एबीएन एडिटोरियल डेस्क। कहते हैं प्रतिभा कभी छिपाये नहीं छिपती है। महान पुरूषों के सद्गुण मृग में बसी कस्तूरी के समान होते हैं, जिसकी सुगंध सबको अपनी ओर आकर्षित कर लेती है। ऐसे ही विभूतियों में शुमार हैं युग पुरूष साहित्यकार डॉ फादर कामिल बुल्के। जिनकी सरलता, सहजता, बुद्धिमता, सादगी, तप, त्याग, दूरदर्शिता एवं हिन्दी भाषा के प्रति असीम लगाव को केवल भारत में ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व में सराहा गया है।
परहित सरिस धरम नहिं, भाई।
पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥
बेल्जियम के फ्लैंडर्स प्रांत रम्सकैपेले गांव के रहने वाले फ्लेमिश भाषी डॉ कामिल बुल्के को तुलसीदास रचित रामचरितमानस की इस पंक्ति ने इतना प्रभावित किया कि उनके मन में भारत आने की प्रबल इच्छा जागृत हुई। अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए वे तुलसीदास की पावन भूमि भारत खिंचे चले आये और हमेशा के लिए यहीं के होकर रह गये। डॉ कामिल बुल्के के मन में यह जिज्ञासा थी कि आखिर इतनी उदात्त सोच रखने वाले तुलसीदास का देश भारत कितना महान और पावन होगा। उसे अनुभव और महसूस करने आखिर वे भारत आ ही गये। बाद में उन्होंने अपने को हिंदी के लिए आजीवन समर्पित कर दिया।
साहित्य के अनन्य साधक, धर्मयोद्धा और संत साहित्यकार डॉ फादर कामिल बुल्के का जन्म 1 सितंबर 1909 को बेल्जियम में हुआ था। सन् 1935 ईस्वी में फादर कामिल बुल्के भारत पहुंचे जहां से उनकी जीवन यात्रा का एक नया दौर शुरू हुआ। शुरुआत में उन्होंने दार्जिलिंग के संत जोसेफ कॉलेज और गुमला के संत इग्नासियुस मिशन स्कूल में बतौर शिक्षक के रूप में काम करना शुरू किया।
कुछ ही दिनों में उन्होंने महसूस किया कि जैसे बेल्जियम में मातृभाषा फ्लेमिश की उपेक्षा और फ्रेंच का वर्र्चस्व था, वैसी ही स्थिति भारत में हिन्दी की उपेक्षा और अंग्रेजी का वर्चस्व है। उन्होंने 1938 ई़ में सीतागढ़ा में पंडित बदरीदत्त शास्त्री के निर्देशन में हिन्दी और संस्कृत सीखा। 1940 ई़ में फादर बुल्के ने हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग की विषारद की परीक्षा पास किया। 1947 ई़ में इलाहाबाद विश्वविद्यायल से हिन्दी में एमए की शिक्षा ग्रहण किया।
1947 ई़ में फादर बुल्के ने डॉ धीरेन्द्र वर्मा की प्रेरणा से रामकथा : उत्पत्ति और विकास विषय पर डॉ माता प्रसाद गुप्त के निर्देशन में शोध कार्य प्रारंभ किया। उन्होंने हिन्दी प्रेम के कारण अपनी पीएचडी शोध प्रबंध हिन्दी में ही लिखी। जिस समय वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शोध कर रहे थे उस समय देश में सभी विषयों की थीसिस अंग्रेजी में लिखी जाती थी। उन्होंने जब हिन्दी में शोध प्रबंध लिखने की अनुमति मांगी तो विश्वविद्यालय ने अपनी शोध संबंधी नियमों में बदलाव कर उनकी बात मान ली।
उसके बाद देश के अन्य हिस्सों में भी हिन्दी में शोध प्रबंध लिखी जाने लगी। फादर बुल्के के द्वारा प्रस्तुत शोध-प्रबंध हिन्दी में लिखा गया पहला षोध प्रबंध है। उनके द्वारा किया गया शोध इतना गहन, गंभीर और उत्तम था कि आगे चलकर यह भारत सहित पूरे विष्व में प्रकाशित हुई और हिन्दी प्रेमी फादर बुल्के को पूरा विश्व जानने लगा। वास्तव में उनके द्वारा प्रस्तुत शोध प्रबंध को रामकथा संबंधी समस्त सामग्री का विश्व-कोष कहा जा सकता है। उनका शोध प्रबंध चार भागों में विभक्त है।
पहले भाग में प्राचीन रामकथा साहित्य की विवेचना की गयी है। इसके अंतर्गत पांच अध्यायों में वैदिक साहित्य और रामकथा, वाल्मीकि कृत रामायण, महाभारत की रामकथा, बौद्घ रामकथा तथा जैन रामकथा संबंधी सामग्री की पूर्ण परीक्षण की गयी है। दक्षिण भारत में हिन्दी प्रचार प्रसार में इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इनकी ही देन है कि आज बैंको में हिन्दी माध्यम से कार्य सम्पन्न हो रहा है। उन्होंने रामकथा और रामचरितमानस को बौद्घिक जीवन दिया।
फादर बुल्के ने अपने बुलंद हौसलों से यह साबित कर दिया कि-
लहरों को साहिल की दरकार नहीं होती
हौसले बुलंद हो तो चिराग की चाह नहीं होती।
फादर बुल्के हिन्दी अंगेजी शब्द-कोष के निर्माण के लिए वे सत्त प्रयत्नशील रहे। 1968 ई़ में उनका अंग्रेजी हिन्दी कोष प्रकाशित हुआ जो आज भी सबसे प्रामाणिक शब्द कोश माना जाता है। उन्होंने इसमें 40 हजार शब्द जोड़ा है। वे बाइबिल का भी हिन्दी भाषा में अनुवाद किये। भारत में हिन्दी के महत्व को डॉ फादर बुल्के ने बखूबी समझा।
इस संदर्भ में उनका यह कथन उल्लेखनीय है- संस्कृत भारत की महारानी, हिन्दी बहुरानी, और अंगे्रजी भारत की नौकरानी है। यह उनके हिन्दी प्रेम का परिचायक है। 17 अगस्त 1982 ई को फादर कामिल बुल्के इस धराधाम से हमेशा के लिए चल बसे। फादर बुल्के को हिन्दी भाषा की सेवा के लिए अनेको सम्मान से सम्मानित किया गया। उन्हें 1974 ई में भारत सरकार द्वारा पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। 1951 ई़ में उन्हें भारत की नागरिकता मिली।
फादर कामिल बुल्के की प्रमुख रचनाएं हैं- रामकथा : उत्पत्ति और विकास, नया विधान, नील पक्षी, मंथन, राम कथा और तुलसीदास, मानस कौमुदी, ईसा जीवन और दर्षन, अंग्रेजी हिन्दी शब्द कोष, हिन्दी अंग्रेजी लघु कोष।
डॉ कामिल बुल्के ने अपनी साधना से हिन्दी को पूरब और पश्चिम से जोड़ दिया। भारतीय और पाश्चात्य संस्कृति की दीवारों को तोड़ते हुए हिन्दी के अनन्य संत हमेशा के लिए अजर अमर हो गये। हिंदी के लिए उनका समर्पण अविस्मरणीय और अनुकरणीय है।
इस महान विभूति को शत -शत नमन। फिराक गोरखपुरी की ये पंक्तियां बुल्के साहब पर सही बैठती हैं -
बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लेते हैं,
तुझे ऐ जिंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं।
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