टीम एबीएन, रांची। झारखंड में चल रहे नगर निकाय चुनाव भले ही औपचारिक रूप से दलीय आधार पर नहीं हो रहे हों। लेकिन राजनीति का असर इन चुनावों में साफ नजर आ रहा है। चुनाव चिह्न भले ही पार्टियां नहीं दे रही हैं, पर प्रत्याशियों को समर्थन देकर वे अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही हैं। इसी वजह से इस बार नगर निकाय चुनाव भी दलबदल से अछूता नहीं रहा है।
राज्य के अलग-अलग राजनीतिक दलों ने नगर निगमों में महापौर और नगर परिषद व नगर पंचायतों में अध्यक्ष पद को लेकर खास रणनीति बनायी। कई दलों ने जिलाध्यक्षों से संभावित उम्मीदवारों के नाम मंगवाये और आपसी मंथन के बाद समर्थन देने का फैसला किया। समर्थन पाने की होड़ में कई नेताओं ने पार्टी बदलने से भी परहेज नहीं किया।
धनबाद नगर निगम इसका बड़ा उदाहरण है। यहां के पूर्व मेयर और बीजेपी नेता चंद्रशेखर अग्रवाल ने नामांकन के पहले ही दिन पर्चा भर दिया था, जबकि बीजेपी ने उस समय किसी को समर्थन देने का फैसला नहीं किया था। बाद में पार्टी ने संजीव अग्रवाल को समर्थन देने की घोषणा कर दी। इसके बाद चंद्रशेखर अग्रवाल ने तुरंत झामुमो की सदस्यता ले ली।
एक अन्य मामले में भाजपा ने झामुमो विधायक दशरथ गगरई के भाई विजय गगरई को पार्टी में शामिल किया और बाद में उन्हें समर्थन भी दिया। इससे राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गयी। रांची नगर निगम में भी स्थिति कुछ ऐसी ही रही। बीजेपी ने महापौर पद के लिए रोशनी खलखो को समर्थन देने का निर्णय लिया। लेकिन इससे पहले ही पार्टी के एसटी मोर्चा के मीडिया प्रभारी और कार्यालय मंत्री राजेंद्र मुंडा अपने समर्थकों के साथ नामांकन दाखिल कर चुके थे।
देवघर नगर निगम में भी उलटफेर देखने को मिला। बीजेपी ने महापौर पद के लिए रीता चौरसिया को समर्थन देने का फैसला किया, जबकि पार्टी के ही नेता बाबा बलियासे ने भी नामांकन भर दिया। पहले चर्चा थी कि पार्टी बाबा बलियासे को समर्थन दे सकती है। इन सभी घटनाओं से साफ है कि दलीय चुनाव न होने के बावजूद नगर निकाय चुनाव पूरी तरह राजनीति से जुड़े हुए हैं। समर्थन, रणनीति और दलबदल ने इन चुनावों को रोचक बना दिया है।
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