एबीएन नॉलेज डेस्क। हिंदी साहित्य भारती के उपाध्यक्ष सह झारखंड पेरेंट्स एसोसिएशन के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि अंतर्राष्ट्रीय चंद्रमा दिवस प्रत्येक वर्ष 20 जुलाई को मनाया जाता है। क्योंकि इसी दिन वर्ष 1969 में मानव इतिहास की सबसे बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धियों में से एक, अपोलो-11 मिशन के अंतर्गत अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री नील आर्मस्ट्रांग और बज एल्ड्रिन ने पहली बार चंद्रमा की सतह पर कदम रखा था।
यह घटना विज्ञान, तकनीक और मानव साहस की ऐतिहासिक विजय का प्रतीक मानी जाती है। अंतर्राष्ट्रीय चंद्रमा दिवस का मुख्य उद्देश्य चंद्रमा के वैज्ञानिक अध्ययन, शांतिपूर्ण उपयोग तथा अंतरिक्ष अनुसंधान के प्रति वैशिक सहयोग को बढ़ावा देना है। यह दिवस लोगों, विशेषकर युवाओं और विद्यार्थियों में विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित के प्रति रुचि जागृत करने का भी महत्वपूर्ण माध्यम है।
साथ ही यह अंतरिक्ष अन्वेषण के क्षेत्र में भविष्य की संभावनाओं और मानवता के साझा प्रयासों को रेखांकित करता है। चंद्रमा पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह है, जिसका पृथ्वी के पर्यावरण और जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। समुद्र में ज्वार-भाटा, पृथ्वी की धुरी की स्थिरता तथा कई प्राकृतिक प्रक्रियाएं चंद्रमा से प्रभावित होती हैं।
प्राचीन काल से ही चंद्रमा मानव सभ्यता, संस्कृति, साहित्य, कला और धार्मिक परंपराओं का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। आज आधुनिक विज्ञान चंद्रमा को भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों, अनुसंधान केंद्रों तथा अन्य ग्रहों की यात्राओं के लिए आधार के रूप में देख रहा है। भारत के लिए भी यह दिवस अत्यंत गौरव का विषय हैभारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने चंद्रयान-1, चंद्रयान-2 तथा चंद्रयान-3 जैसे सफल अभियानों के माध्यम से विश्व अंतरिक्ष विज्ञान में अपनी विशिष्ट पहचान बनायी है।
विशेष रूप से चंद्रयान-3 की सफलता ने भारत को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के निकट सफलतापूर्वक सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला विश्व का पहला देश बनाया, जिसने भारतीय वैज्ञानिक क्षमता का लोहा पूरी दुनिया को मनवाया इस दिवस का संदेश है कि अंतरिक्ष किसी एक देश की संपत्ति नहीं, बल्कि समस्त मानवता की साझा धरोहर है। चंद्रमा का उपयोग केवल शांतिपूर्ण, वैज्ञानिक और मानव कल्याण के उद्देश्यों के लिए होना चाहिए। अंतर्राष्ट्रीय चंद्रमा दिवस हमें विज्ञान के प्रति जिज्ञासा, नवाचार, सहयोग और सतत विकास की भावना को मजबूत करने की प्रेरणा देता है।
