गोवर्धन पूजा (अन्नकूट) 22 अक्टूबर को, एक आध्यात्मिक परंपरा का उत्सव

 

  • गोवर्धन पूजा पर्यावरण, प्रकृति और समाज के प्रति श्रद्धा, समर्पण और संतुलन का देता है संदेश : संजय सर्राफ

एबीएन सोशल डेस्क। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग एवं श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि गोवर्धन पूजा दीपावली के बाद कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को मनाई जाती है। इस वर्ष गोवर्धन पूजा एवं अन्नकूट पूजा 22 अक्टूबर दिन बुधवार को मनाया जाएगा। यह पावन पर्व भगवान कृष्ण द्वारा अपने भक्तों पर किए गए आशीर्वाद के प्रति सम्मान प्रकट करता है। 

यह हिंदुओं के हृदय में एक विशेष स्थान रखता है क्योंकि यह उस अवसर का स्मरण कराता है जब भगवान कृष्ण ने अपने भक्तों को प्रकृति के प्रकोप से बचाने के लिए इंद्र के अहंकार का नाश किया था। इस पर्व का संबंध श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से है।

मान्यता है कि द्वापर युग में जब ब्रजवासियों ने हर वर्ष इंद्र देव की पूजा करनी चाही, तब बाल स्वरूप श्रीकृष्ण ने उन्हें गोवर्धन पर्वत की पूजा करने का परामर्श दिया। श्रीकृष्ण का तात्पर्य था कि प्रकृति पर्वत, वन, पशु और जल स्रोत ही हमारे जीवन के वास्तविक आधार हैं। 

इंद्र के क्रोधित होने पर मूसलधार वर्षा हुई, तब श्रीकृष्ण ने अपनी छोटी अंगुली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर ब्रजवासियों की रक्षा की। तब से यह पर्व गोवर्धन पूजा के रूप में मनाया जाता है। गोवर्धन पूजा के दिन भगवान श्रीकृष्ण को विविध प्रकार के व्यंजन- सब्जियां, मिठाइयाँ, अनाज, फल, पकवान आदि का अन्नकूट अर्पित किया जाता है। यह अर्पण कृतज्ञता और प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रतीक है। यह पर्व कृषि और समृद्धि का उत्सव भी है।

प्रातःकाल गोवर्धन (गोबर या मिट्टी से निर्मित प्रतीक पर्वत) की आकृति बनाई जाती है, जिसे फूलों से सजाया जाता है। इसके चारों ओर परिक्रमा की जाती है। फिर भगवान को अन्नकूट अर्पित कर भजन-कीर्तन किए जाते हैं।इस त्यौहार को अन्नकूट भी कहा जाता है जिसका अर्थ है भोजन का पर्वत भक्त कई  व्यंजनों को तैयार करते हैं जिन्हें प्रसाद के रूप में भगवान कृष्ण को अर्पित किया जाता है।

मूर्तियों को स्नान मथुरा के नाथद्वारा जैसे स्थानों पर भगवान कृष्ण की मूर्तियों को दूध से स्नान कराया जाता है नये वस्त्र पहनाए जाते हैं और आभूषणों से सुसज्जित किया जाता है  इस दिन भोजन और मिठाइयां थालियों पर सजाकर भगवान कृष्ण को भोग लगाने के लिए भोजन के पहाड़ बना दिए जाते हैं। यह पर्व सामूहिकता, सहभोज और सामुदायिक एकता का प्रतीक है। गाँवों और मंदिरों में विशेष आयोजन होते हैं। 

अनेक स्थानों पर गोवर्धन परिक्रमा का आयोजन होता है, जिसमें श्रद्धालु हजारों की संख्या में भाग लेते हैं।गोवर्धन पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पर्यावरण, प्रकृति और समाज के प्रति श्रद्धा, समर्पण और संतुलन का संदेश है। यह पर्व हमें यह सिखाता है कि प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करना और उसे संरक्षित रखना ही सच्ची पूजा है।

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