देश के विकास में अडानी-अंबानी-टाटा सहित पूंजीपतियों की देन...

 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (आकाश प्रकाश)। ऐंबिट कैपिटल की सलाहकार, अर्थशास्त्री ऋतिका मांकड़ मुखर्जी ने एक दिलचस्प रिपोर्ट लिखी है जिसका शीर्षक है-स्काउटिंग फॉर जाइंट्स। रिपोर्ट भारतीय कंपनियों में परिमाण की कमी से संबंधित है। उन्होंने अलग-अलग दौर और देशों की कंपनियों के आंकड़ों का राजस्व के आधार पर अध्ययन किया और पाया कि भारतीय कंपनियां अन्य देशों की कंपनियों की तुलना में छोटी हैं। देश में छोटी कंपनियां बहुत हैं जबकि वैश्विक आकार की कम। उनके विश्लेषण में बहुत विस्तृत ब्योरे और कुछ दिलचस्प आंकड़े हैं। उनकी रिपोर्ट के मुताबिक ज्यादा भारतीय कंपनियां अपना आकार बढ़ाने में सक्षम नहीं हैं। 7 फीसदी की वास्तविक (और 13 फीसदी की नॉमिनल) जीडीपी और 2.8 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था के बावजूद हमारी कंपनियां उभरते बाजारों की तुलना में भी बहुत छोटी हैं। उन्होंने बैंकिंग, वित्तीय सेवा और बीमा कंपनियों (बीएफएसआई) को छोड़कर 2,865 सूचीबद्ध कंपनियों का अध्ययन किया और पाया कि करीब 40 प्रतिशत कंपनियों का राजस्व एक अरब रुपये से कम है। अर्थव्यवस्था के विकास के बावजूद बीते दशक में यह अनुपात नहीं बदला और न ही छोटी कंपनियों की हिस्सेदारी घटी। देश की सूचीबद्ध कंपनियों में से 55 प्रतिशत का राजस्व एक अरब से 100 अरब रुपये के बीच है। जबकि 5 प्रतिशत से भी कम कंपनियों का राजस्व 100 अरब रुपये से अधिक है। केवल 12 कंपनियों का राजस्व एक लाख करोड़ रुपये से अधिक है। बीएफएसआई में भी ऐसा ही है। गैर सूचीबद्ध कंपनियों में भी औसत आकार छोटा है। भारत की तुलना अन्य उभरते बाजारों से की जाए तो अंतर और स्पष्ट है। एक ओर जहां देश की 40 फीसदी कंपनियों का राजस्व एक अरब रुपये से कम है, वहीं उभरते बाजारों में यह 12 फीसदी है। हमारी 55 फीसदी कंपनियों का राजस्व एक से 100 अरब रुपये के बीच है लेकिन उभरते बाजारों में ऐसी कंपनियां 64 फीसदी हैं। हमारी 4 फीसदी कंपनियों का राजस्व 100 अरब रुपये से अधिक है जबकि उभरते बाजारों में यह 15 प्रतिशत है। छोटी कंपनियां बड़ी क्यों नहीं हो पा रहीं? क्या इसका कोई अर्थ है? इस पर ध्यान क्यों दें? हमारी नीति ऐतिहासिक रूप से आकार और परिमाण के खिलाफ रही है। 1991 से पहले देश में एकाधिकार एवं प्रतिबंधात्मक व्यापार व्यवहार आयोग (एमआरटीपीसी) के रूप में नियामकीय ढांचा था। हम आर्थिक शक्ति के चुनिंदा हाथों में सिमटने को लेकर चिंतित रहते थे। इसके बाद श्रम कानून, लघु उद्योगों को संरक्षण या अप्रत्यक्ष कराधान आदि के रूप में कानून ने हमेशा छोटी कंपनियों को प्रोत्साहित किया और बड़ी कंपनियों को हतोत्साहित। नियामकीय जटिलताओं के कारण कंपनियों का आकार बढ़ाना कठिन बना रहा। न्यायिक और नियामकीय माहौल भी स्थिर नहीं रहा है। ऐसे में बड़ी कंपनियों में निवेश को प्रोत्साहन नहीं मिला। चुनिंदा क्षेत्रों को छोड़कर हमारा घरेलू बाजार आज इतना बड़ा नहीं है कि वैश्विक परिमाण का समर्थन कर सके। एक लाख करोड़ रुपये से अधिक राजस्व वाली 12 कंपनियों पर नजर डालें तो ये सभी कंपनियां या तो ऊर्जा क्षेत्र की सरकारी कंपनियां हैं, टाटा स्टील और टाटा मोटर्स जैसी कंपनियां या फिर रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड और महिंद्रा समूह जैसे बड़े कारोबारी समूह। टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज