टीम एबीएन, रांची। झारखंड के हजारीबाग जिला अंतर्गत चौपारण प्रखंड के दैहर, सोहरा, मानगढ़ और हथिंदर गांव में सैकड़ों पुरातात्विक अवशेष और साक्ष्य मिले हैं। पुरातत्वविदों का अनुमान है कि ये अवशेष तीन से लेकर डेढ़ हजार वर्ष पुराने हो सकते हैं। आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के रांची और पटना अंचल की अलग-अलग टीमों ने इन इलाकों का दौरा कर यहां मौजूद पुरावशेषों का निरीक्षण किया है। इन स्थलों पर पुरातात्विक खुदाई और अनुसंधान के लिए एएसआई के केंद्रीय कार्यालय को प्रस्ताव भी भेजा जा रहा है। प्राचीन शिलापट्ट बाहर निकले सोहरा गांव में बीते हफ्ते मिट्टी निकालने के लिए कुछ ग्रामीणों द्वारा की गयी खुदाई के दौरान दर्जनों की संख्या में प्राचीन शिलापट्ट बाहर निकल आये। ग्रामीणों का कहना है कि उत्सुकता वश पांच से सात फीट खुदाई करने के बाद मंदिर या महल के शीर्ष भाग जैसी संरचना दिख रही है। इस सूचना पर गांव पहुंची आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के रांची अंचल की टीम ने ग्रामीणों से अपने स्तर से किसी तरह की खुदाई नहीं करने का आग्रह किया है। गांव का निरीक्षण करने पहुंची एएसआई की टीम का नेतृत्व कर रहे अधीक्षण पुरातत्वविद् शिवकुमार भगत की मानें तो यहां मौजूद पुरावशेष हजारों वर्ष प्राचीन नगरीय सभ्यता से संबंधित हो सकते हैं। बुद्ध, भगवान गणेश की मूर्तियां मिली : पुरातत्वविदों ने इस गांव में स्थित एक मंदिर के पास स्थित बड़ा तालाब का भी जायजा लिया, जहां से कुछ महीने पहले ग्रामीणों को गौतम बुद्ध, भगवान गणेश और कई अन्य मूर्तियां मिली थीं। ये सभी प्रतिमाएं मंदिर के बाहरी प्रांगण में खुले आसमान के नीचे रखी गयी हैं। ASI तैयार कर रही रिपोर्ट एएसआई की टीम ने कहा कि इस संबंध में एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर केंद्रीय कार्यालय को भेजी जायेगी। इसी प्रखंड के मानगढ़, दैहर और हथिंदर गांव में तालाब, कुएं की खुदाई और खेतों की जुताई के दौरान पिछले 70 वर्षों के दौरान सैकड़ों प्रतिमाएं और शिलापट्ट बाहर आये हैं। रखरखाव के अभाव में इन इलाकों में पायी गयी कई प्रतिमाओं की चोरी भी हुई है। यहां देवी-देवताओं की प्राचीन प्रतिमाएं : यहां मौजूद एक बड़ी दैवीय प्रतिमा की पूजा स्थानीय ग्रामीण माता कमला के रूप में करते हैं। गौतम बुद्ध, बौद्ध देवी तारा और मरीचि, अवलोकितेश्वर, ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गणेश सहित कई अन्य देवी-देवताओं की भी प्राचीन प्रतिमाएं यहां जमा कर रखी गयी हैं। लिपि को डिकोड करने पर मिलेगी जानकारी : तीन महीने पहले भारतीय पुरातात्विक सर्वे के दिल्ली स्थित कार्यालय से आयीं डॉ अर्पिता रंजन ने यहां के शिलापट्ट पर अंकित लिपि के नमूने लिये थे। देश-विदेश के कई अन्य शोधार्थी भी इस इलाके में प्राचीन मूर्तियां पाये जाने की सूचना पाकर पहुंचते रहे हैं। अलग-अलग शिलापट्टों पर अंकित लिपि को डिकोड किये जाने पर पुरातात्विक सभ्यता के बारे में संपूर्ण जानकारी मिल सकती है। एएसआई के पटना अंचल की टीम अधीक्षण पुरातत्वविद एमजी निकोसे के नेतृत्व में आयी थी। इस टीम ने मानगढ़ गांव में एक विशाल टीले को बौद्ध स्तूप के तौर पर चिन्हित किया है। बौद्ध भिक्षु भंते तिस्सावरो ने भी इसकी पुष्टि की है। ग्रामीण वर्षों से इस ऊंचे टीले की पूजा करते आ रहे हैं। प्रखंड के हथिंदर गांव में अति प्राचीन सती स्टोन बरामद हुआ है। पिछले साल मानगढ़ आये नालंदा विश्वविद्यालय के डॉ विश्वजीत का कहना है कि यहां नार्दर्न ब्लैक पॉलिश वेयर (काले चमकीले मृदभांड) के कई पुरावशेष मौजूद हैं। उनके अध्ययन और शोध के मुताबिक ये ईसा पूर्व पांच सौ से एक हजार वर्ष पुराने हो सकते हैं। इलाके में एक अति प्राचीन टेराकोटा रिंग वेल भी है। कई चौंकाने वाली जानकारी मिल सकती है : यूनिवर्सिटी ऑफ पेनसिलवेनिया की शोध छात्रा हरियाणा की रोहतक निवासी शशि अहलावत ने भी इस क्षेत्र का निरीक्षण किया था। उनका कहना है कि इन अतिप्राचीन धरोहरों पर व्यापक अध्ययन से कई चौंकाने वाली ऐतिहासिक जानकारियां सामने आ सकती हैं। रांची के एएसआई अंचल में पदस्थापित सहायक पुरातत्वविद् नीरज कुमार का कहना है कि ज्यादातर प्रतिमाएं पाल काल की लगती हैं, लेकिन कई पुरावशेष ऐसे हैं जो यहां हजारों साल पुरानी सभ्यता से संबंधित हो सकते हैं।
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