टीम एबीएन, लोहरदगा। सेवा सबसे बड़ा धर्म है उक्त बातें लोहरदगा लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र से सांसद पूर्व केंद्रीय मंत्री सुदर्शन भगत ने कही। वह रविवार को गुरुकुल शांति आश्रम लोहरदगा में यशोदा महिला समिति शुभारंभ को लेकर आयोजित संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे।
सांसद सुदर्शन भगत ने कहा कि हमारे देश में कुछ वाक्य व सूत्र प्रचलित हो गये हैं। इनमें से सेवा परमो धर्मः इसका अर्थ सभी जानते हैं। इसके आधार पर सेवा ही परम धर्म है। हमारे यहां धर्म उन गुणों को कहा गया है जिसे मनुष्यों को धारण करना चाहिए। श्रेष्ठ गुणों से युक्त स्वभाव को धर्म कहा जाता है। श्रेष्ठ गुणों वाला वह व्यक्ति धार्मिक है। सांसद ने कहा कि सेवा के गुण और स्वभाव को धारण करना धर्म का एक अवयव व अंग हो सकता है।
महिला समिति गठन के पहले दिन ही यशोदा महिला समिति के द्वारा गुरुकुल शांति आश्रम को डिस्पेंसर वाटर कूलर भेंट किया गया। महिला समिति की ओर से यह कूलर सांसद सुदर्शन भगत उनकी धर्मपत्नी और आचार्य शरच्चंद्र आर्य ने ब्रह्मचारियों को समर्पित किया।
झारखंड प्रदेश आर्य वीर दल के प्रमुख आचार्य शरच्चंद्र आर्य ने कहा कि धर्म के दस अंग हैं। धैर्य, क्षमा, इच्छाओं का दमन, अस्तेय, शौच, इन्द्रियों पर नियंत्रण, धीवा सद्बुद्धि, विद्या, सत्य व अक्रोध। यह धर्म के दश लक्षण कहे जाते हैं। इसके अतिरिक्त ईश्वर की उपासना, अग्निहोत्र करना, माता-पिता व आचार्यों की सेवा करना भी धर्म है। इन्हें भी धर्म का अंग कहा जा सकता है।
इसी प्रकार से निर्धनों और समाज सेवा में रत संस्थाओं को दान देना, परोपकार करना, राष्ट्र भक्ति, चरित्रवान होना, कुटिल न होना, परनिन्दा न करना आदि भी धर्म के अंग हैं।
महिला समिति मंजू जयसवाल ने कहा कि हम सेवा परम धर्म के विचार और सिद्धान्त से सहमत नहीं हो पाते। हां, सेवा के योग्य व पात्र लोगों की सेवा करना धर्म है, यह हम स्वीकार करते हैं। इससे किसी को कोई विरोध और मतभेद नहीं हो सकता।
महिला समिति की रीता अग्रवाल ने कहा कि रावण एक भिक्षुक व साधु के वेश में भिक्षा लेने आया था। माता सीता उस भिक्षुक की सेवा के लिए उसे भोजन के पदार्थ दे रही थी। यह भिक्षा एक सेवा ही तो थी। यदि इसे परम धर्म कहा जाये तो इसका परिणाम देखना चाहिए। जिस कार्य के परिणाम से व्यक्तिगत, समाजिक व देश का अहित हो, वह कार्य अच्छा होने पर भी अच्छा न होकर परम धर्म तो क्या अधर्म ही कहा जा सकता है। अतः सेवा करनी चाहिए और सेवा करते हुए यह ध्यान रहना चाहिए कि हम जिसकी सेवा कर रहे हैं। वह उसका पात्र हो।
हमारी सेवा से वर्तमान व भविष्य में हमारा व हमारे बन्धुओं का किसी प्रकार से अनीष्ट न हो। सेवा लेने वाले की पात्रता में प्रथम आवश्यकता तो यही होती है कि वह व्यक्ति निर्दोष होना चाहिए। वह व्यक्ति अपराध प्रवृत्ति का न हो। यदि सेवा लेने वाला इन दोषों से युक्ता होगा तो सेवा का परिणाम गलत हो सकता है और तब सेवा करने वाले को पछताना पड़ सकता है।
कार्यक्रम में अन्य लोगों के अलावा यशोदा महिला समिति, लोहरदगा मंजू जायसवाल, कनकलता, आरती गुप्ता, ममता गुप्ता, रीता अग्रवाल, लक्ष्मी मित्तल, अंशु खत्री, आशा गुप्ता, रंजू अग्रवाल, सतीश जायसवाल, ओमप्रकाश गुप्ता, संगीता मित्तल, आचार्य शरच्चंद्र आर्य, आचार्य अर्जुनदेव, धनंजय अग्रवाल, कौशल ओम प्रकाश गुप्ता आदि योगदान किया।
सांसद की धर्मपत्नी और झारखंड सरकार कि अधिकारी ने कहा कि सेवा ही वो सीमेंट है, जो हमारा तमाम लोगों के साथ स्नेह और आत्मीयता को बनाए रखता है। इसके होने पर रिश्तों पर होने वाले किसी भी आघात का कोई असर नहीं होता है। सेवा से जुड़े अनमोल विचार जानने के लिए
व्यक्ति को कभी भी मानवता में विश्वास नहीं खोना चाहिए।
मानव एक समुद्र के समान होती है। ऐसे में यदि इस सागर की कुछ बूंदे गंदी भी हो जाये, तो पूरा समुद्र गंदा नहीं होता है। मनुष्य को हमेशा इसी मानवता की सेवा करते हुए जीवन व्यतीत करना चाहिए। मानवता इंसान का सिर्फ एक अच्छा गुण ही नहीं बल्कि उसका धर्म ही होता है। सभी धर्मों में मानव सेवा को ईश्वर की सेवा बताया गया है। ऐसे में हर इंसान को यही प्रयास करना चाहिए कि वह सच्चे मन से, पूरी ईमानदारी के साथ न इंसान और जीवों की सेवा करे।
विशिष्ट अतिथि आरोग्य फाउंडेशन के अध्यक्ष सतीश जायसवाल ने कहा कि सेवा से शत्रु भी मित्र हो जाता है। इसे करने के लिए इंसान को प्रेम और करुणा की जरूरत होती है, धन की नहीं। मानव मात्र की सेवा करने वाले व्यक्ति के हाथ उतने ही पवित्र और धन्य होते हैं, जितने ईश्वर की साधना करने वाले होंठ। मानव सेवा करने के लिए सिर्फ और सिर्फ आपको अपने भी मानव मात्र के प्रति दया और प्रेम की जरूरत होती है।
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