रूसी तेल खरीद मामले में भारत बना नंबर-2

 

  • फिर हो गया उलटफेर, रूसी तेल की बंपर खरीद, भारत उछलकर दूसरे नंबर पर पहुंचा 
  • भारत की ओर से रूसी तेल आयात में जोरदार इजाफा हुआ है। खरीद की रकम बढ़कर 5.3 अरब यूरो यानी करीब 58,229 करोड़ रुपये हो गयी। इस बढ़त के पीछे इंपोर्ट वॉल्यूम का दोगुना होना अहम है। रूसी तेल पर लगे प्रतिबंध हटने के बाद भारत ने खरीद तेज की है। 

एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारत ने मार्च 2026 में रूसी कच्चे तेल की बंपर खरीद की है। इस खरीद में तीन गुना से अधिक का उछाल आया है। यह बढ़कर 5.3 अरब यूरो (लगभग 58,229 करोड़ रुपये) रही है। इस बढ़ोतरी के पीछे इंपोर्ट वॉल्यूम यानी आयात मात्रा का दोगुना होना और ग्लोबल तेल कीमतों में उछाल है। 

इसने भारत के ऊर्जा आयात के समीकरण दोबारा बदल दिये हैं। यूरोपीय शोध संस्था सेंटर फॉर रिसर्च आॅन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) की रिपोर्ट के अनुसार, फरवरी में खरीद में गिरावट के बाद मार्च में भारत ने रूस से तेल की खरीद फिर तेज कर दी। 

भारत ने कैसे किया उलटफेर? 

  • रिपोर्ट के मुताबिक, मार्च में भारत रूस से जीवाश्म ईंधन खरीदने वाला दूसरा सबसे बड़ा देश रहा। 
  • इस दौरान भारत ने कुल 5.8 अरब यूरो के रूसी ईंधन उत्पादों का इंपोर्ट किया। 
  • इसमें कच्चे तेल (क्रूड) की हिस्सेदारी 91 फीसदी (5.3 अरब यूरो) रही। 
  • बाकी आयात में कोयला (33.7 करोड़ यूरो) और पेट्रोलियम उत्पाद (17.85 करोड़ यूरो) शामिल रहे। 

फरवरी में तीसरे नंबर पर था भारत 

फरवरी में भारत रूस से ऊर्जा आयात करने वाला तीसरा सबसे बड़ा देश था। कुल आयात 1.8 अरब यूरो रहा था। उस समय कच्चे तेल की हिस्सेदारी 81 फीसदी (1.4 अरब यूरो) थी। कोयले की हिस्सेदारी 22.3 करोड़ यूरो और पेट्रोलियम उत्पादों की 12.1 करोड़ यूरो थी। रिपोर्ट के अनुसार, मार्च में भारत के कुल कच्चे तेल आयात में चार फीसदी की कमी दर्ज की गयी। लेकिन, रूस से आयात दोगुना हो गया। 

रूसी तेल आयात बढ़ने के पीछे फैक्टर 

  • अमेरिका की ओर से रूसी तेल पर एक महीने की प्रतिबंध छूट दिए जाने के बाद यह बढ़ोतरी हुई। 
  • यह छूट पहले से समुद्र में मौजूद खेपों और पहले प्रतिबंधित जहाजों से हो रही सप्लाई पर लागू थी। 
  • इसका मकसद ईरान के साथ तनाव के बाद बढ़ी कीमतों को कंट्रोल करना था। 
  • इस छूट के बाद सरकारी रिफाइनरियों ने फिर से आयात शुरू कर दिया। उन्होंने पहले रूस से तेल खरीद रोक दी थी। 

सबसे बड़ा बदलाव क्या हुआ? 

रिपोर्ट में कहा गया कि मार्च में सबसे बड़ा बदलाव सरकारी रिफाइनरियों के आयात में देखा गया। इसमें मासिक आधार पर 148 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। 
यह आयात मार्च, 2025 की तुलना में 72 फीसदी अधिक रहा। इसका कारण वायदा बाजार में रूसी तेल की अधिक उपलब्धता बताया गया है। 

मैंगलुरु और विशाखापत्तनम स्थित सरकारी रिफाइनरियों ने नवंबर, 2025 के अंत में रूस से आयात रोक दिया था। लेकिन, मार्च, 2026 में फिर से खरीद शुरू कर दी। फरवरी में भारत चीन और तुर्किये के बाद तीसरा सबसे बड़ा आयातक था। 

कभी नहीं रुकी रूसी तेल सप्लाई 

रिपोर्ट के अनुसार, फरवरी में रूस से भारत के कच्चे तेल आयात में 19 फीसदी की कमी आयी थी। जबकि कुल आयात में नौ फीसदी की गिरावट दर्ज की गयी थी। इसके बावजूद रूस फरवरी में भी भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल सप्लायर बना रहा। कुल आयात में उसकी हिस्सेदारी 20 फीसदी थी। 

सीआरईए ने कहा कि रूस अपने तेल निर्यात के लिए एशियाई बाजारों, खासकर भारत और चीन, पर बहुत ज्यादा निर्भर है। 2026 की पहली तिमाही में रूस के कुल कच्चे तेल निर्यात का 90 फीसदी हिस्सा इन दोनों देशों को गया। 

यूरोप भी गए रूसी क्रूड से बने प्रोडक्ट 

यूरोपीय संघ (ईयू) की ओर से 21 जनवरी, 2026 से रूसी कच्चे तेल से बने उत्पादों के आयात पर प्रतिबंध के बावजूद मार्च में ऐसे 14 जहाजों ने यूरोपीय बंदरगाहों पर तेल उत्पाद उतारे, जो रूसी कच्चे तेल का इस्तेमाल करने वाली रिफाइनरियों से जुड़े थे। इनमें से नौ खेप तुर्किये की रिफाइनरियों से, चार भारत से और एक जॉर्जिया से भेजी गयी थीं।

कुछ जहाजों ने कई यूरोपीय बंदरगाहों पर तेल उत्पाद उतारे। फ्रांस मार्च में इन खेप का सबसे बड़ा रिसीवर रहा, जहां चार खेप उतारी गयींं। इसके बाद साइप्रस (तीन खेप) का स्थान रहा। इसके अलावा बेल्जियम, बुल्गारिया, इटली और नीदरलैंड ने भी दो-दो खेप रिसीव कीं।

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