यह दिवस नयी पीढ़ी को बड़े सपने देखने, वैज्ञानिक सोच अपनाने और अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में नये कीर्तिमान स्थापित करने के लिए प्रेरित करता है। मानवता के उज्ज्वल भविष्य की दिशा में चंद्रमा आज भी आशा, अनुसंधान और असीम संभावनाओं का प्रतीक बना हुआ है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। तकनीक के इस युग में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के जरिए डीपफेक और एआई कंटेंट से लोगों को जाल साज गुमराह कर रहे हैं। इसे लेकर देश में पहली बार एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) से तैयार होने वाले विज्ञापनों के लिए अलग नियम की तैयारी शुरू हो गयी है। विज्ञापन नियामक संस्था एडवरटाइजिंग स्टैंडर्ड्स काउंसिल आॅफ इंडिया (एएससीआई) ने इसका मसौदा जारी किया है।
विज्ञापन नियामक संस्था ने कहा किसी विज्ञापन में एआई की मदद से किसी सेलिब्रिटी की आवाज या चेहरा बनाया गया है, प्रोडक्ट का डेमो तैयार किया गया है, वर्चुअल इन्फ्लुएंसर दिखाया गया है या ऐसा दृश्य है जो उपभोक्ता के खरीदी के फैसले पर असर डाल सकता है, तो उस पर साफ तौर पर बताना होगा कि यह एआई से बनाया गया है। हालांकि, केवल टैग लगा देना हर मामले में पर्याप्त नहीं होगा। फर्जी डॉक्टर, नकली प्रशंसापत्र (टेस्टिमोनियल), बढ़ा-चढ़ाकर दिखाये गये नतीजे या बिना अनुमति किसी व्यक्ति की आवाज और चेहरा इस्तेमाल करने वाले एआई विज्ञापनों को सीधे खारिज किया जायेगा।
संसदीय समिति पहले ही उपभोक्ताओं को एआई आधारित ठगी से बचाने के लिए सख्त नियम बनाने की सिफारिश कर चुकी है। सुझावों में तकनीकी विशेषज्ञों ने कहा है कि स्क्रीन पर छोटे-से एआई लेबल से काम नहीं चलेगा। उन्होंने डिजिटल ट्रैकिंग, वाटरमार्क, कंपनियों की जवाबदेही और नियम तोड़ने पर कड़ी कार्रवाई की भी सिफारिश की है। मालूम हो, एएससीआई ने मसौदे पर सुझाव मांगे थे। ये सरकार को मिल चुके हैं। इन्हीं के आधार पर अंतिम दिशा-निर्देश जारी किये जायेंगे।
इससे पहले केंद्र सरकार सोशल मीडिया पर डीपफेक और एआई कंटेंट की पहचान तथा शिकायत मिलने के तीन घंटे के भीतर उसे हटाने के नियम बना चुकी है। अब एआई से तैयार विज्ञापनों के लिए दिशा-निर्देश लाये जा रहे हैं। इससे यह तय होगा कि कौन-से विज्ञापन टैग से चल सकेंगे और किन पर रोक लगेगी।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। सरकार ने मेटा को इस नोटिस का जवाब देने के लिए मात्र 3 दिनों का समय दिया है। जब तक सरकार इस मामले में पूरी तरह संतुष्ट नहीं हो जाती, तब तक ह्वाट्सऐप्प भारत में इस फीचर को लॉन्च नहीं कर पायेगा।
सरकार की ओर से जारी नोटिस में लिखा है, ऐसा महसूस होता है कि यह फीचर आॅनलाइन धोखाधड़ी, फिशिंग, डिजिटल अरेस्ट स्कैम और नकली पहचान वाले हमलों के मामलों को काफी हद तक बढ़ा सकता है, क्योंकि इससे बुरे लोग पीड़ितों को लुभाने और मैसेज करने में मदद कर सकते हैं।
सरकार ने साफ कहा है कि जब आप जानते हैं कि इस नए फीचर से आॅनलाइन ठगी और स्कैम बढ़ेंगे, तो फिर देश के आईटी कानून (आईटी एक्ट 2000) और नियमों को तोड़ने के आरोप में आप पर कानूनी कार्रवाई क्यों न की जाये? मेटा को इसका लिखित और विस्तृत जवाब देना होगा।
एबीएन नॉलेज डेस्क (नयी दिल्ली)। भारतीय रक्षा क्षेत्र के लिए एक बड़ी और शानदार खबर है। भारत ने एक साथ अनेक सामरिक लक्ष्यों पर एक साथ निशाना लगाने वाली उन्नत अग्नि मिसाइल (एमआइआरवी-मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टागेर्टेबल री-एंट्री व्हीकल) का सफल उड़ान-परीक्षण किया है। भारत ने शनिवार को इसकी घोषणा की।
