एबीएन एडिटोरियल डेस्क (सत्यनारायण गुप्ता)। 2021 में देश में अनाज उत्पादन 30.86 करोड़ टन तक पहुंच गया, जो कि एक रिकॉर्ड है। पिछले कुछ वर्षों के खाद्यान्न उत्पादन के भारतीय ट्रैक रिकॉर्ड को देखें, तो भारत अपनी बढ़ती जनसंख्या को आराम से खिला सकता है और साथ ही साथ चावल और गेहूं का निर्यात भी कर सकता है। लेकिन इसके लिए भारत को कृषि क्षेत्र में बुनियादी सुविधाओं को बढ़ाना होगा। पिछले सात दशकों में भारतीय कृषि ने कई मील के पत्थर पार किये हैं। हरित क्रांति, पावर जेनरेशन, बुनियादी सुविधाओं और कृषि क्षेत्र में नवीन ज्ञान तकनीक अपनाकर भारत ने इस क्षेत्र में प्रगति की है। किंतु आज भी किसानों की औसत मासिक आय इस समय 10,218 है जो 2002 में 2115 की तुलना में अधिक है। पर संतोषजनक नहीं कहा जा सकता। बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, उड़ीसा तेलंगाना, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में किसानों की औसत मासिक आय "10000 से भी कम है। देश के 50.2% किसान कर्ज में डूबे हुए हैं। भारत की पहचान एक कृषि प्रधान देश के रूप में रही है लेकिन देश के बहुत से किसान बेहाल है इसी के चलते पिछले कुछ समय में देश में कई बार किसान आंदोलनों ने जोर पकड़ा है। देश में कृषि भूमि का मालिकाना हक को लेकर विवाद सबसे बड़ा है ।असमान भूमि वितरण के खिलाफ किसान आवाज उठाते रहे हैं। जमीनों का एक बड़ा हिस्सा बड़े किसानों के पास है। किसानों की एक बड़ी समस्या यह भी है कि उन्हें फसल पर सही मूल्य नहीं मिलता, वहीं किसानों को अपना माल बेचने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। कोई किसान सहकारी केंद्र पर किसी उत्पाद को बेचना चाहे तो उसे गांव के अधिकारी से कागज चाहिए होगा। ऐसे में कई बार कम पढ़े लिखे किसानों को औने- पौने दामों पर अपना माल बेचने के लिए मजबूर हो जाते हैं। अच्छी फसल के लिए अच्छे बीजों का होना बेहद जरूरी है। लेकिन सही वितरण तंत्र ना होने के चलते छोटे किसानों की पहुंच में यह महंगे और अच्छे बीज नहीं आ पाते हैं। इसके चलते उन्हें कोई लाभ नहीं मिलता और फसल की गुणवत्ता प्रभावित होती है। भारत का अधिकांश किसान मानसून की अनिश्चितता से प्रभावित है। पंजाब हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के क्षेत्र में सिंचाई के अच्छे इंतजाम हैं। लेकिन देश का एक बड़ा हिस्सा ऐसा भी है जहां कृषि मानसून पर निर्भर है। इसके इतर भूमिगत जल के गिरते स्तर ने भी लोगों की समस्याओं में इजाफा किया है। तमाम मानवीय कारणों से तथा कुछ प्राकृतिक कारण किसानों की परेशानी को बढ़ा देते हैं। वर्षा जल से होने वाला मिट्टी का क्षरण होता है। इसके चलते मिट्टी अपनी उर्वरता खो देती है। मशीनों और आधुनिक कृषि तकनीकों का प्रयोग बड़े किसान करने में सक्षम हैं। लेकिन छोटे और सीमांत किसान पारंपरिक तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। हालांकि आधुनिक कृषि यंत्रों, खाद, कीटनाशक आदि का अधिक प्रयोग भी दीर्घ काल के लिए घातक है। भारत के ग्रामीण इलाकों में भंडारण की सुविधाओं की कमी है। ऐसे में किसानों पर जल्द फसल का सौदा करने का दबाव होता है और कई बार किसान औने-पौने