एबीएन सेंट्रल डेस्क। कई देशों ने बच्चों की सुरक्षा और आॅनलाइन जोखिम कम करने के लिए सोशल मीडिया पर उम्र आधारित प्रतिबंध या सख्त नियम लागू किये हैं। इसी कड़ी में एक और देश का नाम जुड़ गया है। तुर्किये की संसद ने बुधवार देर रात एक विधेयक पारित किया, जिसमें 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया मंचों तक पहुंच सीमित करने का प्रावधान शामिल है। सरकारी मीडिया ने यह जानकारी दी। यह कानून बच्चों और किशोरों को आॅनलाइन खतरनाक गतिविधियों से बचाने की वैश्विक प्रवृत्ति के मद्देनजर लाया गया है।
सोशल मीडिया कंपनियों को चेतावनी
यह विधेयक ऐसे समय में पारित हुआ है जब एक सप्ताह पहले काहरामानमाराश (दक्षिणी तुर्किये) में हुई गोलीबारी की घटना में 14 वर्षीय एक लड़के ने स्कूल में नौ छात्रों और एक शिक्षक की हत्या कर दी थी। इस घटना में हमलावर की भी मौत हो गयी थी। पुलिस हमलावर की आॅनलाइन गतिविधियों की जांच कर रही है ताकि हमले के पीछे की मंशा का पता लगाया जा सके।
तुर्किये की सरकारी समाचार एजेंसी अनाडोलू के अनुसार नए कानून के तहत सोशल मीडिया कंपनियों को आयु सत्यापन प्रणाली लागू करनी होगी, अभिभावक नियंत्रण (पैरेंटल कंट्रोल) के साधन उपलब्ध कराने होंगे और हानिकारक मानी जाने वाली सामग्री (कंटेंट) पर तेजी से कार्रवाई करनी होगी। अब इस विधेयक को कानून बनने के लिए राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन की मंजूरी की आवश्यकता है, जिन्हें 15 दिनों के भीतर इस पर निर्णय लेना होगा। काहरामानमाराश की घटना के बाद एर्दोआन ने बच्चों की सुरक्षा और निजता के लिए आॅनलाइन जोखिम कम करने की आवश्यकता पर बल दिया था।
एर्दोआन ने सोमवार को टेलीविजन पर अपने एक संबोधन में कहा, हम ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां कुछ डिजिटल प्लेटफॉर्म हमारे बच्चों के दिमाग को खराब कर रहे हैं और सोशल मीडिया मंच साफ शब्दों में कहें तो गंदगी का अड्डा बन गये हैं। मुख्य विपक्षी दल रिपब्लिकन पीपुल्स पार्टी (सीएचपी) ने इस प्रस्ताव की आलोचना करते हुए कहा है कि बच्चों की सुरक्षा प्रतिबंधों से नहीं बल्कि अधिकार-आधारित नीतियों से सुनिश्चित की जानी चाहिए।
कानून के तहत यूट्यूब, टिकटॉक, फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया मंच 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को अकाउंट बनाने से रोकेंगे और अभिभावक नियंत्रण प्रणाली लागू करेंगे। इसके अलावा, आॅनलाइन गेम कंपनियों को भी तुर्किये में एक प्रतिनिधि नियुक्त करना होगा ताकि वे नये नियमों का पालन सुनिश्चित कर सकें। उल्लंघन की स्थिति में इंटरनेट बैंडविड्थ में कमी और जुमार्ने जैसे दंड का प्रावधान है। तुर्किये सरकार पर हाल में आॅनलाइन मंचों पर प्रतिबंध लगाने के आरोप लगते रहे हैं, खासकर जब ये प्लेटफॉर्म असहमति व्यक्त करने का माध्यम बने हैं।