एबीएन सोशल डेस्क। योगाचार्य महेश पाल ने बताया कि आज के समय में जब युवा वर्ग अनेक चुनौतियों और प्रलोभनों से गुजर रहा है, विजयदशमी का आध्यात्मिक महत्व उनके लिए मार्गदर्शक सिद्ध हो सकता है। भारतीय संस्कृति में विजयदशमी (दशहरा) एक अत्यंत पावन और प्रेरणादायक पर्व है। यह पर्व असत्य पर सत्य की, अहंकार पर विनम्रता की और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है।
रामायण में श्रीराम द्वारा रावण का वध और महिषासुर पर माँ दुर्गा की विजय, दोनों ही घटनाएँ हमें यही संदेश देती हैं कि बुराई कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, सत्य और धर्म की शक्ति के आगे उसे झुकना ही पड़ता है।आज का युवा केवल शिक्षा और करियर की ही नहीं, बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों की भी चुनौती से गुजर रहा है।
विजयदशमी इस संदर्भ में उन्हें कई महत्वपूर्ण सीख देती है: आत्म-संयम और अनुशासन की प्रेरणा, रावण विद्वान और शक्तिशाली था, लेकिन उसकी कमजोरी उसका अहंकार था। युवाओं के लिए यह शिक्षा है कि प्रतिभा तभी सफल होती है जब उसमें विनम्रता और अनुशासन जुड़ा हो। यह पर्व सिखाता है कि वास्तविक विजय केवल दूसरों को हराने में नहीं, बल्कि स्वयं को निखारने में है।
विजयदशमी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि जीवन का गहन संदेश देने वाला आध्यात्मिक उत्सव है। यह युवाओं को यह समझाता है कि असली विजय बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक है। जब युवा अपने भीतर के रावण अहंकार, आलस्य, लोभ और क्रोध को पराजित कर देंगे, तभी वे जीवन में वास्तविक सफलता, शांति और संतोष पा सकेंगे। इस प्रकार, विजयदशमी युवाओं के लिए केवल उत्सव मनाने का दिन नहीं, बल्कि आत्मविकास, आध्यात्मिक उत्थान और समाज में सकारात्मक योगदान का एक संकल्प दिवस है।
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