रक्षा मंत्रालय ने शनिवार को बताया कि यह परीक्षण शुक्रवार को ओडिशा के डॉ एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से किया गया। यह उड़ान-परीक्षण अनेक पेलोड के साथ किया गया, जिन्हें हिंद महासागर क्षेत्र में विस्तृत भौगोलिक क्षेत्र में स्थानिक रूप से फैले विभिन्न लक्ष्यों पर निर्देशित किया गया था। उड़ान संबंधी आंकड़ों ने पुष्टि की कि परीक्षण के दौरान मिशन के सभी उद्देश्य सफलतापूर्वक प्राप्त किये गये। यह मिसाइल एक ही समय में कई अलग-अलग टारगेट्स को भेदने में सक्षम है। इस महाविनाशक मिसाइल टेस्ट से दुनिया की नींद उड़ गयी।
परीक्षण के दौरान आकाश में चमकदार प्लूम (ग्लोइंग ट्रेल) पूर्वी भारत (ओडिशा, पश्चिम बंगाल) के साथ-साथ बांग्लादेश के तटीय इलाकों (जैसे सिताकुंडा, कॉक्स बाजार) से साफ दिखाई दिया। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में लोगों ने इसे आग की लकीर या अज्ञात उड़ान वस्तु बताया, जिससे विभिन्न कयास लगाए जाने लगे।
कुछ ने इसे अग्नि-6 का परीक्षण माना। यह क्षमता मिसाइल डिफेंस सिस्टम को चकमा देने में बेहद प्रभावी है और भारत को परमाणु निरोधक क्षमता को मजबूत करती है। भारत इससे पहले मार्च 2024 में मिशन दिव्यास्त्र के तहत अग्नि-5 का एमआइआरवी परीक्षण कर चुका है, लेकिन यह नया टेस्ट और अधिक एडवांस सिस्टम की पुष्टि करता है।
यह मिसाइल देशभर के उद्योगों के सहयोग से रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) की प्रयोगशालाओं द्वारा विकसित की गयी है। यह परीक्षण भारत की रणनीतिक क्षमताओं को और मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
अग्नि सीरीज की मिसाइलें मुख्य रूप से चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसियों के संदर्भ में निरोधक क्षमता बढ़ाती हैं। एमआइआरवी और संभावित लंबी रेंज (5,000+ किमी या अधिक) के साथ यह मिसाइल एक साथ कई हमले की क्षमता प्रदान करती है। डीआरडीओ अध्यक्ष ने पहले ही अग्नि-6 कार्यक्रम की तकनीकी तैयारी की घोषणा की थी, जिसकी रेंज 10,000-12,000 किमी तक बताई जाती है।
सरकार की ओर से बताया गया कि मिसाइल के लॉन्च से लेकर सभी पेलोड्स के टारगेट से टकराने तक की पूरी प्रक्रिया पर पैनी नजर रखी गयी। इसके लिए कई जमीनी और समुद्री (शिप-बेस्ड) ट्रैकिंग स्टेशनों का इस्तेमाल किया गया।
फ्लाइट डेटा ने इस बात की भी पुष्टि कर दी है कि इस ट्रायल के सभी लक्ष्य सफल रहे। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सफल उड़ान-परीक्षण के लिए डीआरडीओ, भारतीय सेना और उद्योग जगत को बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह बढ़ती हुई खतरे की धारणाओं के विरुद्ध देश की रक्षा तैयारियों में एक अद्भुत क्षमता जोड़ेगा।
एबीएन नॉलेज डेस्क। नासा (NASA) ने अपने ऐतिहासिक Artemis II मिशन में एक बड़ा बदलाव करते हुए पहली बार अंतरिक्ष यात्रियों को अपने पर्सनल iPhone साथ ले जाने की अनुमति दी है। यह कदम अंतरिक्ष मिशनों में आधुनिक तकनीक को शामिल करने की दिशा में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है। इस मिशन में चार सदस्यीय क्रू शामिल है:
