उपासना का तत्व दर्शन और स्वरूप युग साहित्य का स्वाध्याय व पाठ-संवाद आरंभ

 

उपासना-प्रार्थना को दैनिक जीवन में स्थान मिले, उपासना में प्रार्थना का बड़ा महत्व है : महिला मंडल 

एबीएन सोशल डेस्क। गायत्री परिवार राष्ट्र स्तरीय आनलाइन स्वाध्याय-सत्संग में युग ऋषि परमपूज्य गुरुदेवश्री की पुस्तक उपासना का तत्वदर्शन और स्वरूप पर सुबह आनलाइन स्वाध्याय पाठ व संवाद चल रहा है। इस युग साहित्य के माध्यम से आज बताया गया कि मनुष्य जीवन का चिर साध्य है आत्म-शांति, जिसका आधार है-- वे श्रेष्ठताएं जो परमात्मा के स्वाभाविक गुण हैं और उन्हें उपासना के आधार पर ही पाया जा सकता है, किंतु सच्ची उपासना वह है, जो केवल उपासना के लिए निष्काम होकर की जाए।

निष्काम रूप से उपासना प्रारंभ कर परमात्मा से आत्मा का संबंध स्थापित करिये और श्रेष्ठताओं की उपलब्धि कर सुख-शांति के अक्षय आनंद से भरे जीवन और अनंत आनंद की परख कीजिए। बताया गया कि हमारा प्रत्येक भाव, विचार क्रिया और वस्तु उपासना का स्वरूप बन जाए, इस उच्च स्थिति को पाने तक हमारा पावन कर्त्तव्य है कि हम प्रतिदिन सच्चे और गहरे मन से परमात्मा की थोड़ी-थोड़ी उपासना नित्य निरंतर करते चलें। 

यह थोड़ी-थोड़ी उपासना भी जब हमारे जीवन में अनिवार्य आवश्यकता बनकर हमें लाभान्वित करेगी। पाठ-संवाद में बताया कि परमात्मा समस्त सत्प्रवृत्तियों एवम् अनंत शक्तियों का केंद्र है। जब जीव विभु, बनना चाहता है, तो उसे अपने सामने एक आदर्श उपस्थित रखना होता है, जो परमात्मा का सच्चे मन से जितना-जितना चिंतन करता है, वह उसी अनुपात से परमात्मा के गुणरूप में बदलता जाता है। 

जीवन का लक्ष्य आत्मोत्कर्ष है, उसकी पूर्ति में परमात्मा का स्मरण-चिंतन एवं भजन-पूजन आवश्यक संबल सिद्ध होता है। आज स्वाध्याय में करीब तीन दर्जन साधक-शिष्य भाई-बहन शामिल रहे। स्वाध्याय के शुभारंभ में गुरु-ईश ध्यान नमन वंदन और अंत में सर्वत्र मंगलकारी शांतिपाठ कर समापन हुआ। उक्त जानकारी गायत्री-परिवार के मीडिया प्रचारक जय नारायण प्रसाद ने दी।

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