एबीएन एडिटोरियल डेस्क। नकली वस्तुओं का व्यापार और बिक्री एक वैश्विक समस्या बनकर उभरी है। खाद्य सुरक्षा मानकों और उनके विनियमों का अनुपालन कंपनियां नहीं कर कायदे-कानूनों को ठेंगा दिखाने लगी हैं। शिकायतकर्ताओं पर कंपनी वाले हमलावर होते हैं। समझने की जरूरत है कि आखिर ऐसा हो क्यों रहा है? दरअसल, इसके पीछे एक खास वजह है।
वजह के किरदार हैं दो धड़े। अव्वल, ठेकेदार और दूसरे कांट्रेक्टर? ठेकेदार के रूप में वह संस्था जो इन पर अंकुश लगाने का नाटक करती है और कांट्रेक्टर सरकारी मशीनरी जो राजस्व के नाम पर मोटा माल वसूल कर अपनी आंखों पर पट्टी बांध लेती हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण दोनों अगर कमर कस लें, तो किसी कंपनी की हिम्मत नही, जो खाद पदर्थों में गड़बड़ी भी कर सकें।
गौरतलब है कि नकली और पायरेटेड ब्रांड की बाढ़ ने भूमिगत व्यापार बनाकर वैश्विक अर्थव्यवस्था को पूरी तरह प्रभावित किया हुआ है। डुप्लीकेट मसालों का मसला अगर सार्वजनिक नहीं हुआ होता, तो ये मुद्दा चचार्ओं में आता ही नहीं? ऐसा प्रतीत होता है जैसे भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण पूरी तरह से निष्क्रिय हो गया है। समय-समय पर होने वाली छापेमारी, मॉनेटरिंग, धरपकड़ और शिकायतों की तत्काल प्रभाव से जांच करवाना, अब नहीं होता। एक बार लाइसेंस वितरण करने के बाद फाइल को धूल चाटने के अलमारी में दबा दिया जाता है।
जब रिन्यूवल का समय आता है तभी कुंभकर्णी नींद खुलती है, क्योंकि उस वक्त फिर से फीस लेनी होती है। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण और कंपनियों के बीच सीधी सांठगांठ रहती है। शिकायतें ऊपर तक नहीं पहुंची, बीच में ही मैनेज कर ली जाती है। ऐसी स्थिति में कंपनियां लोगों के जीवन से खिलवाड़ नहीं करेंगी तो क्या करेंगी?
प्राधिकरण और कंपनियों के बीच दोस्ती के चलते ही मैगी खाने से बच्चे बीमार पड़े, मसालों से पेट खराब हुआ, कोल्ड ड्रिंक पीने से पेट की आते सूज गयी जैसी खबरें मीडिया में दिनोंदिन बढ़ रही हैं। कंपनियां जबसे बेलमाग हुई हैं तभी से खाद्य पदार्थों में नक्कालों ने बिना डरे कब्जा कर लिया है। नकली प्लास्टिक चावल, गधे-घोड़े की लीद से जीरा बनाना अब आम बात है।
दरअसल, इस तरह की खबरें लोगों को तभी पता चली हैं, जब ये गोरखधंधे कहीं न कहीं पकड़े गये। मेरठ में पिछले साल नकली जीरा बनाने वाला कारखाना पकड़ा गया था। दिल्ली के बुराड़ी में भी ऐसा ही एक कारखाना पुलिस ने पकड़ा था। जाली सामानों के सबसे हानिकारक रूपों में नकली दवाइयां प्रमुख हैं, जिनकी बिक्री अकेले एशिया से दक्षिण-पूर्व एशिया और अफ्रीका तक लगभग 1.6 बिलियन डॉलर प्रति वर्ष है।
दवाओं में मलेरिया की दवा में सबसे ज्यादा फर्जीवाड़ा होता है। मलेरिया की एक तिहाई दवाएं नकली होती है। 2008 में विश्व स्तर पर पकड़ी गयी लगभग दो-तिहाई नकली दवाइयों को पूर्वी एशिया में भेजने का मामला भी खूब गर्माया था। अब कंपनियां नकली माल के अलावा धड़ल्ले से उत्पादों की कीमतें भी बढ़ाती हैं क्योंकि कंपनियां संगठित आपराधिक गतिविधियों का मुकाबला करने के लिए सुरक्षा प्रणालियां बढ़ाती हैं और अनुसंधान और विकास में अधिक निवेश करती हैं। कुल मिलाकर हर परिस्थितियों से वो निपटना जान चुकी हैं। ऐसे में आमजन को ही सतर्क होना होगा, ब्रांडों की सत्यता-वास्तविकता खुद से परखनी होगी। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
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