ऑपरेशन कमल : महाराष्ट्र के बाद क्या अब झारखंड खेला होबे?

 

टीम एबीएन, रांची। खदान घोटाले में आईएएस पूजा सिंघल के नपते ही भाजपा झारखंड में नई सरकार बनाने की दिशा में चल पड़ी थी। खुद के नाम खदान एलॉट करके भ्रष्टाचार का रिकॉर्ड बनाने वाले मुख्यमंत्री को सत्ता से उतार भाजपा सरकार में बैठ जाती। मगर मौका राष्ट्रपति चुनाव का आ गया है। झारखंड में ऑपरेशन कमल की जल्दीबाजी से बात बिगड़ जाती। जहां आदिवासी को राष्ट्रपति बनाकर गुजरात के चुनाव में आदिवासियों को भाजपा की ओर खींच लाने की कोशिश है, वहां आदिवासी मुख्यमंत्री हटते ही शहादत की सियासत फिजा में फैल जाती। फिर वो बात झारखंड से नहीं बनती जो महाराष्ट्र में बन गई। खदान घोटाले में आईएएस पूजा सिंघल के नपते ही भाजपा झारखंड में नई सरकार बनाने की दिशा में चल पड़ी थी। खुद के नाम खदान एलॉट करके भ्रष्टाचार का रिकॉर्ड बनाने वाले मुख्यमंत्री को सत्ता से उतार भाजपा सरकार में बैठ जाती। मगर मौका राष्ट्रपति चुनाव का आ गया है। झारखंड में ऑपरेशन कमल की जल्दीबाजी से बात बिगड़ जाती। जहां आदिवासी को राष्ट्रपति बनाकर गुजरात के चुनाव में आदिवासियों को बीजेपी की ओर खींच लाने की कोशिश है वहां आदिवासी मुख्यमंत्री हटते ही शहादत की सियासत फिजा में फैल जाती। फिर वो बात झारखंड से नहीं बनती जो महाराष्ट्र में बन गई। लेकिन राष्ट्रपति पद के लिए विपक्ष के उम्मीदवार यशवंत सिन्हा के गृह प्रदेश झारखंड में सांसत की स्थिति बनी हुई है। राज्य में यूपीए की साझा सरकार है। अगुआ झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता हेमंत सोरेन हैं। उनकी एक टांग सियासत में तो दूसरी ईडी और सीबीआई के मुकदमे में जा फंसी है। वह चाहकर भी सिन्हा के हक में मतदान करने का फैसला नहीं सुना पा रहे हैं। झारखंड के मुख्यमंत्री सोरेन को इसकी परिणति का भान है। महाराष्ट्र, कर्नाटक और मध्यप्रदेश में जिस रास्ते बीजेपी की सरकार बनी है, वह देख और समझकर नतीजा जानते हैं। इसलिए राष्ट्रपति समर्थन के नाम पर इधर उधर की बात करते हुए दिल्ली जाकर गृहमंत्री अमित शाह से लंबी मुलाकात कर आए हैं। इस मुलाकात को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि अतीत में हेमंत सोरेन की राजनीति भाजपा के सहारे ही चमकी है। वह 2009 में पहली बार विधायक बने। 2010 में मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा की सरकार में रघुवर दास के साथ उपमुख्यमंत्री बना दिए गए। 15 जुलाई 2013 को लालू यादव की आरजेडी और कांग्रेस की मदद से पहली बार मुख्यमंत्री बने। वह लगभग वैसा ही ऑपरेशन था जैसा कि महाराष्ट्र में शरद पवार ने भाजपा से अलग ले जाकर उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री की कुर्सी तोहफा में दिला दी थी। झारखंड में झामुमो का झामुमो के संग आना और आकर दूर चले जाना हेमंत सोरेन के पिता शिबू सोरेन की राजनीति का सफल दांव रहा है। यही वजह है कि 15 नवंबर 2000 को झारखंड के अस्तित्व में आने के बाद प्रथम मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के कार्यकाल को छोड़ दिया जाए तो झारखंड में सत्ता की राजनीति सोरेन परिवार के इर्द-गिर्द घूमती रही है। "कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा भानुमति ने कुनबा जोड़ा" के अंदाज में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की सरकार चल रही है। रह रहकर कांग्रेस से तनातनी की बात सामने आती है। हाल के राज्यसभा चुनाव में यह नौबत आई थी कि झामुमो ने कांग्रेस के कोटे की सीट नहीं छोड़ी। तब राज्य कांग्रेस पार्टी के नेताओ ने आलाकमान से सरकार से अलग होना ही श्रेयस्कर बता दिया था। लगा था कि खुद ब खुद यह सरकार गिर जाएगी। दरअसल, 29 दिसंबर 2019 से हेमंत सोरेन एक खास गणित के तहत मुख्यमंत्री बने हुए हैं। चुनाव में तीन विधायकों के साथ जीत आए प्रथम मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने भाजपा की सरकार बनाने की नौबत पैदा करते हुए अपनी पार्टी झारखंड विकास मोर्चा का भाजपा में विलय कर दिया। विलय से ही पहले जेवीएम के अन्य दो विधायक खिसककर कांग्रेस पार्टी में पहुंच गए। उससे 81 विधायकों वाली विधानसभा में सरकार बनाने के लिए समर्थन वाले 41 विधायकों की जादुई आंकड़ा चाहिए। दिसंबर 2019 के चुनाव नतीजे में झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के 30 विधायक जीतकर आए। सहयोगी कांग्रेस को 18 सीटें मिली। दोनों की सीटें मिलाकर सरकार बनाने की स्पष्ट स्थिति बन गई। मुख्यमंत्री रघुवर दास के खिलाफ सत्ताविरोधी हवा का नतीजा रहा कि उनके अपने ही सहयोगी मंत्री सरयू राय ने निर्दलीय होकर रघुवर दास को ही चुनाव में हरा दिया। बीजेपी महज़ 26 विधायकों तक सिमटकर प्रतिपक्ष की कुर्सी की हकदार बन गई। हालांकि इसके बावजूद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन खुद कांग्रेस से अलग होने और बीजेपी के करीब जाने का संकेत देते रहते हैं। ऐसे में अगर कोई राज्य बीजेपी के पाले में आने को तैयार है तो वह झारखंड है। स्पष्ट संख्या भले ही न हो पर ईसाई मिशनरियों से पार पाने के लिए संघ परिवार झारखंड की सत्ता को बेहद महत्वपूर्ण मानता है। संख्या बल में भले ही हेमंत सोरेन की सरकार सहज लगती हो मगर गठबंधन दलों में रह रहकर दरार उभरते नजर आ रहे हैं। कभी कांग्रेस से तो कभी जेएमएम से कसमसाहट के सुर निकल रहे हैं।

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