ये सभी Orion spacecraft में सवार होकर Space Launch System रॉकेट के जरिए Kennedy Space Center से लॉन्च हुए और चांद के चारों ओर 10 दिन की यात्रा पर निकले हैं। NASA के अनुसार, iPhone का इस्तेमाल कैमरे की तरह किया जाएगा ताकि अंतरिक्ष यात्री मिशन के बिहाइंड-द-सीन पलों को आसानी से कैद कर सकें। इससे भारी-भरकम सरकारी कैमरों पर निर्भरता कम होगी।
Artemis II मिशन भविष्य में इंसानों को फिर से चांद पर उतारने की तैयारी का अहम हिस्सा है। iPhone जैसे आधुनिक उपकरणों का उपयोग इस बात का संकेत है कि अंतरिक्ष यात्रा अब ज्यादा टेक-फ्रेंडली और आधुनिक बन रही है।
एबीएन न्यूज नेटवर्क, बोकारो। ग्रामीण एवं ट्राइबल बाहुल क्षेत्रों में डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा देने तथा समाज के वंचित वर्गों को आधुनिक तकनीक से जोड़ने के उद्देश्य से नवा बिहान कम्युनिटी डेवलपमेंट प्रोग्राम द्वारा बोकारो जिले के गोमिया प्रखंड अंतर्गत सियारी पंचायत में एक महत्वपूर्ण पहल की गयी है। इस पहल के अंतर्गत ट्राइबल बाहुल स्कूल एवं पंचायत ज्ञान केंद्र सियारी में बच्चों के लिए आधुनिक आईटी इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण किया गया है। इसके साथ ही स्थानीय महिलाओं के लिए डिजिटल साक्षरता एवं कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रम की भी शुरुआत की गयी है, जो इस परियोजना को और अधिक प्रभावी एवं समावेशी बनाता है।
इस पहल का उद्देश्य केवल बच्चों को कंप्यूटर उपलब्ध कराना नहीं है, बल्कि उन्हें डिजिटल युग के अनुरूप तैयार करना है। आज के समय में शिक्षा का स्वरूप तेजी से बदल रहा है और डिजिटल माध्यम शिक्षा का एक अभिन्न हिस्सा बन चुका है। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों को भी तकनीकी शिक्षा से जोड़ना अत्यंत आवश्यक हो गया है, ताकि वे भी देश और दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ सकें।
नवा बिहान द्वारा स्थापित आईटी इंफ्रास्ट्रक्चर के तहत कंप्यूटर, वढर, कंप्यूटर टेबल, कुर्सियां, अलमारी, बुक शेल्फ, एलईडी ट्यूब लाइट, दीवार पंखा, डस्टबिन आदि आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराये गये हैं। इन संसाधनों के माध्यम से विद्यालय में एक बेहतर डिजिटल लर्निंग वातावरण तैयार किया गया है, जहां छात्र-छात्राएं कंप्यूटर शिक्षा प्राप्त कर सकेंगे और नयी तकनीकों के बारे में सीख सकेंगे।
कार्यक्रम का शुभारंभ गरिमामय वातावरण में किया गया, जिसमें मुख्य अतिथियों के रूप में सेल राउरकेला के डीजीएम विश्वनाथ विकास पन्ना एवं सेल बोकारो से आये एसेट मैनेजर टीआर उन्नीकृष्णन नायर उपस्थित रहे। अतिथियों का पारंपरिक आदिवासी अंग वस्त्र एवं गुलदस्ता देकर स्वागत किया गया, जो स्थानीय संस्कृति और सम्मान का प्रतीक है।
अपने संबोधन में अतिथियों ने नवा बिहान के इस प्रयास की सराहना करते हुए कहा कि इस प्रकार की पहल ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा के स्तर को सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उन्होंने कहा कि आज के समय में डिजिटल शिक्षा अत्यंत आवश्यक है और ऐसे प्रयासों से बच्चों को बेहतर अवसर मिलेंगे। उन्होंने यह भी आश्वासन दिया कि भविष्य में भी इस प्रकार के सामाजिक कार्यों में सहयोग जारी रहेगा।