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। जापान के उत्तरी इलाके में एक बार फिर विनाशकारी भूकंप ने सभी को डरा दिया है। जिस कारण सुनामी का खतरा भी मंडरा रहा है। सोमवार दोपहर करीब 4:53 बजे (भारतीय समयानुसार दोपहर लगभग 1:23 बजे) सानरिकु तट के पास समुद्र के अंदर शक्तिशाली भूकंप के झटके महसूस किये गये। भूकंप की तीव्रता इतनी अधिक थी कि जापान मौसम विज्ञान एजेंसी ने तुरंत तटीय क्षेत्रों के लिए सुनामी की चेतावनी जारी कर दी है।
शुरूआती आंकड़ों के मुताबिक इस भूकंप की तीव्रता 7.4 दर्ज की गई है। भूकंप का केंद्र समुद्र तल से करीब 10 किलोमीटर (6 मील) की गहराई पर था। कम गहराई पर केंद्र होने के कारण भूकंप के झटके काफी तेज थे और इससे समुद्र की लहरों में हलचल पैदा होने का खतरा बढ़ गया है।
जापान के सार्वजनिक टेलीविजन एनएच ने अलर्ट जारी करते हुए कहा है कि उत्तरी जापान के तटीय इलाकों में 3 मीटर (लगभग 10 फीट) तक ऊंची सुनामी की लहरें जल्द ही टकरा सकती हैं। प्रशासन ने तटीय क्षेत्रों, बंदरगाहों और समुद्री तटों के पास रहने वाले लोगों को तुरंत घर खाली कर सुरक्षित और ऊंचाई वाले स्थानों पर जाने का निर्देश दिया है। चेतावनी में कहा गया है कि सुनामी की पहली लहर के बाद और भी कई लहरें आ सकती हैं जो पहली लहर से ज्यादा खतरनाक हो सकती हैं।
भूकंप के बाद जापानी प्रशासन पूरी तरह अलर्ट मोड पर है। सानरिकु तट के पास स्थित रिहायशी इलाकों और औद्योगिक इकाइयों में नुकसान का आकलन किया जा रहा है। फिलहाल किसी बड़े जान-माल के नुकसान की तत्काल खबर नहीं है लेकिन सुनामी के खतरे को देखते हुए अगले कुछ घंटे बेहद संवेदनशील बताए जा रहे हैं।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ अब तक का सबसे आक्रामक रुख अख्तियार किया है। उन्होंने ईरान को सैन्य तबाही की चेतावनी दी है। ट्रंप ने कहा कि अगर ईरान ने मौजूदा समझौते की शर्तों को स्वीकार नहीं किया, तो अमेरिका उसके तमाम पावर प्लांट और पुलों को जमींदोज कर देगा।
ट्रंप ने दावा किया कि ईरान ने होर्मुज में गोलीबारी कर मौजूदा सीजफायर समझौते की धज्जियां उड़ा दी हैं। उन्होंने बताया कि ईरानी हमलों का निशाना फ्रांस और ब्रिटेन के जहाज बने हैं। ट्रंप के मुताबिक, ईरान का यह कदम उसकी हताशा को दर्शाता है।
इस तनाव के बीच ट्रंप ने कूटनीतिक रास्ते का आखिरी विकल्प भी खुला रखा है। अमेरिकी प्रतिनिधियों का एक दल कल शाम पाकिस्तान की राजधानी इस्लाबाद पहुंच रहा है। वहां ईरान के साथ निर्णायक बातचीत होनी है। ट्रंप ने कहा कि यह ईरान के पास आखिरी मौका है।
ईरान की ओर से होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने की घोषणा पर तंज कसते हुए ट्रंप ने कहा कि अमेरिकी नाकेबंदी ने उसे पहले ही बंद कर रखा है। इससे ईरान को रोजाना 50 करोड़ डॉलर का भारी नुकसान हो रहा है। उन्होंने कहा कि दुनिया भर के जहाज अब तेल और माल लोडिंग के लिए अमेरिका के टेक्सास, लुइसियाना और अलास्का के बंदरगाहों का रुख कर रहे हैं, जिससे अमेरिका को कोई नुकसान नहीं है।
