एबीएन सोशल डेस्क। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कुटे बस्ती द्वारा संघ शताब्दी वर्ष के अवसर पर शस्त्र पूजन एवं पथ संचलन कार्यक्रम आयोजित किया गया कार्यक्रम में महानगर कार्यवाह दीपक जी का उद्बोधन प्राप्त हुआ। भाषा, भूषा, भजन, भ्रमण, भोजन शुद्ध स्वदेशी हो। कोई भी भाषा समाज को जोड़ने के लिए हैं, तोड़ने के लिए नहीं।
सभी भाषाओं का संवर्धन करते हुए अपनी मातृभाषा, अपने गांव की भाषा का संवर्धन तथा जिस क्षेत्र में रहते हैं वहां की भाषा का सम्मान वहां की भाषा का संवर्धन करके ही राष्ट्र को एक किया जा सकता है । भारतीय परिधान अर्थात भारतीय वेशभूषा। भजन में भी भारतीयता का भाव सदैव बना रहे। भारतीय भोजन - भारतीय व्यंजन जो कि स्वास्थ्य की लिए भी अच्छा है उनका ही उपयोग करें। भ्रमण के लिए भी अपने स्थानीय और अपने राष्ट्र के क्षेत्र में ही जाएं।
विजयादशमी शक्ति एवं संगठन की साधना तथा मातृशक्ति के सम्मान के संकल्प का अवसर है। हिंदू समाज की दुर्दशा के कारण स्वयं हिंदू समाज की विसंगतियों में ही निहित हैं। हमने अपने स्व को विस्मृत किया जिसके फलस्वरूप हमें सैकड़ो वर्षों की राजनीतिक परतंत्रता झेलनी पड़ी।
आज भी हिंदू समाज के चरित्र में विरोधाभास दिखाई देता है। नवरात्रि के अवसर पर छोटी बालिकाओं की मां दुर्गा के रूप में पूजा करने वाले समाज का एक वर्ग आज भी लिंग परीक्षण कर कन्या भ्रूण हत्या करता है। हम अपने राष्ट्रनायकों का सम्मान तो करते हैं परंतु उनके बताए मार्ग का अनुसरण नहीं करते। भारत माता को परम वैभव के आसन तक ले जाने के लिए हमें अपनी वि संगतियों को दूर करना पड़ेगा। शक्तिहीन होना संसार का सबसे बड़ा पाप है।
भारतवर्ष की कर्मप्रधान संस्कृति विशेषता है यहां प्रत्येक व्यक्ति को साधना-तपस्या का फल प्राप्त होता है इसलिए रावण महिषासुर जैसे दुराचारी लोगों को भी उनकी साधना के कारण वरदान प्राप्त हुए। शक्ति की साधना सबके लिए अनिवार्य है। रावण पर विजय प्राप्त करने के लिए ईश्वर के अवतार भगवान राम को भी शक्ति की उपासना करनी पड़ी। कलयुग में संगठन में ही शक्ति है। हिंदू समाज के संगठन के माध्यम से ही पूरे विश्व में शांति आ सकती है क्योंकि सर्वे भवंतु सुखिनः के ध्येय मंत्र का उद्घोष हिंदू समाज ही करता है।
सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण,कुटुंब प्रबोधन, स्वदेशी का भाव और नागरिक कर्तव्य इन पांच प्रणों की पालकी में बैठकर ही भारत माता परम वैभव के आसन तक जाने वाली है। कोई भी भौतिक अथवा पारलौकिक समृद्धि इन पांच परिवर्तनों की परिधि के बाहर नहीं है।पंच प्रण के विषयों को स्वयं से प्रारंभ कर इन्हें समस्त समाज का आंदोलन बनाना पड़ेगा तभी भारतवर्ष की विजयशालिनी शक्ति जाग्रत होगी
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