एबीएन एडिटोरियल डेस्क (अजय शाह)। विश्व अर्थव्यवस्था के सामने अब तीन बड़े और अहम सवाल हैं। अमेरिका में वृहद आर्थिक स्थिरता को मुद्रास्फीति का संकट चुनौती दे रहा है और वहां मौद्रिक नीति संंबंधी रणनीति को लेकर भी चिंता है। चीन में एक बड़ी गैर बाजार अर्थव्यवस्था खड़ी की गई थी लेकिन वह आंतरिक विरोधाभासों से दो-चार हो रही है। वहां अलग तरह की निराशा का माहौल है। रूस की अर्थव्यवस्था हालांकि छोटी है लेकिन यूक्रेन युद्ध और आर्थिक गतिविधियों में अचानक गिरावट से विश्व अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है। हमें इस बात की भी चिंता करनी चाहिए कि आने वाले वर्ष में भी इनका प्रभाव देखने को मिल सकता है। वैश्विक वृहद आर्थिक का सबसे महत्त्वपूर्ण तत्त्व है अमेरिका। अमेरिकी वृहद आर्थिक नीति ने महामारी का मुकाबला करने में अहम भूमिका निभाई और भारत भी अमेरिका तथा अन्य विकसित देशों की विस्तारवादी वृहद आर्थिकी का एक अहम लाभार्थी रहा है। परंतु हालिया लड़ाई के दौरान बने हिंसा के माहौल में अमेरिकी वृहद नीति ने अच्छा काम किया। अमेरिकी केंद्रीय बैंक ने करीब दो फीसदी का मुद्रास्फीति लक्ष्य रखा है। लेकिन अमेरिकी मुद्रास्फीति उस दर को पार कर चुकी है। ऐसा चक्र निर्मित होने के भी संकेत हैं जहां वेतन वृद्धि के कारण कीमतों में भी वृद्धि हो जाए। बीते चार दशकों में जहां सभी विकसित बाजारों ने मुद्रास्फीति को लक्षित करना शुरू कर दिया तो ऐसी कठिनाइयां प्राय: दूर हो गईं। अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व के मौजूदा रुख में दो बातें शामिल हैं। आशा की जा रही है कि नीतिगत दरों में एक वर्ष में 150 आधार अंकों की बढ़ोतरी की जाएगी। दावा किया जा रहा है कि इतनी वृद्धि मुद्रास्फीति को नियंत्रण में लाने के लिए पर्याप्त होगी। इस स्थिति में दिक्कत यह है कि अल्प दरों में 150 आधार अंकों का इजाफा किए जाने के बाद भी यह वास्तविक संदर्भ में नकारात्मक बनी रहेगी। फेडरल रिजर्व का मानना है कि एक केंद्रीय बैंक अर्थव्यवस्था में इकलौता योगदान यही कर सकता है कि वह दो फीसदी की अनुमान वाली मुद्रास्फीति दर दे सकेे ताकि वृहद आर्थिक स्थिरता के हालात बन सकें जिसके तहत आम परिवार तथा कंपनियां बेहतर योजनाएं बना सकें। यदि मौद्रिक नीति को सामान्य बनाने का यह सफर मुद्रास्फीति पर कोई असर नहीं डालता है तो 2022 के आखिर में और उसके बाद उसमें धीमापन रह सकता है। अमेरिकी मौद्रिक नीति ने संपूर्ण विश्व को प्रभावित किया है। जब अमेरिका तथा अन्य विकसित देशों में ब्याज दरें कम होती हैं तो वित्तीय पूंजी विश्व अर्थव्यवस्था के उन हिस्सों में जाती हैं जहां जोखिम ज्यादा है। मिसाल के तौर पर भारत में तकनीकी कंपनियां और अचल संपत्ति की कंपनियां। जब विकसित बाजारों की ब्याज दरें बढ़ती हैं तो वैश्विक आवंटक उनकी ओर वापस लौटते हैं और पूंजी भी जोखिम वाले बाजारों से वापस आती है। ऐसे में उन केंद्रीय बैंकों को मुश्किल होती है जो विनिमय दर नीति अपनाने का प्रयास करते हैं। विश्व अर्थव्यवस्था के लिए दूसरी समस्या चीन है। चीन एक बड़ी अर्थव्यवस्था है लेकिन उसके पास अच्छे संस्थान नहीं हैं और कई मायनों में संसाधनों का आवंटन अधिकारियों द्वारा किया जाता है, न कि मूल्य व्यवस्था द्वारा। इससे अस्थिरता आती है। कई