नवा बिहान के फाउंडर आर अजय ने अपने संबोधन में कहा कि आज पूरी दुनिया का एजुकेशन सिस्टम तेजी से बदल रहा है। उन्होंने कहा कि यह समय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और डिजिटल तकनीक का है। यदि बच्चों को स्कूल स्तर से ही कंप्यूटर और अक की बुनियादी जानकारी दी जाये, तो वे भविष्य में किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं रहेंगे।
उन्होंने आगे कहा कि कंप्यूटर शिक्षा छात्रों के उज्जवल भविष्य को संवारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इससे बच्चों में नयी सोच विकसित होती है, उनकी सीखने की क्षमता बढ़ती है और वे तकनीकी रूप से सक्षम बनते हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ग्रामीण और ट्राइबल क्षेत्रों के बच्चों को भी समान अवसर मिलना चाहिए, ताकि वे भी विकसित भारत के निर्माण में अपना योगदान दे सकें।
इस कार्यक्रम में गोमिया बीडीओ महादेव कुमार महतो ने भी अपने विचार व्यक्त किये। उन्होंने नवा बिहान के इस प्रयास की सराहना करते हुए कहा कि यह पहल ग्रामीण शिक्षा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के कार्यक्रमों से न केवल बच्चों को लाभ मिलेगा बल्कि पूरे समाज में सकारात्मक बदलाव आयेगा।
कार्यक्रम के अंत में सियारी पंचायत के मुखिया राम वृक्ष मुर्मू ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए सभी अतिथियों, सहयोगी संस्थाओं एवं नवा बिहान टीम का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि यह पहल सियारी पंचायत के लिए गर्व की बात है और इससे यहां के बच्चों और युवाओं को आगे बढ़ने का अवसर मिलेगा।
इस पूरी पहल का एक महत्वपूर्ण पहलू महिलाओं का सशक्तिकरण भी है। नवा बिहान द्वारा सियारी पंचायत में महिलाओं के लिए डिजिटल साक्षरता और कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किया गया है। इस कार्यक्रम के तहत महिलाओं को कंप्यूटर का बेसिक ज्ञान, इंटरनेट का उपयोग, आॅनलाइन सेवाओं की जानकारी और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से आय के अवसरों के बारे में प्रशिक्षण दिया जायेगा।
ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी बड़ी संख्या में महिलाएं डिजिटल तकनीक से वंचित हैं। ऐसे में उन्हें डिजिटल रूप से सशक्त बनाना समय की सबसे बड़ी जरूरत है। नवा बिहान का यह प्रयास महिलाओं को न केवल तकनीकी रूप से सक्षम बनाएगा, बल्कि उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने का अवसर भी प्रदान करेगा।
महिलाओं को प्रशिक्षण के दौरान यह भी सिखाया जायेगा कि वे किस प्रकार अपने स्थानीय उत्पादों जैसे हस्तशिल्प, सिलाई-कढ़ाई, घरेलू उत्पाद आदि को डिजिटल माध्यम से बाजार तक पहुंचा सकती हैं। इसके साथ ही उन्हें डिजिटल पेमेंट, आॅनलाइन बैंकिंग और सरकारी योजनाओं की जानकारी भी दी जायेगी।
नवा बिहान का मानना है कि जब महिलाएं सशक्त होती हैं, तो पूरा समाज सशक्त होता है। शिक्षित और जागरूक महिलाएं अपने परिवार और बच्चों के भविष्य को बेहतर दिशा दे सकती हैं। इसलिए इस कार्यक्रम में बच्चों के साथ-साथ महिलाओं को भी शामिल किया गया है, ताकि समग्र विकास सुनिश्चित किया जा सके।