ट्रंप ने अपने चिर-परिचित अंदाज में कहा कि पिछले 47 वर्षों से जो काम किसी राष्ट्रपति ने नहीं किया, उसे अब वो अंजाम देंगे। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर डील नहीं हुई, तो ईरान के बुनियादी ढांचे को पूरी तरह तबाह कर दिया जाएगा।
इस बीच समाचार एजेंसी तसनीम की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, तेहरान ने पाकिस्तान में होने वाली आगामी राजनयिक वार्ता में अपना प्रतिनिधिमंडल भेजने से साफ इनकार कर दिया है। ईरानी अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि जब तक डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की ओर से ईरान के बंदरगाहों पर लगाई गई नौसैनिक नाकेबंदी प्रभावी रहेगी, तब तक बातचीत की कोई मेज नहीं सजेगी।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच भारत से जुड़ी एक बड़ी घटना सामने आई है। ओमान के पास एक भारतीय-ध्वज वाले कच्चे तेल के टैंकर पर ईरानी नौसेना द्वारा फायरिंग किये जाने की खबर है। यह टैंकर करीब 20 लाख बैरल इराकी तेल लेकर जा रहा था। घटना के बाद क्षेत्र में स्थिति और तनावपूर्ण हो गयी है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह विशाल तेल टैंकर होर्मुज के पास से गुजर रहा था तभी उस पर फायरिंग की गयी। हालांकि अभी तक किसी बड़े नुकसान या हताहत की जानकारी सामने नहीं आयी है। यह घटना ऐसे समय में हुई है जब पहले से ही अमेरिका और ईरान के बीच टकराव जारी है और होर्मुज क्षेत्र अत्यधिक संवेदनशील बना हुआ है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, इस घटना के बाद दो भारतीय-ध्वज वाले जहाजों को सुरक्षा कारणों से वापस लौटना पड़ा। यह कदम इसलिए उठाया गया ताकि किसी भी संभावित खतरे से बचा जा सके। इससे साफ है कि समुद्री मार्ग पर स्थिति सामान्य नहीं है और जहाजों की आवाजाही प्रभावित हो रही है।
घटना के बाद भारत सरकार ने तुरंत कूटनीतिक स्तर पर कार्रवाई शुरू कर दी है। जानकारी के मुताबिक, विदेश मंत्रालय ने ईरान के राजदूत को तलब कर इस पूरे मामले पर कड़ा विरोध दर्ज कराया है। सरकार जल्द ही इस पर आधिकारिक बयान जारी कर सकती है।
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। इस क्षेत्र में किसी भी तरह की सैन्य गतिविधि या बाधा का असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव के चलते पहले ही इस क्षेत्र में अनिश्चितता बनी हुई थी, और अब भारतीय जहाज से जुड़ी यह घटना स्थिति को और गंभीर बना रही है।
