यह पर्व भारतीय संस्कृति की परंपरा, श्रद्धा और मातृत्व के गूढ़ भावों को करता है अभिव्यक्त : संजय सर्राफ

 

टीम एबीएन रांची। झारखंड प्रांतीय मारवाड़ी सम्मेलन के संयुक्त महामंत्री सह श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि हिंदू धर्म में कार्तिक मास का विशेष महत्व होता है। इस महीने में कई महत्वपूर्ण व्रत त्यौहार मनाया जाते हैं। जो सामाजिक, धार्मिक एवं पारिवारिक मूल्यों को सुदृढ़ करते हैं। 

इन्हीं पर्वों में एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्रत है अहोई अष्टमी, यह व्रत हर साल कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। इस वर्ष अहोई अष्टमी व्रत 13 अक्टूबर दिन सोमवार को रखा जाएगा। इस दिन कई शुभ योगों का संयोग बन रहा है शिवयोग, सिद्ध योग, परिघ योग और रवि योग। ये सभी योग व्रत करने वालों के लिए अत्यंत मंगलकारी माने जाते हैं।

अहोई अष्टमी व्रत जिसे विशेष रूप से संतान की दीर्घायु जीवन, कुशलता, सुख-समृद्धि और मंगल भविष्य के लिए माताएं करती हैं। इस दिन माताएं सूर्योदय से पहले आहार लेकर निर्जल व्रत का संकल्प लेती हैं। एवं रात्रि में व्रत खोलती है। 

यह व्रत विशेषकर सात संतान वाली माता अहोई और सिंह (साही) के बच्चों से जुड़ी एक पौराणिक कथा पर आधारित है, जिसमें मातृत्व के अपराध बोध,पश्चाताप और ईश्वर की कृपा का सुंदर चित्रण है। पौराणिक कथा के अनुसार, एक साहूकार की सात बहुएं अपने घर की दीवार पर अहोई माता और सिंह की आकृति बनाकर पूजा करती थीं। एक बार साहूकार की पत्नी ने मिट्टी खोदते समय गलती से एक सिंह के बच्चे को मार दिया। 

अपराध बोध से ग्रसित होकर उसने व्रत का संकल्प लिया और सच्चे मन से अहोई माता की पूजा की। माता ने उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर उसके सभी संकट हर लिए और उसे संतान सुख की प्राप्ति हुई। यह कथा मातृत्व की करुणा, धर्म के प्रति निष्ठा और पश्चाताप के महत्व को दर्शाती है। इस कथा को पूजा के समय अवश्य पढ़ा जाता है। 

प्रातःकाल स्नान कर व्रत का संकल्प लें। व्रती स्त्री निर्जल उपवास करती है। दीवार पर अहोई माता और साही (सिंह) की आकृति चित्रित की जाती है या चित्र लगाकर उसकी पूजा की जाती है।पूजा के लिए धूप, दीप, रोली, चावल, दूध, हलवा-पूरी, और अहोई माता की कहानी की आवश्यकता होती है। संध्या को तारों के दर्शन के बाद व्रत खोला जाता है। 

कुछ स्थानों पर चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत पूर्ण किया जाता है। अहोई अष्टमी न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक संबंधों को मजबूत करने के लिए भी एक महत्वपूर्ण पर्व है। यह पर्व मातृत्व के त्याग और प्रेम को श्रद्धा से अभिव्यक्त करने का माध्यम है। साथ ही यह व्रत संतान के प्रति माता-पिता के उत्तरदायित्व और प्रार्थना की शक्ति का प्रतीक है।

अहोई अष्टमी व्रत भारतीय संस्कृति की परंपरा, श्रद्धा और मातृत्व के गूढ़ भावों को अभिव्यक्त करता है। यह पर्व हमें यह सिखाता है कि निस्वार्थ प्रेम और सच्ची प्रार्थना से हर संकट को टाला जा सकता है। संतान की लंबी उम्र और जीवन में सुख-शांति की कामना के लिए यह पर्व आज भी पूरी आस्था के साथ देशभर में मनाया जाता है।

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