...और उन्हें दीवार में चुनवा दिया गया

 

शहीद हो गये पर धर्म नहीं बदला : ज्ञानी सुंदर सिंह

टीम एबीएन, पलामू। देश भर में गुरु गोविंद सिंह जी के दो छोटे साहिबजादों, बाबा जोरावर सिंह और बाबा फतेह सिंह के शहादत दिवस पर वीर बाल दिवस मनाया जाता है, जिन्होंने नन्ही उम्र में भी धर्म और सिद्धांतों की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया था।

उन वीर सपूतों के शहादत पर प्रकाश डालते हुए गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह सभा के ग्रंथी ज्ञानी सुंदर सिंह जी ने आज गुरुद्वारे में शबद कीर्तन के दौरान बताया कि गुरु गोविंद सिंह जी के दो छोटे साहिबजादों, बाबा जोरावर सिंह और बाबा फतेह सिंह के शहादत दिवस को वीर बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है। सिखों के दसवें गुरु गुरु गोविंद सिंह और उनके बेटों की शहादत का भारतीय सिख इतिहास और भारतीय संस्कृति में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।

देश भर में गुरु गोविंद सिंह जी के दो छोटे साहिबजादों, बाबा जोरावर सिंह और बाबा फतेह सिंह के शहादत दिवस पर वीर बाल दिवस मनाया जाता है। उनको श्रद्धांजलि दी जाती है, जिन्होंने नन्ही उम्र में भी धर्म और सिद्धांतों की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया था। यह विश्व का एक कीर्तिमान है की मात्रा 7 और 9 वर्ष की आयु के बच्चे अपने सनातन धर्म को बचाने के लिए शहीद हो गये और अनगिनत यातनाएं सही।

सिखों के दसवें गुरु गुरु गोविंद सिंह नौवें गुरु श्री तेगबहादुर के पुत्र थे। मुगलों के शासनकाल में साल 1675 में सभी शंकराचार्य एवं प्रकाटड  पंडितों की फरियाद पर श्री गुरु तेगबहादुर जी ने दिल्ली में अपना सर्वोच्च बलिदान दे दिया था। इसके बाद श्री गुरु गोविंद सिंह जी 11 नवंबर 1675 को दसवें गुरु के रूप में गुरु गद्दी पर आसीन हुए थे।

उन्होंने धर्म और समाज की रक्षा के लिए साल 1699 ई. में खालसा पंथ की स्थापना की थी। पांच प्यारों को गुरु का दर्जा देकर स्वयं उनके शिष्य बन गये थे।  उनके बड़े साहिबजादे बाबा अजीत सिंह और बाबा जुझार सिंह ने चमकौर के युद्ध में शहादत हासिल की। यह साल 1705 की बात है।

मुगलों ने गुरु गोविंद सिंह जी से बदला लेने के लिए सरसा नदी के किनारे हमला किया तो गुरु का परिवार उनसे बिछड़ गया था। गुरु से बिछड़ने के बाद माता गुजरी अपने रसोइए गंगू के साथ छोटे साहिबजादों बाबा जोरावर सिंह और बाबा फतेह सिंह को लेकर उसके घर मोरिंडा चली गयी थीं।

गंगू ने अपने घर में माता गुजरी के पास मुहरें देखीं तो उसके मन में लालच आ गया। उसने माता गुजरी और दोनों साहिबजादों को सरहिंद के नवाब वजीर खान के सिपाहियों के हाथों पकड़वा दिया था। तब साहिबजादों बाबा जोरावर सिंह और बाबा फतेह सिंह की उम्र सात और पांच साल ही थी।

सरहिंद के नवाज वजीर खान ने दोनों साहिबजादों बाबा जोरावर सिंह और बाबा फतेह सिंह को खुले आसमान के नीचे कैद कर दिया था। माता गुजरी भी साथ थीं।  पूस की सर्द रात में चारों ओर से खुले ऊंचे बुर्ज पर भी माता गुजरी जी अपने दोनों छोटे साहिबजादों को धर्म की रक्षा के लिए सिर न झुकाने और धर्म न बदलने का ही पाठ पढ़ाती रहीं। 

यही सीख देकर माता गुजरी जी नन्हे साहिबजादों को वजीर खान की कचहरी में भेजती थीं। वजीर खान ने कचहरी में दोनों साहिबजादों से धर्म बदलने के लिए कहा पर उन्होंने जो बोले सो निहाल सत श्री अकाल के जयकारे लगा कर धर्म बदलने से मना कर दिया था।  इस पर वजीर खान ने दोनों को धमकी दी थी कि कल तक धर्म बदल लो या फिर मरने के लिए तैयार रहो।

अगले दिन दोनों साहिबजादों को  एक बार फिर से वजीर खान ने दोनों से  सनातन धर्म बदलने के लिए कहा, लेकिन छोटे साहिबजादों ने इनकार कर दिया और एक बार फिर से जयकारे लगाने लगे। यह सुन कर वजीर खान गुस्से में आ गया और दोनों साहिबजादों को जिंदा दीवार में चुनवाने का आदेश दे दिया। तारीख थी 26 दिसंबर 1705. इन महान सपूतों को दीवार में जिंदा चुनवा दिया गया था।

उन्हीं साहिबजादों की शहादत को नमन करने के लिए सिख समुदाय ने हर साल वीर बाल सप्ताह मनाना शुरू किया। इसमें 26 दिसंबर का दिन उनकी शहादत को समर्पित है आज के दिन गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह सभा डाल्टनगंज में विशेष दीवान का आयोजन किया गया जिसमें तमाम शहीदों को समर्पित श्रद्धा सुमन भेंट किय गये और उनके लिए विशेष प्रार्थना की गयी।

कार्यक्रम में संबोधित करते हुए इंद्रजीत सिंह डिंपल ने बताया कि आज पुनः वह समय आ गया है जब हमारा सनातन खतरे में है और अनेक प्रकार की शक्तियां हमे धर्म- भ्रष्ट और समाप्त करने पर प्रयासरत है। हमें अपने धर्म में रहकर अपनी गृहस्थी में कायम रहना है। सदा और सच्चा जीवन व्यतीत करके देश और धर्म की सेवा करनी है। आज वीर बाल दिवस के अवसर पर उन तमाम शहीदों को यही हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

इसके पश्चात गुरु का लंगर का वितरण सरदार जगजीत सिंह रेडमा परिवार की ओर से हुआ जिसे उपस्थित संगत ने ग्रहण किया ।आज के मुख्य दीवान में सैकड़ो की संख्या में सिख धर्मावली और शहर के गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

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