हाल ही में ईरान की ओर से कहा गया था कि भारतीय जहाजों को सुरक्षित रास्ता दिया जायेगा और इसको लेकर दोनों देशों के बीच संपर्क भी बना हुआ है। इसके बावजूद हुई यह घटना कई सवाल खड़े करती है और समुद्री सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ाती है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण सभी की नजरें इन दिनों समुद्री मार्ग खासकर होर्मुज स्ट्रेट की तरफ टिकी है। लेकिन इस बीच एक और बड़ी खबर सामने आयी है। अंडमान सागर में एक दर्दनाक हादसा हो गया, म्यांमार जा रही शरणार्थियों से भरी एक जहाज अचानक पलट गया। इस नाव में रोहिंग्या रिफ्यूजी और बांग्लादेशी नागरिक सवार थे। शुरूआती जानकारी के मुताबिक, इस घटना में 250 से ज्यादा लोग लापता हैं, जिससे चिंता और बढ़ गयी है।
बांग्लादेश कोस्ट गार्ड के मुताबिक, 9 अप्रैल को समुद्र में बहते हुए नौ लोगों को बचाया गया। इनमें तीन रोहिंग्या और छह बांग्लादेशी नागरिक थे। इन्हें बांग्लादेश के जहाज एमटी मेघना प्राइड ने सुरक्षित निकाला।
अधिकारियों ने बताया कि बचाये गये लोगों में आठ पुरुष और एक महिला शामिल थे। बाद में इन्हें टेकनाफ लाकर पुलिस को सौंप दिया गया। यह रेस्क्यू जहाज के क्रू ने खुद किया, क्योंकि हादसा बांग्लादेश के समुद्री इलाके के बाहर हुआ था।
प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, जहाज में ज्यादा भीड़ और खराब मौसम इस हादसे की वजह हो सकते हैं। वहीं, यूएनएचसीआर और आईओएम ने बताया कि यह ट्रॉलर कॉक्स बाजार के टेकनाफ से बड़ी संख्या में लोगों को लेकर मलेशिया जा रहा था।
एजेंसियों का कहना है कि नाव में ज्यादा भीड़ थी और समुद्र में तेज हवाएं व खराब मौसम था। इसी वजह से नाव का संतुलन बिगड़ गया और वह डूब गयी। अभी तक यह साफ नहीं है कि हादसा ठीक कब हुआ और खोज-बचाव अभियान को लेकर भी कोई पक्की जानकारी नहीं दी गयी है।
संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों ने बताया कि कई लोग विदेश में नौकरी और बेहतर जिंदगी के झूठे वादों में फंसकर ऐसे खतरनाक सफर पर निकल पड़ते हैं, जिससे उनकी जान जोखिम में पड़ जाती है।
बता दें दुनिया भर से मदद की मांग भी तेज हो गयी है। यूएनएचसीआर और आईओएम ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से रोहिंग्या शरणार्थियों के लिए ज्यादा फंड और सहायता देने की अपील की है।
बांग्लादेश में इस समय 10 लाख से ज्यादा रोहिंग्या रह रहे हैं, जो म्यांमार से भागकर आये हैं। एजेंसियों ने कहा कि जब तक इन लोगों के लिए स्थायी समाधान और बेहतर हालात नहीं बनते, तब तक ऐसे जोखिम भरे सफर जारी रहेंगे और हादसे होते रहेंगे।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका द्वारा ब्लैकलिस्ट एक विशाल क्रूड आयल टैंकर अमेरिकी नाकेबंदी के बावजूद स्ट्रेट आफ हॉर्मुज को पार कर सुरक्षित ईरान के तट तक पहुंच गया। ईरान के इस दावे ने अमेरिका की समुद्री रणनीति पर सवाल खड़े कर दिये हैं।
भारत में मुंबई स्थित ईरानी महावाणिज्य दूतावास के अनुसायह वेरी लार्ज कू्रड कैरियर अपनी पूरी यात्रा के दौरान ट्रैकिंग सिस्टम चालू रखे हुए था। ईरानी दूतावास ने सोशल मीडिया पर जानकारी देते हुए कहा कि जहाज ने अपनी लोकेशन छिपाने की कोई कोशिश नहीं की और खुलेआम अंतर्राष्ट्रीय जलक्षेत्र से होकर गुजरा।
