस किसी खास मौसम तक सीमित नहीं रहता और साल भर फैल सकता है।
फिलहाल चीन में स्वास्थ्य अधिकारी स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं और लोगों से साफ-सफाई और सावधानी बरतने की अपील की जा रही है ताकि संक्रमण को फैलने से रोका जा सके।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। ट्रंप द्वारा 500% टैरिफ लगाये जाने वाले सांकेतिक बयान पर भारत ने अपनी स्थिति साफ कर दी है। भारत के विदेश मंत्रालय ने इस पर अपना बयान देते हुए कहा कि भारत की ऊर्जा नीति किसी बाहरी दबाव या धमकी से नहीं, बल्कि अपने 1.4 अरब नागरिकों की जरूरतों से तय होती है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में द सेंक्शनिंग आॅफ रसिया एक्ट 2025 को समर्थन दिया है, जिसके तहत रूस से तेल या यूरेनियम खरीदने वाले देशों विशेषकर भारत, चीन और ब्राजील पर 500 % तक का भारी-भरकम आयात टैरिफ लगाया जा सकता है। इसका उद्देश्य रूस की अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचाना है।
प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने साप्ताहिक ब्रीफिंग में कहा कि भारत इस बिल और इसके घटनाक्रमों पर बारीकी से नजर रखे हुए है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत का लक्ष्य अपने नागरिकों को सस्ती और सुरक्षित ऊर्जा मुहैया कराना है। जायसवाल ने कहा कि हमारा रुख जगजाहिर है। हम वैश्विक बाजार के बदलते हालातों और अपनी एनर्जी सिक्योरिटी की जरूरतों के हिसाब से ही फैसले लेते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह बिल भारत जैसे रणनीतिक सहयोगियों पर दबाव बनाने की एक कोशिश है, लेकिन भारत ने साफ कर दिया है कि वह अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक हितों के साथ समझौता नहीं करेगा।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारतीय शेयर बाजार में गिरावट का सिलसिला गुरुवार को लगातार चौथे दिन भी जारी रहा। अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक ऐसे बिल को मंजूरी दे दी है, जिसके तहत अमरीका भारत पर रूसी तेल खरीदने पर 500 फीसदी का टैरिफ लगा सकता है। वैसे अभी तक इस बिल को संसद से मंजूरी नहीं मिली है लेकिन माना जा रहा है कि इस बिल को अमरीकी संसद का समर्थन मिल सकता है।
अगर ऐसा हुआ तो आने वाले दिनों में भारत पर एक मोटा टैरिफ अमरीकी सरकार की ओर से लग सकता है। इस टैरिफ के कहर के डर की वजह से भारत के शेयर बाजार में हाहाकार मच गया और सैंसेक्स में 780 से ज्यादा अंकों की गिरावट देखने को मिली। खास बात तो यह है कि इस गिरावट की वजह से शेयर बाजार निवेशकों के 7,68,426.45 करोड़ रुपए डूब गए हैं।
2 जनवरी को जहां सेंसेक्स 85,762 के स्तर पर था, वहीं आज 84,180 के स्तर पर बंद हुआ यानि चार कारोबारी सत्रों में इंडेक्स 1,582 अंक टूट चुका है। इस गिरावट के चलते बीएसई पर सूचीबद्ध सभी कंपनियों का कुल मार्केट कैपिटलाइजेशन करीब 9 लाख करोड़ रुपए घट गया है।
बीएसई के आंकड़ों के मुताबिक, 2 जनवरी को एक्सचेंज पर सूचीबद्ध कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण 4,81,24,779.35 करोड़ रुपए था। मौजूदा सत्र में यह घटकर करीब 4,72,25,753.38 करोड़ रुपये रह गया यानी महज चार दिनों में निवेशकों की संपत्ति में लगभग 899,025.97 करोड़ रुपए की गिरावट दर्ज की गयी है। वहीं एक दिन में निवेशकों के 768,426.45 करोड़ रुपये डूब गए हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, मौजूदा गिरावट के पीछे ज्यादातर वजहें वैश्विक और भू-राजनीतिक हैं। सबसे बड़ी चिंता अमेरिका की टैरिफ नीति को लेकर है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ऐसे प्रस्ताव को समर्थन दिया है, जिसके तहत रूस से व्यापार जारी रखने वाले देशों पर 500 फीसदी तक टैरिफ लगाया जा सकता है।
इस आशंका ने बाजार में अनिश्चितता बढ़ा दी है। इसके अलावा, विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली भी बाजार पर दबाव बना रही है। जनवरी में अब तक एफआईआई करीब 6,000 करोड़ रुपए के शेयर बेच चुके हैं। गौरतलब है कि साल 2025 में भी विदेशी निवेशकों की ओर से रिकॉर्ड आउटफ्लो देखा गया था।
मार्केट एक्सपर्ट्स का कहना है कि अब निवेशकों की नजरें कंपनियों के तिमाही नतीजों पर टिकी हैं। अगर नतीजे उम्मीद के मुताबिक रहे तो बाजार को कुछ राहत मिल सकती है। साथ ही, अमेरिका-भारत ट्रेड डील पर स्पष्टता आने से ही विदेशी निवेशकों की वापसी की उम्मीद की जा रही है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। जापान के पश्चिमी हिस्से में मंगलवार सुबह एक तेज भूकंप ने लोगों को दहशत में डाल दिया। जापान मौसम विज्ञान एजेंसी के अनुसार, शिमाने प्रांत में सुबह 10:18 बजे (स्थानीय समय) आये इस भूकंप की तीव्रता 6.4 मापी गयी, जबकि इसका केंद्र जमीन से लगभग 10 किलोमीटर की गहराई में था।
भूकंप का असर शिमाने और पड़ोसी तोत्तोरी प्रांत में सबसे ज्यादा देखा गया, जहां जापान के सात-स्तरीय भूकंप पैमाने पर इसकी तीव्रता ऊपरी स्तर 5 तक दर्ज की गयी। भूकंप का केंद्र 35.3 डिग्री उत्तरी अक्षांश और 133.2 डिग्री पूर्वी देशांतर पर स्थित था।
मुख्य झटके के बाद दो शक्तिशाली आफ्टरशॉक भी महसूस किये गये। पहला आफ्टरशॉक 10:28 बजे (5.1 तीव्रता) और दूसरा 10:37 बजे (5.4 तीव्रता) पर दर्ज किया गया। लगातार झटकों के कारण लोगों में भय का माहौल बना रहा।
मात्सुए शहर (शिमाने प्रांत) में गिरने और अन्य दुर्घटनाओं के कारण चार लोगों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है। स्थानीय प्रशासन के अनुसार, कई घरों की छतों को नुकसान पहुंचा है।
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