वर्षों से अधिकारियों ने वृद्धि को गति देने के लिए उन नीतियों को अपनाया उधारी और अचल संपत्ति की उच्च कीमतों पर बल देती हैं। चीन में एवरग्रांड तथा अचल संपत्ति की कई अन्य कंपनियों की विफलता के बाद अर्थव्यवस्था मुश्किल का सामना कर रही है। सन 1970 के दशक के अंत से ही वैश्विक कंपनियों को लगने लगा था कि वे चीन में निवेश कर सकती हैं, उन्हें यकीन हो चला था कि वह एक उदार लोकतंत्र में परिपक्व बाजार अर्थव्यवस्था के रूप में उभरेगा। शी चिनफिंग के प्रभार संभालने के बाद चीन का रुख अंतर्मुखी हो गया और वह राष्ट्रवाद तथा अधिनायकवाद की ओर बढ़ गया। अच्छे संस्थानों के विकास की प्रक्रिया में स्थिरता आ गई। इसके परिणामस्वरूप वैश्विक परिसंपत्ति आवंटक तथा गैर वित्तीय कंपनियों ने चीन को लेकर अपनी प्राथमिकता कम करनी शुरू कर दी। अमेरिकी आयात में चीन की हिस्सेदारी भी कम होने लगी क्योंकि बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपना उत्पादन चीन से दूर करना शुरू कर दिया। विश्व अर्थव्यवस्था के लिए तीसरी समस्या रूस है। रूस की अर्थव्यवस्था छोटी है, बल्कि भारत से भी छोटी है और अचानक युद्ध तथा आर्थिक प्रतिबंधों ने उसे बड़ा आर्थिक झटका दिया है। अधिकांश लोगों का ध्यान यूक्रेन युद्ध पर केंद्रित है जो कि वास्तव में काफी अहम है। परंतु रूसी अर्थव्यवस्था को जो क्षति पहुंच रही है उससे विश्व अर्थव्यवस्था पर भी कई अनचाहे प्रभाव पड़ सकते हैं। उदाहरण के लिए श्रीलंका, मिस्र और तुर्की जैसे देशों पर काफी बुरा असर पड़ा है। रूस में कारोबार वाली वित्तीय कंपनियों पर भी असर पड़ सकता है। चीन की तरह रूस में भी वैश्विक कंपनियों ने एकबारगी सोचा होगा कि वे उदार लोकतंत्र और बाजार अर्थव्यवस्था पर भरोसा कर सकती हैं। अब सभी बाहरी कारोबारियों को रूस में भारी घाटा हो रहा है। इस प्रकार चीन और रूस के रूप में क्रमश: एक बड़ी और एक छोटी अर्थव्यवस्था में बाहरी प्रतिभागियों को निराशा का सामना करना पड़ा। वैश्वीकरण में मूल समस्या घरेलू पूर्वग्रह की है। यह पूर्वग्रह विकसित बाजारों के परिसंपत्ति आवंटकों तथा बोर्ड सदस्यों के मस्तिष्क में रहता है कि वे विकसित बाजारों में बने रहें। चीन और रूस में भारी घाटा इस पूर्वग्रह को बल देगा। यह बात विश्व अर्थव्यवस्था पर विपरीत प्रभाव डालेगी। ये तीनों समस्याएं विश्व अर्थव्यवस्था को एक साथ प्रभावित कर रही हैं: अमेरिकी मुद्रास्फीति और मौद्रिक नीति की चिंता, चीन में वृहद स्थिरता की चिंता और रूस के रूप में एक छोटी अर्थव्यवस्था में अचानक गिरावट। ये समस्याएं अगर अलग-अलग आई होतीं तो इनसे निपटना आसान होता। परंतु ये तीनों एक साथ आई हैं और प्राय: अंत:संबंधित हैं। यह संभव है कि इन दिक्कतों की प्रतिक्रिया स्वरूप विश्व अर्थव्यवस्था के विभिन्न हिस्सों में समस्याएं उत्पन्न हों। इसका तरीका हमें चौंका सकता है क्योंकि हमें अर्थव्यवस्था की इतनी समझ नहीं है कि हालात के घटित होने के सटीक तरीके का अनुमान लगा सकें। भारतीय कंपनियों या नीतिगत निर्णय लेने वालों में से अधिकांश का ध्यान अल्पावधि पर होता है। अब वक्त आ गया है कि अधिक रणनीतिक रुख अपनाया जाए और वैश्विक मामलों की समझ बढ़ाई जाए तथा प्रभाव के अप्रत्याशित चैनलों पर नजर रखी जाए।
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