दूतावास के मुताबिक, यह सुपरटैंकर लगभग 20 लाख बैरल तक कच्चा तेल ले जाने में सक्षम है। इसके बावजूद अमेरिकी नाकेबंदी इसे रोकने में असफल रही और जहाज बिना किसी नुकसान के अपने गंतव्य तक पहुंच गया।
इससे पहले अमेरिका ने दावा किया था कि उसने होर्मुज जलडमरूमध्य में कड़ी नाकेबंदी लागू कर दी है। इसके तहत ईरान के बंदरगाहों से आने-जाने वाले जहाजों को रोका जायेगा। इन जहाजों में वो जहाज भी शामिल हैं जिन्होंने ईरान को किसी प्रकार का शुल्क (टोल) दिया है।
अमेरिका का कहना था कि इस नाकेबंदी के जरिए वह ईरान की अर्थव्यवस्था पर दबाव बनाना चाहता है, क्योंकि ईरान का लगभग 90% अंतरराष्ट्रीय व्यापार समुद्री मार्गों से होता है। ईरान के इस दावे से यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या अमेरिकी नाकेबंदी पूरी तरह प्रभावी है या उसमें खामियां हैं। अगर एक ब्लैकलिस्टेड जहाज खुले तौर पर इस मार्ग से गुजर सकता है, तो यह अमेरिका की रणनीतिक पकड़ पर बड़ा सवाल है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारत ने मार्च 2026 में रूसी कच्चे तेल की बंपर खरीद की है। इस खरीद में तीन गुना से अधिक का उछाल आया है। यह बढ़कर 5.3 अरब यूरो (लगभग 58,229 करोड़ रुपये) रही है। इस बढ़ोतरी के पीछे इंपोर्ट वॉल्यूम यानी आयात मात्रा का दोगुना होना और ग्लोबल तेल कीमतों में उछाल है।
इसने भारत के ऊर्जा आयात के समीकरण दोबारा बदल दिये हैं। यूरोपीय शोध संस्था सेंटर फॉर रिसर्च आॅन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) की रिपोर्ट के अनुसार, फरवरी में खरीद में गिरावट के बाद मार्च में भारत ने रूस से तेल की खरीद फिर तेज कर दी।
फरवरी में भारत रूस से ऊर्जा आयात करने वाला तीसरा सबसे बड़ा देश था। कुल आयात 1.8 अरब यूरो रहा था। उस समय कच्चे तेल की हिस्सेदारी 81 फीसदी (1.4 अरब यूरो) थी। कोयले की हिस्सेदारी 22.3 करोड़ यूरो और पेट्रोलियम उत्पादों की 12.1 करोड़ यूरो थी। रिपोर्ट के अनुसार, मार्च में भारत के कुल कच्चे तेल आयात में चार फीसदी की कमी दर्ज की गयी। लेकिन, रूस से आयात दोगुना हो गया।
रिपोर्ट में कहा गया कि मार्च में सबसे बड़ा बदलाव सरकारी रिफाइनरियों के आयात में देखा गया। इसमें मासिक आधार पर 148 फीसदी की बढ़ोतरी हुई।
यह आयात मार्च, 2025 की तुलना में 72 फीसदी अधिक रहा। इसका कारण वायदा बाजार में रूसी तेल की अधिक उपलब्धता बताया गया है।
मैंगलुरु और विशाखापत्तनम स्थित सरकारी रिफाइनरियों ने नवंबर, 2025 के अंत में रूस से आयात रोक दिया था। लेकिन, मार्च, 2026 में फिर से खरीद शुरू कर दी। फरवरी में भारत चीन और तुर्किये के बाद तीसरा सबसे बड़ा आयातक था।
रिपोर्ट के अनुसार, फरवरी में रूस से भारत के कच्चे तेल आयात में 19 फीसदी की कमी आयी थी। जबकि कुल आयात में नौ फीसदी की गिरावट दर्ज की गयी थी। इसके बावजूद रूस फरवरी में भी भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल सप्लायर बना रहा। कुल आयात में उसकी हिस्सेदारी 20 फीसदी थी।
