टीम एबीएन, रांची। आज मुनिश्री 108 प्रमाण सागर जी महाराज ने अपने मंगल प्रवचन में कहा कि आत्मा की पहचान ही मानव जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य है। हमारे जीवन को आगे बढ़ाने के लिए हमें दोषों और दुर्बलताओं से मुक्त होना जरूरी है।
प्रतिदिन किसी न किसी ऐसी दुर्बलता की चर्चा आप सबके बीच हो रही है जो हमारे व्यक्तित्व को कमजोर बनाती है और जिससे हमारे जीवन का आंतरिक और बाह्य विकास अवरूद्ध होता है बात प की है और प पर ध्यान जाते-जाते मेरे मानस में एक शब्द गूंज रहा है वह है पक्षपात, यह पक्षपात बड़ा प्रसिद्ध शब्द है और हर किसी के जीवन में किसी न किसी रुप में इसका प्रभाव देखने में आता है।
दरअसल, पक्षपात है क्या, किसी व्यक्ति के प्रति विशेष राग आशक्ति या मोह वश उसके प्रति उचित अनुचित का ध्यान रखे बिना विशेष झुकाव होना पक्षपात है उसकी योग्यता और क्षमता का अंदाज लगाये बिना किसी के साथ विशेष लगाव या झुकाव रखना पक्षपात है, पक्षपात मतलब भेदभावपूर्ण नीती। यह पक्षपात जहां भी हो व्यक्ति को अंदर से तोड़ती जब तक पक्षपात होगा। भेदभाव बना रहेगा।
प्रेम सौजन्य और सौहार्द्र को टिका पाना बहुत कठिन है संत कहते हैं घर परिवार हो या लोक व्यवहार पक्षपात की वृत्ति से ऊपर उठकर चलो क्योंकी यह तुम्हारी प्रगति में बाधक है। चार स्तर पर जैसे पक्षपात करना, पक्षपात होना, पक्षपात दिखाना और पक्षपात से मुक्त निष्पक्ष रहना। कई बार ऐसा देखने में आता है कि लोग एक दूसरे का पक्षपात करते हैं घर परिवार में ऐसा ज्यादा देखने में आता है।
किसी एक के प्रति विशेष झुकाव और उसके प्रति होने वाला विशेष झुकाव औरों के लिए अलगाव उत्पन्न कर देता है उसे लगता है मैं उपेक्षित हूं तिरस्कृत हूं यह गड़बड़ है घर में बहू वर्षों से खट रही है मेहनत कर रही है उसके लिए किसी प्रकार की प्रशंसा के दो शब्द नहीं उसकी खुशी की कोई परवाह नहीं कहीं भेजने के लिए कोई बात नहीं परन्तु एक नयी थोड़ी पढ़ी-लिखी बहू आयी बड़े घर से आई।
उसी दिन से उसकी आरती उतारी जाती हैं पूर्ण सुख सुविधाओं का ध्यान रखा जाता है इसी से फूंट पैदा होती है एक के प्रति उपेक्षापूर्ण भाव और दूसरे के प्रति अपेक्षा का भाव इस स्थिति में मन टूटने लगता है। पक्षपात ठीक नहीं है यह जीवन में बहुत बड़ा बाधक है। जीवन में संतुलन बना कर चलने से प्रगति निरन्तर होगी और उसको गौण करके चलने से मार्ग वही अवरुद्ध होगा।
मनुष्य जब बाहरी आकर्षणों से हटकर अंतर्मुख होता है, तभी उसके भीतर अध्यात्म का सच्चा प्रकाश पैदा होता है। मुनिश्री ने बताया कि क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार ये चार बंदिशें आत्मा को जकड़कर रखती हैं, और साधना का अर्थ है इन बंधनों से मुक्ति। उन्होंने कहा कि पंचकल्याणक का हर दिवस आत्म जागरण की याद दिलाता है।
जब मन स्थिर हो जाता है और विचार पवित्र हो जाते हैं, तब जीवन सहज रूप से शांति और संयम की ओर चलता है। प्रवचन सभा मुनिश्री के बिहार के दौरान भगवान महावीर मनिपाल हॉस्पिटल स्थित महावीर भवन में हुई। रांची से तीर्थराज श्री सम्मेद शिखर जी के लिए मुनि श्री का मंगल विहार जारी है। आज का रात्रि विश्राम पंचरतन विहार में होगा एवं 8 अप्रेल की आहार चर्या कूटे में रामपाल गंगवाल के बगीचे में होगी।
मुनिसंघ का आगामी 12 अप्रैल को गोमिया में मुनि संघ का मंगल प्रवेश संभावित है, जबकि 15 अप्रैल को मुनिसंघ की भव्य मंगल अगवानी पारसनाथ में होगी। मुनिश्री का मंगल विहार प्रात: 07 बजे बिरसा मुंडा फन पार्क से हुआ। बिहार के दौरान रांची समाज से, कुनकुरी समाज से, रामगढ़ से, शिखर जी से आए भक्तगण शामिल हुए। यह जानकारी मीडिया प्रभारी राकेश काशलीवाल ने दी।
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