एबीएन स्पोर्ट्स डेस्क। सेमीफाइनल जैसे बड़े मुकाबले में अंपायरिंग का गिरता स्तर वाकई चिंता का विषय है, जैसा कि आज डेरिल मिचेल के कैच के दौरान देखने को मिला। जब खिलाड़ी खुद संशय में हो और रिव्यू का इशारा कर रहा हो, तो इसका मतलब साफ है कि कैच की शुचिता को लेकर वह खुद आश्वस्त नहीं था।
टीवी अंपायर ने केवल दो एंगल से देखकर फैसला सुना दिया, जबकि कई बार फ्रेम दर फ्रेम देखने पर ऐसा लग रहा था कि गेंद जमीन को छू चुकी थी। अगर आधुनिक तकनीक के बावजूद ऐसे गलत निर्णय दिए जाते हैं, तो यह न केवल मैच का रुख बदलते हैं बल्कि खेल की भावना को भी ठेस पहुँचाते हैं।
इस वर्ल्ड कप में यह पहली बार नहीं है जब अंपायरिंग पर सवाल उठे हों; इससे पहले श्रीलंका और पाकिस्तान के मैच में भी खराब फैसलों ने श्रीलंका को टूर्नामेंट से बाहर होने पर मजबूर कर दिया था। इंटरनेशनल क्रिकेट में जहाँ करोड़ों फैंस की भावनाएं जुड़ी होती हैं, वहां थर्ड अंपायर का इतनी जल्दबाजी में निर्णय लेना समझ से परे है।
नियम के अनुसार अगर गेंद जमीन से सट रही है और उंगलियां उसके नीचे पूरी तरह नहीं हैं, तो बल्लेबाज को बेनिफिट ऑफ डाउट मिलना चाहिए था। अंपायरों की इन गलतियों का हर्जाना अक्सर उन टीमों को भुगतना पड़ता है जो सालों तक इस पल के लिए मेहनत करती हैं।
आईसीसी को अंपायरिंग के स्तर और जवाबदेही पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है, क्योंकि ऐसे बड़े मंच पर सॉफ्ट सिग्नल और अधूरे तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर फैसले देना खेल को बर्बाद कर सकता है। अगर अंपायर गलत साबित होते हैं, तो उन पर भी सख्त कार्रवाई या जुर्माना होना चाहिए, ताकि वे भविष्य में अधिक सतर्क रहें।
दक्षिण अफ्रीका और न्यूजीलैंड के इस अहम मैच में एक गलत फैसला पूरे टूर्नामेंट के नतीजे को प्रभावित कर सकता है। फैंस की नाराजगी जायज है क्योंकि तकनीक का मकसद गलतियों को सुधारना होना चाहिए, न कि उन्हें बढ़ावा देना।
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