सीआरईए ने कहा कि रूस अपने तेल निर्यात के लिए एशियाई बाजारों, खासकर भारत और चीन, पर बहुत ज्यादा निर्भर है। 2026 की पहली तिमाही में रूस के कुल कच्चे तेल निर्यात का 90 फीसदी हिस्सा इन दोनों देशों को गया।
यूरोपीय संघ (ईयू) की ओर से 21 जनवरी, 2026 से रूसी कच्चे तेल से बने उत्पादों के आयात पर प्रतिबंध के बावजूद मार्च में ऐसे 14 जहाजों ने यूरोपीय बंदरगाहों पर तेल उत्पाद उतारे, जो रूसी कच्चे तेल का इस्तेमाल करने वाली रिफाइनरियों से जुड़े थे। इनमें से नौ खेप तुर्किये की रिफाइनरियों से, चार भारत से और एक जॉर्जिया से भेजी गयी थीं।
कुछ जहाजों ने कई यूरोपीय बंदरगाहों पर तेल उत्पाद उतारे। फ्रांस मार्च में इन खेप का सबसे बड़ा रिसीवर रहा, जहां चार खेप उतारी गयींं। इसके बाद साइप्रस (तीन खेप) का स्थान रहा। इसके अलावा बेल्जियम, बुल्गारिया, इटली और नीदरलैंड ने भी दो-दो खेप रिसीव कीं।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। ईरान में पिछले 45 दिनों से इंटरनेट सेवाएं लगभग पूरी तरह बंद हैं। साइबर निगरानी संस्था नेटब्लॉक्स के अनुसार, देश में नियर ब्लैआउट की स्थिति है और अंतरराष्ट्रीय कनेक्टिविटी 1,056 घंटे से अधिक समय से बाधित है। यह इंटरनेट बंदी उस समय शुरू हुई थी जब यूनाईटेट स्टेट्स और इजराइल ने ईरान पर सैन्य हमले किये थे। इसके बाद से ईरानी सरकार ने बाहरी डिजिटल संपर्क पर लगभग पूरी तरह रोक लगा दी है।
इससे पहले भी जनवरी में सरकार ने देशभर में विरोध प्रदर्शनों के दौरान कई हफ्तों तक इंटरनेट बंद किया था। मौजूदा ब्लैकआउट ने आम नागरिकों को दुनिया से लगभग काट दिया है। इंटरनेट संकट के साथ-साथ क्षेत्रीय तनाव भी बढ़ता जा रहा है। ईरान ने यूनाईटेट स्टेट्स की उस योजना का कड़ा विरोध किया है, जिसमें उसके बंदरगाहों पर नाकेबंदी की बात कही गयी है।
ईरानी सेना ने चेतावनी दी है कि पर्सियन गल्फ और गल्फ आफ ओमान में सुरक्षा या तो सबके लिए होगी या किसी के लिए नहीं। अगर ईरान के बंदरगाह असुरक्षित हुए, तो क्षेत्र के अन्य बंदरगाह भी सुरक्षित नहीं रहेंगे। ईरान ने स्ट्रेट आफ हॉर्मूज पर नियंत्रण बनाये रखने की बात कही है। उसने कहा कि दुश्मन देशों से जुड़े जहाजों को गुजरने नहीं दिया जायेगा व अन्य जहाजों को नियमों के अनुसार अनुमति दी जायेगी।
ईरान ने अमेरिका के कदम को गैरकानूनी बताते हुए इसे समुद्री डकैती जैसा बताया है। वहीं यूनाईटेड स्टेट्स सेंट्रल कमांड ने घोषणा की है कि वह 13 अप्रैल से ईरान के बंदरगाहों पर आने-जाने वाले जहाजों पर नाकेबंदी लागू करेगा।
हालांकि, उसने कहा है कि अन्य देशों के जहाजों की आवाजाही को रोका नहीं जायेगा। ईरान इस समय दोहरे संकट से जूझ रहा है। एक तरफ डिजिटल ब्लैकआउट और दूसरी तरफ बढ़ता सैन्य व समुद्री तनाव। यह स्थिति न केवल क्षेत्रीय बल्कि वैश्विक स्तर पर भी बड़ा प्रभाव डाल सकती है।
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