जीएसटी के सफलतापूर्ण सात साल पूरे

 

एबीएन सेंट्रल डेस्क। देश की अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव हुए सात वर्ष बीत चुके हैं। इस बदलाव के तहत ही वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी प्रणाली लागू की गयी थी। जीएसटी के अंतिम स्वरूप के बारे में बहुत कुछ ऐसा था जो एक तरह का समझौता था। इसमें केंद्र सरकार और संदेह करने वाले राज्यों के बीच का समझौता भी शामिल था। उस समय माना जा रहा था कि ये समझौते जीएसटी के सुधारों को सीमित करेंगे।

इस समाचार पत्र समेत कई लोगों को उम्मीद थी कि समय के साथ जीएसटी के भीतर की ढांचागत दिक्कतें दूर कर दी जायेंगी और इसका पूरा लाभ मिलना शुरू हो जायेगा। परंतु सात वर्ष और दो आम चुनाव बीतने के बाद भी यह स्पष्ट है कि व्यवस्था में बुनियादी सुधार के लिए और अधिक प्रयास करने की आवश्यकता है। 

जीएसटी की निगरानी जीएसटी परिषद करती है। यह राज्यों और केंद्र सरकार के वित्त मंत्रालयों को एक साथ लाती है। बीते सप्ताहांत परिषद की बैठक हुई लेकिन इस बार भी जीएसटी में अहम सुधारों के गहरे प्रश्न आगे की बैठकों के लिए टल गये। कहने का अर्थ यह नहीं है कि परिषद ने अहम काम नहीं किये।

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संकेत दिया कि जीएसटी परिषद द्वारा लिये गये निर्णयों में मांग नोटिस को चुनौती देने के तरीके और अपील में बदलाव तथा अनुपालन व्यवस्था में अन्य सुधार शामिल हैं। उदाहरण के लिए अगर किन्हीं मामलों में धोखाधड़ी नहीं हुई है तो उनमें ब्याज या जुर्माना नहीं मांगा जायेगा और विभाग अपने विरुद्ध निर्णयों के खिलाफ स्वत: ऊपरी अदालतों में अपील नहीं करेगा। 

बल्कि ये संशोधित मौद्रिक सीमा के अधीन होंगे। चूंकि दो फीसदी आकलनों को चुनौती दी जा रही है इसलिए ऐसे बदलाव बहुत अधिक महत्त्व रखते हैं। जीएसटी को लेकर एक वादा यह था कि इसका इस्तेमाल सुगम होगा। परंतु ऐसा अपेक्षित स्तर पर नहीं हुआ है। अब वक्त आ गया है कि जीएसटी के बुनियादी ढांचे में सुधार करने का प्रयास किया जाए। 

यह सवाल उठाया जाना चाहिए कि राज्य और केंद्र सरकार के स्तर पर दोहरा ढांचा क्यों होना चाहिए? जीएसटी के अधूरे एजेंडे में दरों और स्लैब को युक्तिसंगत बनाया जाना भी शामिल है। अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था की प्रारंभिक परिकल्पना एक दर के साथ की गयी थी। जिससे स्पष्टता और किफायत सुनिश्चित होती। परंतु इसकी जगह कई दरें पेश की गईं और जीएसटी परिषद भी इन दरों में लोकलुभावन ढंग से बदलाव करने का मोह नहीं त्याग पायी। 

यहां तक कि पिछली बैठक में भी बॉक्स पैक करने पर लगने वाली दर को 18 फीसदी से कम करके 12 फीसदी कर दिया गया। ऐसे बदलावों के बाद इस प्रकार और मांग सामने आने की आशंका बढ़ जाती है और परिषद का समय भी बरबाद होता है। बहरहाल, परिषद ने वादा किया था कि पेट्रोल और डीजल को जीएसटी व्यवस्था में लाने के विषय में चर्चा की जायेगी। 

अल्कोहल की तरह इन पर भी फिलहाल राज्यों द्वारा कर लगाया जाता है। व्यवस्था के भीतर लागत और अक्षमता की एक बड़ी वजह यह भी है। उन्हें जीएसटी के दायरे में लाना बहुत लंबे समय से लंबित है। इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि जीएसटी क्षतिपूर्ति उपकर अधिशेष का क्या होगा जिसकी राशि 70,000 करोड़ रुपये तक हो सकती है। यह उपकर तंबाकू, महंगे वाहनों आदि पर लगाया जाता है। 

इस उपकर को लगाने की एक आंशिक वह यह भी थी कि महामारी के दौरान राज्यों की ओर से लिये गये ऋण को चुकाने में इसका इस्तेमाल किया जाये। परंतु लग रहा है कि काफी अधिक राशि बची रह जाएगी। इसके उपयोग को लेकर चर्चा टलती रही है। इसके इस्तेमाल को लेकर बहस होना स्वाभाविक है लेकिन इसके चलते जीएसटी सुधार से जुड़े अहम प्रश्नों को हल करने में देरी नहीं होनी चाहिए।

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