सिद्धनाथ तीर्थ के रूप में विख्यात है बिहार का बराबर सिद्धेश्वरनाथ मंदिर

 

एबीएन सोशल डेस्क। वैसे तो संपूर्ण देश में अनेक प्राचीन शिव मंदिर हैं। परंतु जब बात प्राचीनतम शिव मंदिर की हो तो मगध के बराबर पहाड़ पर स्थित सिद्धेश्वर नाथ महादेव मंदिर का नाम सर्वप्रथम आता है। इसे सिद्धनाथ तीर्थ के रूप में भी जाना जाता है। महाभारत कालीन जीवंत कृतियों में से एक यह मंदिर आज भी पुरातन शिल्पकृतियों में महिमामंडित प्राचीन आदर्शों से युक्त पूजन परंपरा को जीवित रखे हुए है। बराबर पहाड़ के शिखर पर अवस्थित सिद्धेश्वरनाथ को नौ स्वयंभू नाथों में प्रथम कहा जाता है। इनकी पूजन कथा शिवभक्त वाणासुर से संबंधित होने के कारण इसे ‘वाणेश्वर महादेव’ भी कहा जाता है। मंदिर तक जाने के लिए सीढीयां भी बनी हुई है। बराबर पर्वत भारतवर्ष के पुरातन ऐतिहासिक पर्वतों में एक है। 1100 फुट ऊंचे बराबर पर्वत को मगध का हिमालय भी कहा जाता है। यहां सात अदभुत गुफाएं भी बनी हुई है। जिनका पता अंग्रेजों के कार्यकाल में चला । इनमें से चार गुफाएं बराबर गुफाएं एवं बाकी तीन नागार्जुन गुफाएं कहलाती है। भारत में पहाड़ों को काट कर बनाई गयी ये सबसे प्राचीन गुफाएं है। पर्यटन के लिहाज से भी ये काफी उपयुक्त स्थान है। ये पर्वत सदाबहार सैरगाह के रूप में प्राचीन काल से ही चर्चित है। किंवदंतियों के अनुसार पर्वत पर बनी गुफाएं प्राचीन काल में ऋषि-मुनियों के ध्यान साधना लगाने हेतु सुरक्षा के दृष्टिकोण से बनाई गई थी। गया-जहानाबाद सीमा पर अशोककालीन गुफाओं में कर्ण चैपर गुफा, सुदामा गुफा, लोमस ऋषि गुफा, नागार्जुन गुफा सहित सात गुफायें हैं। गौरतलब है कि कर्ण चैपर, सुदामा और लोमस ऋषि गुफा एक ही चट्टान को काटकर बनाई गई हैं। देखने में अद्भुत लगने वाली ये गुफाएं प्राचीन समय की कलाकारी को दशार्ती हैं। गुफा के भीतर तेज आवाज में चिल्लाने पर काफी देर तक प्रतिध्वनियों को सुनकर आने वाले पर्यटक काफी रोमांचित होते हैं। सुदामा गुफा : सुदामा गुफा का निर्माण सम्राट अशोक ने अपने राज्याभिषेक के बारहवें वर्ष में आजीवक साधुओं के लिए बनवाया था। इस गुफा में एक आयताकार मण्डप के साथ वृत्तीय मेहराबदार कक्ष बना हुआ है। लोमस गुफा : लोमस ऋषि की विख्यात गुफा का निर्माण भी अशोक ने था। इन गुफाओं का निर्माण मिश्र शैली में किया गया है तथा उस समय के भारतीय कारीगरों के उत्कृष्ट कलाकारी एवं वास्तु विशेषज्ञता का परिचायक है। मेहराब की तरह के आकार वाली ऋषि गुफाएं लकड़ी की समकालीन वास्तुकला की नकल के रूप में हैं। द्वार के मार्ग पर हाथियों की एक पंक्ति स्तूप के स्वरूपों की ओर घुमावदार दरवाजे के ढांचों के साथ आगे बढ़ती है। यहां कई गुफाओं के अंदर भी गुफाएं है जहां तक पहुंचना काफी मुश्किल है। कर्ण चैपर गुफा : यहां मौजूद कर्ण चैपर गुफा को सुप्रिया गुफा भी कहा जाता था। अशोक ने अपने राज्याभिषेक के 19वें वर्ष में इसका निर्माण कराया था। उस समय के लिखे गये शिलालेख आज भी यहां मौजूद हैं। शिलालेखों के अनुसार इस पहाड़ी को सलाटिका के नाम से भी जाना जाता था। इन गुफाओं का निर्माण भी मिश्र शैली से किया गया है। यहां चिकनी सतहों के साथ एक एकल आयातकार कमरे का रूप बना हुआ है। वापिक गुफा : पहाड़ के ऐतिहासिक सप्त गुफाओं में बनी वापिक गुफा में अंकित तथ्यों से ज्ञात होता है कि इसकी स्थापना योगानंद नामक ब्राह्मण ने की थी। मंदिर परिक्षेत्र में पाषाण खड़ों पर की गयी उत्कीर्ण कलाकृति इस पूरे क्षेत्र को प्राचीन शिव अराधना क्षेत्र के रूप में स्थापित करती है। एक अन्य मत के अनुसार आदिकाल में कौल संप्रदाय का मगध पर जो वर्चस्व था, उसका केन्द्र इसी पर्वत को बताया जाता है। इसकी उत्पत्ति ई।पू. 600 के लगभग मानी जाती है। इन्हें दशरथ द्वारा आजीविका के अनुयायियों को समर्पित किया गया था। विश्व जोपरी : विश्व जोपरी गुफा में दो आयातकार कमरे मौजूद हैं जहां चट्टानों को काटकर बनाई गई अशोका सीढियां द्वारा पहुंचा जा सकता है। नागाजुर्नी गुफाएं : नागार्जुन के आसपास की गुफाएं बराबर गुफाओं से छोटी एवं नयी है। गोपीका गुफा और वापिया का गुफा लगभग 232 ईसा पूर्व में राजा दशरथ द्वारा आजीविका संप्रदाय के अनुयायियों को समर्पित की गई थी। गोपिका गुफा : बारबर पहाड़ में अवस्थित इन गुफाओं को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया है। जिस विशाल चट्टान को खोदकर गुफाएं बनाई गई है उस पर लोगों की आवाजाही बनी रहती है। अक्सर पर्यटक यहां पिकनिक मनाने आते है। वैसे यहां सालों भी भक्तगण व पर्यटक आते रहते हैं लेकिन श्रावण मास, बसंत पंचमी एवं महाशिवरात्री अनंत चतुदर्शी में भक्तों व पर्यटकों का आगमन बड़ी संख्या में होता है।

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