इकलौता अपवाद है जो अपने क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर शीर्ष पर है। कुछ ही ऐसी कंपनियां हैं जिनका आकार भी बढ़ा है और जो घरेलू तौर पर एक उद्योग पर केंद्रित हैं। हमारी कंपनियां शोध एवं विकास पर भी अधिक व्यय नहीं करतीं। इस विषय पर पहले भी बात हो चुकी है। कंपनियों का आकार छोटा होने के कारण वे शोध एवं विकास पर अधिक खर्च नहीं कर पातीं लेकिन यह कमी नवाचार को प्रभावित करती है। हम वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं का हिस्सा भी नहीं बन सके। यदि हम स्मार्टफोन के मामले में वैश्विक आपूर्ति शृंखला का हिस्सा होते तो कई कंपनियों का स्वरूप बदल सकता था। ताइवान का इलेक्ट्रॉनिक क्षेत्र इसका उदाहरण है जो ऐपल कंपनी की आपूर्ति शृंखला पर आधारित है। प्रतिस्पर्धा और निर्यात को लेकर हमारे झुकाव की कमी जाहिर करता है। उत्पादकता और परिमाण में सीधा संबंध है। बड़ी फर्म के पास निवेश के लिए संसाधन होता है और वे आधुनिक तकनीक और प्रबंधन अपना सकती हैं। यदि हमारा कारोबारी क्षेत्र छोटा बना रहा तो प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएगा। तकनीक जिस तरह उद्योगों को बदल रही है उसे देखते हुए निवेश ओर आधुनिकीकरण की कमी तथा नए व्यवहार से दूर रहना हमें गैर प्रतिस्पर्धी बनाएगा। दो ऐसे रुझान हैं जो इसे बदल सकते हैं। पहला तो यही कि स्टार्टअप का परिदृश्य बहुत अच्छा है। अमेरिका और चीन के बाद भारत सबसे बड़ा स्टार्टअप वाला देश है। सरकार ने इस क्षेत्र में मदद का वास्तविक प्रयास किया है। देश में करीब 30 यूनिकॉर्न (एक अरब डॉलर का कारोबार) और 2-3 डेकाकॉर्न (10 अरब डॉलर का कारोबार) कंपनियां हैं। इनमें से अधिकांश अगले दो वर्ष तक अपनी जगह बनी रहेंगी। इनमें से ज्यादातर का कारोबारी मॉडल तकनीक आधारित है। तकनीक की मदद से कारोबार का परिमाण तेजी से बढ़ाया जा सकता है। वैश्विक कारोबारी मॉडल वाली अन्य कंपनियां या तो एनालिटिक्स में हैं या सॉफ्टवेयर सेवा क्षेत्र में। इनका विकास तेजी से हो सकता है क्योंकि ये डिजिटल हैं और इनकी भौतिक जरूरतें उतनी नहीं हैं। जीएसटी और नोटबंदी के साथ अर्थव्यवस्था तेजी से औपचारिक हुई है। ऐसे में आशा यही करनी चाहिए कि बड़ी भारतीय कंपनियां तेजी से स्वरूप विस्तार करेंगी। जोखिम से बचने की प्रवृत्ति आम है और पूंजी केवल बड़े और सुरक्षित कर्जदारों के पास जा रही है। तमाम क्षेत्रों में हमें यही देखने को मिल रहा है कि बड़े कारोबारी मजबूत हो रहे हैं और सुदृढ़ीकरण कर रहे हैं। इससे जहां उनका आकार तेजी से बढ़ेगा और आर्थिक प्रतिफल तथा मुनाफा बढ़ेगा। वहीं इसकी कमियां भी हैं। कॉपोर्रेट मुनाफे की कमजोरी तथा बैलेंस शीट की हालत और वित्तीय तंत्र में जोखिम से बचने की प्रवृत्ति को देखते हुए कहा जा सकता है कि आने वाले समय में 2-3 बड़े कारोबारी समूहों का उभार होगा जिनके पास विसंगतिपूर्ण ढंग से संपत्ति की ज्यादा हिस्सेदारी होगी। इस पर ध्यान देना होगा। शायद हम नहीं चाहेंगे कि ऐसा हो और 2-3 घराने कारोबारी जगत पर नियंत्रण रखें। भारतीय कारोबारी जगत में परिमाण की समस्या विद्यमान है। यह उत्पादकता और शोध एवं विकास को प्रभावित करता है। यह समय के साथ सुधर जाएगा लेकिन हमें इस बात को लेकर सावधान रहना होगा कि हम कहीं ऐसी आर्थिक शक्ति न बन जाएं जहां शक्ति एक ही जगह पर एकत्रित हो।

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