रांची : आरयू मास कॉम के विद्यार्थियों ने सीखी फिल्‍म संपादन की बारीकियां

 

  • असीम सिन्‍हा ने छात्रों को फिल्‍म संपादन के इतिहास से वर्तमान तक से रूबरू कराया
  • आरयू मास कॉम में संपन्‍न हुआ फिल्‍म एडिटिंग पर बेहतरीन कार्यशाला सह सेमिनार

टीम एबीएन, रांची। शनिवार एक अप्रैल को आरयू के मास कॉम डिपार्टमेंट के सभागार में बॉलीवूड तथा अंतर्राष्‍ट्रीय फिल्‍मों के प्रसिद्ध फिल्‍म एडिटर असीम सिन्‍हा ने एक सेमीनार सह कार्यशाला में विभाग के छात्रों को फिल्‍म संपादन के बारीकियों को सिलसिलेवार तरीके से बताया। इस कार्यक्रम में सैकड़ों छात्रों ने भाग लिये और अपने सवाल भी पूछे।

असीम सिन्‍हा के विभाग में आगमन पर मास कॉम की प्राध्‍यापक पूजा उरांव ने झारखंड के परंरा के अनुसार लोटा के जल से उनका हाथ धोकर किया। इसके बाद विभाग के उपनिदेशक डॉ विष्‍णु चरण महतो ने उन्‍हें शॉल देकर सम्‍मानित किया और स्‍वागत भाषण दिया।

मास कॉम के निदेशक प्रो डॉ बीपी सिन्‍हा ने असीम सिन्हा को स्मृति चिन्ह दिया और अपने संबोधन में सभागार में आये छात्रों और मीडिया को बताया कि  असीम सिन्‍हा ने चंद्रकांता सीरियल से लेकर फिल्‍म मम्‍मो, वेलकम टू सज्‍जनपुर, जजंतरम ममतंरम  जैसे चर्चित फिल्‍मों सहित बॉलीवूड के सैकड़ो फिल्‍मों का संपादन किया है। इसके अलावा वह अंतर्राष्‍ट्रीय फिल्‍मों के संपादन का भी काम करते हैं।

इस कार्यशाला सह सेमीनार में असीम सिन्‍हा ने 19वीं सदी के प्रारंभ से लेकर आज तक के फिल्‍मों के संपादन में तकनीक, बदलाव और स्‍पेशल इफेक्‍ट्स तक के बारे में प्रोजेक्‍टर पर फिल्‍मों को दिखा कर बहुत ही रोचक और सटीक तरीके से बताया। इस दरम्‍यान उन्‍होंने प्रारंभिक दौर के फिल्‍मों द ग्रेट ट्रेन रॉबरी, द ओडेसा स्‍टेट्स जैसी फिल्‍मों को भी दिखाया।

असीम सिन्‍हा ने कहा कि ग्रीफिथ को फादर आफ एडिटिंग कहते हैं और 1915 से ड्रामाटिक कंटेट की शुरुआत हुई वही 1926 में मोंटाज सिक्वेंस की शुरुआत हुई।रूसी फिल्‍मकार पोदोवकीन ने इंटेलेक्चुअल मोंटाज की शुरुआत की। उन्‍होंने कहा कि फिल्म मेकिंग एक व्यक्ति का नहीं बल्कि टीम वर्क है और फिल्‍म के एडिटिंग में तीन चीजें बहुत महत्वपूर्ण हैं। वो है सेलेक्सन आफ शोर्ट्स, अरेंजमेंट आफ शाट्स, टाइमिंग आफ शाट्स।

छात्रों और शिक्षकों के सवालों के जवाब में उन्‍होंने कहा कि एडिटर कभी भी कंटेंट के साथ छेड़छाड़ नहीं करता बल्कि फोर्म के साथ छेड़छाड़ करता है। इसके अलावा संगीत की वीडियो एडिटिंग बिल्‍कुल ही अलग होती है। वैसे ही डांस फाइट के वीडियो एडिटिंग्स अलग होते हैं। इसमें कोरियोग्राफर, फाइट मास्टर के साथ बैठना होता है‌। वैसे ही डाक्यूमेंट्री फिल्‍मों की एडिटिंग बहुत ही परिश्रम का एक चुनौतीपूर्ण होता है। 

आज की तकनीक की चर्चा करते हुये उन्‍होंने कहा कि आज कल स्पेशल इफेक्ट्स और ग्रीन बैंकग्राउंड से भी बहुत कुछ किया जा सकता है जो पर्दे पर जीवंत हो उठता है। वास्‍तव में फिल्म एडिटिंग टाइम का कंप्रेसन और एक्सपेंशन होता है।सब कुछ टाइम एंड स्पेस है। उन्होंने श्याम बेनेगल जैसे निदेशकों के साथ काम के अनुभवों को भी छात्रों को सुनाया  बताया।

झारखंड में फिल्म बनाने की इच्छा है: एक छात्र के सवाल के जवाब में उन्‍होंने कहा कि मैं झारखंड से हूं। देश विदेश में संपादन के काम में व्‍यस्‍त रहता हूं, पर मेरी इच्‍छा है कि झारखंड में फिल्‍म बनाउं और मैं यह निर्माण कार्य अवश्‍य करूंगा।

इस आयोजन में विभाग के शिक्षक डॉ संकर्षण परिपूर्णन, संतोष उरांव, कुदंन कुमार चौधरी, पूजा उरांव, मनोज कुमार शर्मा, अंग्रेजी विभाग की प्राध्‍यापक डॉ पूनम निगम सहाय। मास कॉम विभाग के कर्मी पूर्णेंदूशेखर तिवारी, सुशील रंजन, डहरू टोप्पो, रेखा बाखला समेत सैकड़ो छात्र उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन अंशिता सिंह ने किया तथा धन्‍यवाद ज्ञापन मनोज कुमार शर्मा ने किया।

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