एबीएन एडिटोरियल डेस्क। अर्थव्यवस्था को लेकर अलग-अलग रुख अपनाया जा रहा है और सत्ताधारी दल की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाएं इतनी ज्यादा हैं कि उनकी अनदेखी करनी संभव नहीं है। नरेंद्र मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के आरंभ से ही यह स्पष्ट रहा है कि सरकार के लिए राजनीति अर्थव्यवस्था से ऊपर है। आर्थिक नीति अपनाते हुए बड़े पैमाने पर राष्ट्रीयकरण किया, प्रतिबंधात्मक श्रम कानून बनाए और तथा ऐसे ही अन्य कानून पारित किये। उन्होंने भू-कानूनों को भी कड़ा किया। अर्थव्यवस्था आज तक राजनीति को दी गयी उस वरीयता की कीमत चुका रही है।
क्या इतिहास अपने आपको दोहरायेगा? बड़े बदलाव टुकड़ों में नहीं आते हैं और फिलहाल काफी कुछ छिटपुट तरीके से हो रहा है। यह सब उस नयी बहस का हिस्सा हो सकता है जिसमें राष्ट्रीय नागरिक पंजी द्वारा संभावित अशांति भी शामिल है। भाजपा चाहे जितनी दबदबे वाली पार्टी बन गयी हो, घरेलू राजनीतिक हालात दर्शाते हैं कि केंद्र और राज्य के स्तर पर तस्वीर एकदम विरोधाभासी है। भाजपा के लिए चुनौतियां लगातार बरकरार हैं। इसके परिणाम का अनुमान नहीं लगाया जा सकता है।
पूर्वोत्तर में इनर लाइन जैसी परिवर्ती व्यवस्था अब स्थायी स्वरूप ले रही है और इसका विस्तार हो रहा है। इससे देश नये तरीके से बंट रहा है। असम में नये सिरे से समस्या शुरू हो गयी है जबकि कश्मीर में आम जनता लगातार पांचवें महीने तमाम प्रतिबंधों से गुजर रही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखा जाए तो पश्चिम के उदार लोकतांत्रिक देशों ने जिन वजहों से अधिनायकवादी चीन पर भारत को तवज्जो दी थी और उसके साथ आपसी रिश्ते कायम किये उन पर भी अब सवालिया निशान लग गये हैं। अमेरिका और यूरोप में आलोचना की जा रही है जो आगे और बढ़ेगी।
पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश में प्रतिक्रिया नजर भी आने लगी है। कमजोर भारतीय अर्थव्यवस्था के चलते चीन से मिल रही चुनौती का सामना करना मुश्किल होता जायेगा, क्योंकि उसने भारत की तरह अपनी गति नहीं खोयी है। दुनिया की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था के नाते भारत आकर्षक बाजार बना रहेगा लेकिन उसने जो गति खो दी उसका असर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नजर आयेगा।
आर्थिक कूटनीति के मामले में हालात उलट गये हैं जिससे हम अप्रभावित नहीं रह सकते। सन 2020 में अर्थव्यवस्था में कुछ हद तक सुधार की अपेक्षा की जा सकती है लेकिन तत्काल पहले जैसी तेज आर्थिक वृद्धि हासिल करने की राह में बड़ी बाधाएं हैं। वित्तीय क्षेत्र की दिक्कतें कायम हैं और छोटे और मझोले उपक्रम संघर्षरत हैं। कृषि के मोर्चे पर दिक्कत है और निर्यातक मुद्रा नीति के कारण परेशानी में हैं।
वृहद आर्थिक मोर्चे पर बात करें तो राजकोषीय स्थिति बुरी है क्योंकि केंद्र अपने बिल तक चुकाने की स्थिति में नहीं है। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी)में कुछ बुनियादी समस्या हैं जो कर के मोर्चे पर भी दिक्कतदेह बनी हुई हैं। चुनाव पूर्व कर दरों में कमी ने हालात और खराब किए। मौद्रिक नीति की अपनी सीमाएं हैं और बहुत अधिक गुंजाइश नजर नहीं आ रही।
जीएसटी राजस्व में कमी के कारण सरकार की निजी बेहतरी की प्रतिबद्धताएं अब मुश्किल में हैं। इनमें चुनाव पूर्व किसानों को धन राशि देने का वादा भी शामिल है। परिवहन के बुनियादी ढांचे में भारी निवेश से भी अपेक्षित प्रतिफल नहीं मिला जबकि बिजली क्षेत्र में अव्यवहार्यता बरकरार है। सरकार को इस पर अधिक ध्यान देना चाहिए।
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