इस पहल से सियारी पंचायत के बच्चों को कंप्यूटर शिक्षा का लाभ मिलेगा, वहीं महिलाएं डिजिटल प्रशिक्षण के माध्यम से आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ेंगी। यह कार्यक्रम शिक्षा, तकनीक और सामाजिक विकास को एक साथ जोड़ने का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। स्थानीय लोगों, अभिभावकों और समुदाय के सदस्यों ने इस पहल का स्वागत किया है।
उनका मानना है कि इस प्रकार के प्रयासों से ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा का स्तर सुधरेगा और बच्चों को बेहतर भविष्य बनाने का अवसर मिलेगा। नवा बिहान कम्युनिटी डेवलपमेंट प्रोग्राम का उद्देश्य समाज के कमजोर वर्गों को शिक्षा, कौशल और तकनीक से जोड़कर उन्हें सशक्त बनाना है। यह संगठन लगातार ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा, महिला सशक्तिकरण और रोजगार उन्मुख कार्यक्रमों के माध्यम से समाज में सकारात्मक बदलाव लाने का कार्य कर रहा है।
भविष्य में नवा बिहान का लक्ष्य है कि इस प्रकार के डिजिटल शिक्षा और प्रशिक्षण कार्यक्रमों को झारखंड के अन्य ग्रामीण और ट्राइबल क्षेत्रों में भी विस्तार दिया जाये, ताकि अधिक से अधिक लोग इसका लाभ उठा सकें। नवा बिहान का यह प्रयास विकसित भारत के निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जहां हर बच्चा शिक्षित, हर महिला सशक्त और हर गांव डिजिटल रूप से सक्षम हो।
एबीएन नॉलेज डेस्क। आज खत्म हुआ चंद्र ग्रहण साल का पहला चंद्र ग्रहण था, इससे पहले साल का पहला सूर्य ग्रहण 17 फरवरी को लगा था। अब इसके बाद 12 अगस्त को साल का दूसरा सूर्य ग्रहण लगेगा, वहीं 28 अगस्त को साल का दूसरा चंद्र ग्रहण लगेगा।
चंद्र ग्रहण खत्म हो जाएगा। शास्त्रों में ग्रहण को अशुभ और नकारात्मकता ऊर्जा माना जाता है। ग्रहण के मोक्ष काल के बाद जप, तप, स्नान और दान का महत्व विशेष होता है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। तीन मार्च को पूर्ण चंद्रग्रहण है। इसे खास माना जा रहा है। जब पृथ्वी, सूर्य और चंद्रमा तीनों ही एक लाइन में आ जाते हैं, तो पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ती है। इसे ही चंद्र ग्रहण कहते हैं। इस दौरान चंद्रमा लाल नजर आयेगा। इसे ब्लड मून भी कहा जाता है। यानी चंद्रमा सीधे पृथ्वी की छाया से गुजरेगा। मंगलवार शाम को चमकीले और पूर्ण चंद्रमा पर एक गहरी छाया पड़नी शुरू हो जायेगी। एक बार जब चंद्रमा पूरी तरह से छाया में डूब जायेगा, तो वह लाल रंग की चमक लेने लगेगा।
अगर मौसम साफ रहा तो आप इसे देख सकते हैं। खगोलविदों के अनुसार पूर्वोत्तर भारत में दृश्यता बेहतर रहने की संभावना है, लिहाजा वहां पर इसे स्पष्टता के साथ देखा जा सकता है। असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, नागालैंड और मिजोरम में देखा जा सकेगा। आप इसे दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता से भी देख सकते हैं।
हालांकि, यहां से शायद उतना क्लियर विजन न आये। इसे देखने के लिए विशेष चश्मे की जरूरत नहीं है। आप नंगी आंखों से इसे देख सकते हैं। इसका स्वास्थ्य पर भी कोई असर नहीं पड़ेगा। वैज्ञानिक दृष्टि से चंद्र ग्रहण एक खगोलीय घटना है। अत: इसका स्वास्थ्य या दैनिक जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। हालांकि, धर्म-कर्म के जानकार ऐसा नहीं मानते हैं।
