किशोर न्याय प्रणाली की धीमी रफ्तार— 55 हजार लंबित मामलों का बोझ और भविष्य की चुनौती

 

एबीएन सेंट्रल डेस्क। किशोर न्याय प्रणाली का मूल उद्देश्य है—गलती करने वाले बच्चों को दंड के बजाय सुधार और पुनर्वास की ओर ले जाना। लेकिन आज यही प्रणाली भारी बोझ के नीचे दबी हुई है। देशभर के किशोर न्याय बोर्डों में 55,000 से अधिक मामले लंबित हैं, और 50,000 से ज्यादा किशोर फैसले का इंतजार कर रहे हैं। 

यह स्थिति न केवल न्याय प्रक्रिया की कमजोरियों को उजागर करती है, बल्कि उन बच्चों के भविष्य पर भी गहरा प्रभाव डालती है जो जीवन की सबसे संवेदनशील उम्र में न्याय के इंतजार में हैं। 

सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि 16 से 18 वर्ष आयु वर्ग के किशोरों की संख्या तीन-चौथाई से अधिक है। यह वह उम्र है जब व्यक्तित्व का निर्माण होता है, और किसी भी कानूनी अनिश्चितता का असर जीवनभर उनके साथ चलता है। 

ढांचागत कमियां: सुधार की सबसे बड़ी बाधा 

  • इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2025 ने स्पष्ट किया है कि देश में किशोर न्याय प्रणाली के सामने ढांचागत संसाधनों की भारी कमी है। 
  • कई जिलों में जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड पर्याप्त कर्मचारियों के बिना काम कर रहे हैं। 
  • विधिक-सह-परिवीक्षा अधिकारियों की गंभीर कमी है, जबकि इन्हीं पर किशोरों की सामाजिक पड़ताल और पुनर्वास की जिम्मेदारी होती है। 
  • निरीक्षण गृह, सेफ्टी होम और आब्जर्वेशन होम की संख्या और क्षमता, दोनों ही जरूरत से काफी कम हैं। 
  • देशभर में हुए अपराधों से जुड़े 31,365 मामले आईपीसी या विशेष कानूनों के तहत दर्ज हुए, जिनमें से अधिकांश को जिस गति से निपटाया जाना चाहिए था, वह संभव नहीं हो पाया। 

क्षमता बनाम आवश्यकता: आंकड़े बताते हैं सच्चाई 

  • भारत में 707 जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड हैं, जबकि देश में जिले 765 हैं। यानी कई जिलों में बोर्ड ही मौजूद नहीं है। जिन बोर्डों ने डेटा उपलब्ध कराया है, 
  • उनमें से 362 पर ही यह आंकड़े आधारित हैं—और वहीं 55,000 केस लंबित मिले। 
  • उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे बड़े राज्यों ने जानकारी साझा नहीं की, जिससे वास्तविक संख्या और भी अधिक होने की आशंका है। 
  • मामलों के निपटान की राष्ट्रीय औसत दर सिर्फ 45% है। 
  • मिजोरम ने 79% मामलों का निपटान कर सबसे बेहतर प्रदर्शन किया है। 
  • वहीं ओडिशा केवल 17.4% की दर के साथ सबसे नीचे है। 
  • दिल्ली जैसे बड़े शहरी केंद्र में निपटान की दर राष्ट्रीय औसत से भी कम—41.9%—रही। 
  • दिल्ली में एक विधिक सह-परिवीक्षा अधिकारी पर औसतन 820 मामलों का बोझ है, जो किसी भी कुशल न्याय प्रणाली के लिए असंभव चुनौती है। 

कानून की मंशा और जमीन पर वास्तविकता 

2015 में किशोर न्याय अधिनियम में बदलाव कर प्रणाली को मजबूत और अधिक संवेदनशील बनाने का लक्ष्य रखा गया था। लेकिन एक दशक बाद भी कानून द्वारा अपेक्षित बुनियादी संरचना तैयार नहीं हो सकी। 

इंडिया जस्टिस रिपोर्ट के अनुसार 

  • यह स्थिति दशार्ती है कि बच्चों के अधिकारों की रक्षा करने वाली संस्थाएं अपने लक्ष्य से काफी पीछे हैं। 
  • जब इतने बड़े पैमाने पर केस लंबित हों, तो यह सिर्फ अदालतों की देरी का मामला नहीं है यह उन सभी संस्थागत स्तरों की विफलता है जिन्हें 
  • किशोर के अधिकारों, पुनर्वास और मानसिक विकास का ध्यान रखना था। 

क्या है रास्ता? सुधार के लिए कुछ बुनियादी कदम अनिवार्य हैं 

  • कार्यबल बढ़ाया जाये, खासकर विधिक सह-परिवीक्षा अधिकारियों की संख्या। 
  • जुवेनाइल बोर्डों की संख्या बढ़े, ताकि हर जिले को समुचित न्यायिक सहायता मिले। 
  • आब्जर्वेशन होम और सेफ्टी होम को आधुनिक सुविधाओं से लैस किया जाये। 
  • डिजिटल केस मैनेजमेंट सिस्टम को लागू कर केसों की रफ्तार बढ़ायी जाये। 
    किशोरों के पुनर्वास के लिए काउंसलिंग, शिक्षा और कौशल विकास को प्राथमिकता दी जाये। 

निष्कर्ष : न्याय में देरी का अर्थ है अन्याय 

लाखों बच्चों का भविष्य केवल इसलिए दांव पर नहीं लगना चाहिए क्योंकि हमारी व्यवस्था समय पर निर्णय लेने में सक्षम नहीं है। 55,000 लंबित मामले सिर्फ एक संख्या नहीं हैं ये वे बच्चे हैं जो जीवन के चौराहे पर खड़े हैं और अपने लिए न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। कानून की मंशा तभी पूरी होगी जब किशोर न्याय प्रणाली को संसाधनों, संवेदनशीलता और गति तीनों से सशक्त बनाया जाये। बच्चों का भविष्य इंतजार नहीं कर सकता; व्यवस्था को अब तेजी से जागना ही होगा।

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