रांची विवि में जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं के लिए बनी अलग फैकल्टी

 

रांची। रांची विश्वविद्यालय में जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के विकास के लिए अलग संकाय बनाने बनाने का फैसला लिया गया है। अब सभी नौ भाषाओं का स्वतंत्र विभाग फैकल्टी ऑफ ट्राइबल एंड रीजनल लैंग्वेज के अंतर्गत संचालित होगा। इससे संबंधित इससे संबंधित अधिसूचना भी जारी कर दी गईं है। डॉ त्रिवेणी नाथ साहू इसके पहले संकायाध्यक्ष बनाए गए हैं। उन्हें डीन टीआरएल का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है। साथ ही अलग विभागों के संचालन के लिए रांची वीमेंस कॉलेज की तीन और बीएनजे कॉलेज सिसई की एक सहायक प्राध्यापक का स्थानांतरण विश्वविद्यालय विभाग में किया गया है। नया संकाय बनाने का फैसला विश्वविद्यालय की एकेडेमिक काउंसिल और सिंडिकेट के निर्णय के आलोक में किया गया है। खड़िया, खोरठा, कुरमाली और मुंडारी विषयों में शिक्षकों का स्थानांतरण अगल अलग विभाग खोलने के लिए किया गया है। कुरुख और नागपुरी विषय में पहले से ही शिक्षक स्नातकोत्तर विभाग में है।हो और संताली भाषा में नहीं है कोई शिक्षक : नोटिफिकेशन के अनुसार, दो भाषाओं- हो और संताली में कोई शिक्षक नहीं हैं। डॉ हरि उरांव कुड़ुख के अलावा हो और संताली के भी विभागाध्यक्ष होंगे। डॉ उमेश नंद तिवारी नागपुरी के विभागाध्यक्ष बनाए गए हैं। वीमेंस कॉलेज की खड़िया की सहायक प्राध्यापक डॉ मेरी डी सोरेन का तबादला विश्वविद्यालय खड़िया विभाग में किया गया है, जबकि वीमेंस कॉलेज के खोरठा विभाग की सहायक प्राध्यापक डॉ कुमारी शशि और कुरमाली विभाग की सहायक प्राध्यापक गीता सिंह का विश्वविद्यालय विभाग में तबादला किया गया है। वहीं, बीएनजे सिसई कॉलेज के कुरमाली विभाग की नलय राय भी विश्वविद्यालय विभाग में स्थानांतरित की गई हैं।

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