एबीएन सेंट्रल डेस्क। पीएम मोदी ने मध्य प्रदेश के आनंदपुर में स्वामी अद्वैतानंद की चर्चा करते हुए कहा कि आधुनिक काल में जिस प्रकार समाज को स्वामी जी ने प्रेरित किया उसका दूसरा उदाहरण नहीं मिलता है। पीएम ने जिस महान संत, तत्वज्ञानी की चर्चा की उनकी भक्ति धारा को वर्तमान में मुख्य स्थान ब्रह्म विद्यालय आश्रम छोटका राजपुर, जिला बक्सर गंगा नदी के तट पर स्थित है। स्थान के वर्तमान पदासीन 108 स्वामी सत्यानंदजी परमहंस जी पूरे देश में फैला रहे हैं। स्वामी जी छोटका राजपुर, बक्सर स्थित ब्रह्म विदयालय आश्रम के मुख्य केंद्र से पूरे देश में स्थित आश्रम जिसे कुटी कहा जाता है उसका संचालन कर रहे हैं।
स्वामी अद्वैतानंद जी का जन्म छपरा के दहियामा में रामनवमी के दिन 1846 में हुआ था। इनके पिता का नाम तुलसीराम पाठक और दादा जी का नाम ख्यालीराम जी पाठक था। उनके जन्म स्थान पर एक स्मारक बनाने की प्रकिया चल रही है जो ब्रह्म विद्यालय सह आश्रम के तत्कालिन पदाशीन स्वामी सत्यानंद जी परमहंस द्वारा किया जा रहा है। नौ माह के जीवन में माता के निधन के बाद लाला नरहर दास और उनकी पत्नी को सौप दिया जिन्होंने उनका लालन पालन किया। इनका बचपन का नाम रामनवमी को जन्म लेने के कारण रामयाद पड़ा।
बचपन में इन्हें अरबी और संस्कृत की शिक्षा लाला देवी प्रसाद से प्राप्त की। पांच साल की उम्र में इनके पिता तुलसीराम पाठक का भी निधन हो गया। बचपन से ही इनकी भक्ति में प्रगाढ़ रूचि थी। सतसंग में इनका मन लगता था। योग चर्चा में कुछ प्रकिया जानकर वे नौ वर्ष के उम्र में ही साधना के बल पर ध्यानस्थ होने और शरीर को भूमि से उपर उठा लेने की सिद्वि प्राप्त कर ली जिसे देखकर छपरा के लोग चकित रह गये। लोगों ने इन्हें इस अभ्यास को फिर न करने की सलाह दी। लाला साहब के निधन के बाद उनका मन संसार से विरक्त हो गया और इन्होंने इस अल्पआयु में वैराग्य का निश्चय किया।
इनके पिता ने केदारघाट काशीवाले श्री परमहंस जी से ब्रम्हविद्या का उपदेश लिया था। अद्वैतानंद जी ने उनसे ब्रम्हा विद्या की दीक्षा ली। लेकिन दो परिवार के एक मात्र वारिश थे और बड़ी संपति के अधिकारी थे। गुरु ने भी पालनहार माता के रहते सन्यासी बनने का आदेश नहीं दिया। गुरुजी, संत अद्वैतानंद जी को बचपन में हापू कहकर पुकारते थे। जबकि लोग उन्हें रामयाद कहकर पुकारते थे। लेकिन लालाजी के मौत के तीन साल बाद उनकी पत्नी का निधन हो गया। संत अद्वैतानंद जी अपनी अंतिम जबावदेही का पूरी निष्ठा से पालन कर अंतिम संस्कार किया। तब उनकी उम्र 17 साल थी।
परिजनों ने घर में रहने का दबाव बनाया लेकिन वे सन्यास धारण कर छपरा से बक्सर पहुंचे।
बक्सर से नौहट्टा होतु हुए वे अकबरपुर के जंगल में पहुंच गये। जंगल में जानवरों के साथ अवधूत की तरह बिना वस्त्र के रहने लगे। उन पर एक पुलिस इंस्पेक्टर बालमुकुंद सिंह ने उन्हें देखकर समझ लिया की कोई तपस्वी है। वह सदैव उनकी सेवा में तत्पर रहने लगे। छह वर्ष वहां बिताकर वे वहां से डुमरांव चले आये। वहां उन्होंने संकल्प लिया कि रमता जोगी बहता पानी ठहरे गंदला होय। किसी भी स्थान पर तीन दिन से अधिक न ठहरने की प्रतिज्ञा कर ली। वहां से वे महाराजगंज, बढ़पुर, बेसपुर, विलौटू, आरा, बेहरा, खगोल, दानापुर, बांकीपुर, लोदी कटड़ा आदि स्थानों पर भ्रमण करते हुए पटना पहुंचे।