शास्त्रों में चंद्र ग्रहण को लेकर कई तरह की बातें लिखी हैं। ग्रहण शुरू होने से पहले ही सूतक काल की शुरुआत हो जाती है। इस काल के दौरान कोई भी शुभ कार्य नहीं होता है। इस बार भी नौ घंटे पहले सूतक काल की शुरुआत हो रही है। आप सूतक काल में पूजा-पाठ नहीं कर सकते हैं। ग्रहण समाप्त होने के बाद लोग स्नान और पूजा पाठ करते हैं।
ज्योतिष अनुसार 3 मार्च को सुबह 09:39 बजे से सूतक काल शुरू हो जायेंगे, जो ग्रहण समाप्त होने के साथ खत्म होंगे। दिल्ली के प्रसिद्ध कल्काजी मंदिर के महंत पीठाधीश्वर सुरेंद्रनाथ अवधूत ने एबीएन को बताया, इस बार का चंद्र ग्रहण दोपहर 3:20 से शुरू होकर 6:57 तक रहेगा।
पंडित उमाशंकर मिश्र का कहना है कि ग्रहण काल के दौरान मंत्र जप और मानसिक पूजा श्रेष्ठ मानी गयी है। ग्रहण समाप्त होने के बाद (शाम 06:57 बजे के बाद) पूरे घर में गंगाजल का छिड़काव करें, स्नान करें और दान-पुण्य करें। इसके बाद ही अगले दिन यानी 4 मार्च को सुरक्षित और हर्षोल्लास के साथ होली का आनंद लें।
लखनऊ के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य डॉ उमाशंकर मिश्र का कहना है कि ग्रहण काल के दौरान सिंह, कन्या और कुंभ राशि वालों को विशेष सावधानी बरतें, जबकि मेष और मिथुन के लिए समय शुभ रहेगा। ग्रहण काल में नकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। ज्योतिषीय दृष्टि से इससे बचें।
धार्मिक मान्यता है कि जब देवताओं और असुरों के बीच समुद्र मंथन हुआ था, तब राहु ने अमृत पान कर लिया था। वह असुर था। इसलिए भगवान विष्णु ने उसका सिर काट दिया। उसके सिर को राहु और उसके धड़ को केतु कहा जाता है। मान्यता है कि तभी से राहु और केतु, सूर्य और चंद्रमा को ग्रसते हैं, इसलिए ग्रहण लगता है।
दरअसल, चंद्रमा के सामने जब पृथ्वी आती है, तो उसकी छाया चंद्रमा पर पड़ती है। इस वजह से ब्लड मून दिखता है। इसकी लालिमा उस समय पृथ्वी के वायुमंडल की स्थिति पर निर्भर करती है। वायुमंडल में जितना अधिक धूल होगा, उतनी ही कम रोशनी निकल पाएगी, इससे चंद्रमा गहरा लाल दिखेगा। इसके ठीक उलट, अगर वायुमंडल में धूल भरा नहीं होगा, तो यह रोशनी को अधिक मात्रा में गुजरने देगा, इसलिए चंद्रमा नारंगी रंग का दिखाई देगा।
वायुमंडल से केवल लाल प्रकाश ही गुजर पाता है, क्योंकि नीला प्रकाश (जिसकी तरंगदैर्ध्य कम होती है) बिखर जाता है। इसे रेले प्रकीर्णन कहा जाता है। यही वह प्रक्रिया है जिसके कारण आकाश नीला दिखाई देता है। नीला प्रकाश वायुमंडल से होकर चंद्रमा की ओर नहीं जाता, क्योंकि यह पूरे आकाश में बिखर जाता है। दिन के समय आकाश में हम कहीं भी देखें, हमारी नजर नीले प्रकाश की उन बिखरी हुई किरणों में से किसी एक पर जरूर पड़ेगी।
क्योंकि सूर्य के चारों ओर पृथ्वी की कक्षा के सापेक्ष चंद्रमा की कक्षा बहुत थोड़ी झुकी हुई है, इसलिए तीनों पिंड हमेशा पूरी तरह से एक सीध में नहीं आते जिससे हम पूर्ण चंद्र ग्रहण देख सकें। अगले छह चंद्र ग्रहणों के दौरान, चंद्रमा पृथ्वी की छाया में पूरी तरह से डूबने के बजाय केवल कुछ देर के लिए ही प्रवेश करेगा।
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