दामों में फसल का सौदा कर लेते हैं। भारतीय कृषि की तरक्की में एक बड़ी बाधा अच्छी परिवहन व्यवस्था की कमी भी है। किसी भी व्यवसाय को पनपने के लिए पूंजी की आवश्यकता होती है। तकनीकी विस्तार ने इस आवश्यकता को और बढ़ा दिया है? लेकिन इस क्षेत्र में पूंजी की कमी बनी हुई है। छोटे किसान महाजनों व्यापारियों से ऊंची दरों पर कर लेते हैं। पिछले कुछ सालों में किसानों ने बैंकों से भी कर लेना शुरू किया है लेकिन हालात नहीं बदले हैं। किसानों की कर्ज माफी पर हाय-तौबा मचाने वाले अर्थशास्त्री उद्योगपतियों की कर्ज माफी और लाखों करोड़ रुपये के एनपीए पर क्यों मौन हो जाते हैं? कितना दुर्भाग्य है कि भारत में प्रतिवर्ष 10,000 से अधिक किसान आत्महत्या करते हैं। 1997 से 2006 के बीच 1,66,304 किसानों ने आत्महत्या की है। वर्ष 2019 में महाराष्ट्र में 2680, कर्नाटक में 1331, आंध्रप्रदेश में 1019, तेलंगाना में 628 और पंजाब में 239 किसानों ने आत्महत्या की थी। 2020 में किसानों की आत्महत्या के मामले 4 प्रतिशत बढ़े हैं। अनेक कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य एमएसपी को कानूनी मान्यता देकर विश्व को राह दिखाना चाहिए। क्योंकि अमेरिका, जर्मनी और फ्रांस जैसे आधुनिक देशों के साथ पूरे विश्व के किसानों की हालत वर्तमान में अच्छी नहीं है। उन्हें अपने फसलों का वाजिब मूल्य नहीं मिल रहा है। एमएसपी की अनिवार्यता को लेकर यह दावा करना कि इससे सरकार पर 12 से 17 लाख करोड़ का बोझ आएगा। तथ्यात्मक रूप से गलत है यह सोचने वाली बात है कि जब केंद्र सरकार वेतन आयोग की सिफारिशों के आधार पर कर्मचारियों का वेतन बढ़ाती है और उस पर 2 से ढाई लाख करोड़ का बोझ हो जाता है तब इस तरह के तर्क अप्रासंगिक हैं। फिर इस बात को नजरंदाज क्यों किया जा रहा है कि एम एस पी पर खरीदे गए सारे अनाज का सरकार मुफ्त वितरण तो नहीं करती, उसकी कुछ मात्रा बेचती भी है। फिर जनवितरण प्रणाली और मनरेगा आदि में लोगों को अनुदानित मूल्य पर अनाज उपलब्ध कराकर सरकार स्वयं इसका श्रेय लेती है तो किसानों को उनकी ऊपज का लाभ दायक मूल्य देने में इसे क्या परेशानी है ।इसी तरह मंडियों की व्यवस्था में बदलाव की आवश्यकता है। किसानों को मंडी के पास जाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए, बल्कि मंडी को किसानों के नजदीक लाने की जरूरत है पूरे देश में महज 7000 मंडियां हैं जबकि 40000 मंडियों की जरूरत है। इसी तरह सहकारी व्यवस्था को भी आगे लाया जाना चाहिए। पंजाब व हरियाणा में किसानों की आय अधिक है क्योंकि यहां अधिकांश खरीद एमएसपी पर होती है, जबकि पंजाब में बिकने के लिए बिहार जैसे राज्यों से अनाज जाता है। इस बार हम किसानों की खुशहाली में अपने स्तर से भी योगदान देने का संकल्प लें। कृषि व्यवसाय तथा किसानों का सम्मान करें तथा प्याज और टमाटर के भाव बढ़ने पर नाक-भौंह न सिकौडें। सरकार,आम जनता तथा किसानों को मिलकर मुंशी प्रेमचंद के इस कथन को गलत सिद्ध करने के लिए प्रयास करना होगा। भारतीय किसान गरीबी में जन्म लेता है, गरीबी में जीता है और गरीबी मेंही इस दुनिया को छोड़ देता है।
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