एबीएन एडिटोरियल डेस्क (आर जगन्नाथन)। यूक्रेन पर रूस के आक्रमण के बाद अमेरिका तथा उसके वैश्विक साझेदारों ने बार-बार नियम आधारित विश्व व्यवस्था तथा लोकतंत्र को बचाने की बात कही है। यहां प्रश्न यह है कि आखिर किसके नियम? जब रूस और चीन तथा कुछ अन्य देश सोच रहे हैं कि वे नए नियम निर्माण करने वाले क्लब के सदस्य हैं लेकिन वे अपने-अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में अपने नियम चला रहे हैं तो हम किस नियम आधारित व्यवस्था की बात कर रहे हैं? नियम ताकत के अधीन हैं। विश्व व्यापार संगठन तथा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में चीन के प्रवेश के नियमों को अमेरिका तथा उसके साझेदारों ने सन 1970 और 1980 के दशक में शिथिल किया क्योंकि वे चाहते थे कि चीन सोवियत संघ के खिलाफ संतुलन साधने के काम आए। भारत के लिए उन नियमों को शिथिल नहीं किया गया। अमेरिका नियम आधारित व्यवस्था की बात करता है लेकिन उसने कभी अपने बनाये नियम ही नहीं माने। जब अपने हितों की बात आती है तो अमेरिका संयुक्त राष्ट्र की मंजूरी या वैश्विक सहमति लिए बिना किसी देश पर आक्रमण कर देता है। वियतनाम, कोरिया, इराक, अफगानिस्तान आदि इसके उदाहरण हैं। बड़ी ताकतों के लिए कोई नियम नहीं होते। पश्चिम में नियमों और कानूनों पर कुछ ज्यादा ही जोर दिया जाता है। प्रमुख बात यह है कि नियमों को लागू करना होता है और केवल वही नियम लागू किए जा सकते हैं जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शक्तिशाली लोगों के लिए लाभप्रद हों या उनके लिए फायदेमंद हों जिन्होंने वे नियम बनाए हैं। अमेरिका दूसरे विश्व युद्ध के बाद मुक्त व्यापार चाहता था क्योंकि उसे यूरोप और एशिया पर दबदबा बनाना था। चूंकि अमेरिका को किए जाने वाले हर निर्यात के मूल्य के रूप में डॉलर स्वीकार्य था इसलिए अमेरिकी अर्थव्यवस्था में आयातकों की भूमिका बढ़ी। परंतु एक बार चीन के आने के बाद इस नियम पर आधारित व्यवस्था लडखड़ाने लगी। अमेरिका ने पाया कि उसके नागरिकों को सस्ती चीनी वस्तुओं से फायदा हो रहा है, उसके उत्पादकों को सस्ते चीनी श्रम से लाभ मिल रहा है। ऐसे में उसने अपने तमाम रोजगार चीन स्थानांतरित किए। उसकी कंपनियां प्रतिस्पर्धी बनी रहीं क्योंकि उन्होंने पूंजी और तकनीक का इस्तेमाल करके श्रम को स्थानांतरित किया और उत्पाद तथा सेवाएं तैयार कीं। इससे उच्च गुणवत्ता वाले रोजगार भारत तथा उभरते बाजार वाले अन्य देशों में भी आए। यदि अमेरिका में डॉनल्ड ट्रंप जीत सके और वाम झुकाव वाले नेताओं के राष्ट्रपति या गवर्नर पदों के करीब पहुंचने की संभावना बनी तो इसलिए क्योंकि उसके नियम अब उस पर ही कारगर नहीं हैं। नियम आधारित व्यवस्था अमेरिका के भीतर से ही टूट रही है और यही कारण है कि हमें देश के भीतर ऐसा ध्रुवीकरण देखने को मिल रहा है। यहां तक कि राजनीति के बाहर भी इस बात पर विचार कीजिए कि कैसे पुरुषों द्वारा बनाए गए नियम ध्वस्त हो रहे हैं क्योंकि महिलाएं उन्हें चुनौती दे रही हैं। जिस तरह आज पितृसत्ता उचित नहीं लगती वैसे ही अमेरिकी नेतृत्व वाले पश्चिमी गठबंधन के नियम जो