इस प्रकार लगभग चार वर्ष तक भ्रमण करते हुए बलिया, गाजीपुर, सारण, चंपारण भ्रमण करते हुए संवत 1920 से 1936 तक का समय व्यतीत किया।
इस बीच संत महात्माओं के साथ रहे। फिर वे अयोध्या, मथुरा, वृदावन गये। जहां उन्हें महान संतो का सानिध्य मिला। इसके बाद वे संवत 1940 में जयपुर गये जहां स्वामी आंनदपुरी से उनकी मुलाकात हुई। आंनदपुरी एक गुमास्ता के पुत्र थे जो बड़ी संपति ठुकराकर वैराग्य धारण कर चुके थे। उन्होंने संत अद्वैतानंद जी को अपना उत्तराधिकारी बता कर शरीर त्याग दिया।
लगभग 22 वर्ष तक जयपुर में भक्ति फैलाने के बाद एक दिन दिवान भगवानदास ने संत अद्वैतानंद जी को टेरी चलने का आग्रह किया। टेरी दिवान जी का जन्म स्थान था। संवत 1956-57 में वे टेरी पहुंचे। वहां स्वामी जी थोड़ें समय में ही प्रसिद्ध हो गये। टलबुलंद, कोहाट, पेशावर, बन्नू, लक्की पर्वत, डेरा इस्माईलखां, जट्टा और लाची सहित देश के बड़ें हिस्से से लोग उनका सत्संग सुनने आने लगे। टेरी में सर्दी अधिक पड़ती थी। 11 फरवरी सन 1915 को उन्हें पक्षाघात का शिकार हो गये।
टेरी में 13 जनवरी को उन्होंने आश्रम के काम योग्य शिष्यों के बीच बांट दिया। 15 जून 1919 को अन्न त्याग दिया। पांच जुलाई को अपनी मृत्यु की घोषणा कर दी और गुरुवार आसाढ़ शुक्ल द्वादशी संवत 1976 विक्रमी सन 10 जुलाई 1919 को सुबह 6 बजे प्राण त्याग दिया। भक्त हरिचंद के मकान में ही पवित्र समाधि दी गयी। वर्तमान समय में ब्रह्म विद्यालय आश्रम छोटका राजपुर ब्रह्म विद्या का केन्द्र है जिसकी स्थापना 1008 स्वामी शिवधंर्मानंद जी परमहंस ने की है।
उनकी इच्छा थी कि छपरा की भक्ति छपरा पहुंचे और वर्तमान स्वामी सत्यानंद जी परमहंस ने स्वामी अद्वैतानंद जी के छपरा और उनके नानी घर नंद पुर में ब्रह्म विद्यालय सह आश्रम स्थापित कर गुरुदेव की इच्छा को पूरा किया। इस स्थान पर स्वामी अद्वैतानंद जी के जन्म दिवस पर स्वामी सत्यानंद जी के नेत्त्व में पदयात्रा निकाली जाती है। यह पद यात्रा परमहंस दयाल के जन्म दिन के अवसर पर उनके नानीघर नंदपुर से दहियांवा स्थित उनके जन्म स्थल तक आयोजित होती है।
ब्रह्म विद्यालय सह आश्रम के वर्तमान स्वामी सत्यानंदजी परमहंस के नेतृत्व में यह धार्मिक आयोजन किया जताा है। जिसमें पूरे देश से भक्त शामिल हुए। आज भी देश में स्वामी अद्वैतानंद जी की छपरा से टेरी तक और टेरी से छपरा लौटने की भक्ति यात्रा भारतीय सत्य सनातन के दसनामी तत्व ज्ञान और सन्यास धर्म को जीवित रखा है।
दौ सौ साल से यह भक्ति की धारा को स्वरूपानंद जी महाराज जन्म 1884 मृत्यु 1936 आत्मविवकानंद जी महाराज जन्म 1864 से मृत्यु 1949 शिवधमार्नंद जी जन्म 1907 से 20 मार्च 1999 तक और वर्तमान में स्वामी सत्यांनद जी परमहंस 1999 से से वर्तमान में पदासीन है। वर्तमान में इसका मुख्य आश्रम स्थान छोटका राजपुर जिला बक्सर गंगा तट के किनारे स्थित है। इसकी स्थापना स्वामी शिवधर्मानंद जी ने की है। पाकुड़, गढ़वा, जमशेदपुर, बोकारो, रांची में स्थित आश्रम सहित पूरे देश में इस मत के अनुआयी इन्हें अध्यात्मिक सदगुरु मानते हैं।
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