ईसाई अनुभवों और मूल्यों पर आधारित हों या चीन के नेतृत्व वाले कन्फूशियन मूल्यों पर आधारित नियम भी शायद लंबी अवधि में व्यवहार्य न हों। इनसे हम तीन नतीजों पर पहुंच सकते हैं। पहला, नियम तब तक काम करते हैं जब तक एक वर्चस्ववादी देश हो जिसने उनमें जमकर निवेश किया हो और जो नियम न बनाने वालों को कुछ लाभ सुनिश्चित करने की इच्छा रखता हो। अमेरिका के मुक्त व्यापार को यूरोप और एशिया के निर्यातक देशों से इसी के चलते लाभ मिला। उन्हें अमेरिकी लोकतंत्र से कोई लगाव नहीं था। बल्कि आरंभ में लाभान्वित होने वाले देशों में से ज्यादातर अधिनायकवादी थे। नियम और कानून कागज पर हो सकते हैं लेकिन प्रवर्तन क्षमता न हो तो वे वास्तविक दुनिया में काम नहीं करते। तीसरा, जब शक्ति द्विध्रुवीय हो या बहुध्रुवीय हो तब नियमों में निरंतर परिवर्तन करना होता है ताकि सभी के हितों का ध्यान रखा जा सके या फिर हमारे सामने दो समांतर व्यवस्थाएं उत्पन्न हो जाती हैं। इनमें से प्रत्येक के अपने नियम होते हैं। शीतयुद्ध के दौरान हमने ऐसा ही देखा जहां कुछ देश अमेरिका के नियम मानते थे तो कुछ अन्य सोवियत संघ के। द्विपक्षीय या बहुपक्षीय व्यवस्था में वही कानून बच सकता है जिसका क्रियान्वयन कमजोर हो, भले ही प्रत्येक ब्लॉक अपने मूल समूह पर कड़ाई से नियम लागू करता हो। इससे भारत जैसे देशों के लिए दिक्कत पैदा होती है जो एशिया में हैं और जिसे चीन के नेतृत्व वाले ब्लॉक के साथ कारोबार करना है। जबकि उसके सामने चीन-पाकिस्तान का सैन्य खतरा भी है। उसे अपने पक्ष में पश्चिमी ब्लॉक की जरूरत है। कमजोर वैश्विक नियम हमें बिना किसी एक पक्ष से जुड़े अपने हितों के बचाव की गुंजाइश देते हैं। दूसरी ओर पाकिस्तान और उत्तर कोरिया जैसे देश तथा अफ्रीका के कई देश इसलिए बचे हुए हैं क्योंकि सार्वजनिक स्वीकार्यता वाले नियम उन पर नहीं थोपे जा सकते। ताकत एक ऐसा तत्त्व है जो नियम आधारित व्यवस्था की अनुमति देता है और फिलहाल इसे उभरती ताकतों से चुनौती मिल रही है। चीन का उभार हो चुका है लेकिन रूस दोबारा उभार के प्रयास में है। जापान और जर्मनी दोनों अपने-अपने उभार का प्रयास करेंगे। एक बार अगर जापान और जर्मनी का सैन्यीकरण हो गया तो अमेरिका अपने सहयोगियों के लिए भी नियम नहीं बना पाएगा। नियम निमार्ता के रूप में अमेरिका के दिन अब लदने वाले हैं। भारत के लिए दोहरी चुनौती है। पहला, उसे नियम निमार्ता क्लब का सदस्य बनना है तो उसे अर्थव्यवस्था मजबूत बनानी होगी और आंतरिक रक्षा क्षमता स्थापित करनी होगी। दूसरा, अल्पावधि में यानी हमारे 10 अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के पहले हमें अमेरिका, चीन, रूस और जापान तथा यूरोपीय संघ के साथ सामंजस्य बनाना होगा। अल्पकाल में सामरिक अस्पष्टता चलेगी, बशर्ते दीर्घावधि के लक्ष्य स्पष्ट हों। यदि हम दोनों चुनौतियों का सामना कर सके तो 2030 के दशक तक भारत महाशक्ति बन सकता है। हमें इसी दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। (लेखक स्वराज्य पत्रिका के संपादकीय निदेशक हैं)
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