एबीएन एडिटोरियल डेस्क। यह इंदिराजी की अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, तत्कालीन थल सेनाध्यक्ष मानिकशॉ की सैन्य रणनीति और आमलोगों की दृढ़ इच्छाशक्ति और संकल्पशक्ति से संभव हुआ था। 16 दिसंबर, 1971! शाम के साढ़े चार बजे थे। भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा हेलिकॉप्टर से ढाका हवाई अड्डे पर उतरे।अरोडा़ और पाकिस्तान सेना के जेनरल एएके नियाजी एक मेज के सामने बैठे और दोनों ने पाकिस्तानी सेना द्वारा भारतीय सेना के समक्ष आत्म-समर्पण के दस्तवेज पर हस्ताक्षर किए। नियाजी ने अपने बिल्ले उतारे और अपना रिवॉल्वर जनरल अरोड़ा के हवाले कर दिया। नियाजी की आंखों में आंसू थे। इसके साथ ही, आधुनिक हथियारों और सैन्य साजोसामान से लैस पाकिस्तान के 93,000 सैनिकों ने भारतीय सेना के अदम्य साहस और वीरता के आगे घुटने टेक दिए थे। इंदिरा गांधी संसद भवन के अपने दफ्तर में एक टीवी इंटरव्यू दे रही थीं। तभी जनरल मानिकशॉ ने उन्हें बांग्लादेश में मिली शानदार जीत की खबर दी।इंदिरा गांधी ने लोकसभा में शोर-शराबे के बीच घोषणा की कि युद्ध में भारत को विजय मिली है। इंदिरा गांधी के बयान के बाद पूरा सदन जश्न में डूब गया। भीड़ नियाजी को मार डालना चाहती थी, लेकिन भारतीय सेना ने उन्हें जीप पर बैठाया और सुरक्षित जगह पर ले गई।इसके बाद 17 दिसंबर को 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों को युद्धबंदी बनाया गया। 17 दिसंबर, 1971 को भारत और भूटान द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ में बांग्लादेश को राजनयिक मान्यता दिए जाने से दुनिया के मानचित्र में नए राष्ट्र बांग्लादेश का अभ्युदय हुआ। इसकी पटकथा पिछले एक वर्ष से लिखी जा रही थी। 7 दिसंबर, 1970 को पहली बार पाकिस्तान में संसद-(मजलिस-ए-शूरा)-के लिए आम चुनाव हुए थे। तब पाकिस्तान दो हिस्सों में बंटा था-पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) और पश्चिमी पाकिस्तान। मुख्य मुकाबला था-जुल्फिकार अली भुट्टो की नेतृत्व वाली पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और शेख मुजीबुर्रहमान के नेतृत्व वाली अवामी लीग में। पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जेनरल याह्या खान और भुट्टो की उम्मीदों के खिलाफ अवामी लीग ने बहुमत हासिल कर लिया। स्वाभाविक है, अवामी लीग के नेता शेख मुजीबुर्रहमान ने सरकार बनाने का दावा पेश किया। जिसे खान ने स्वीकार नहीं किया। नतीजा, तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में गृहयुद्ध की स्थिति पैदा हो गई। पाकिस्तान के सैनिक तानाशाह याहिया खां ने 25 मार्च,1971 को शेख मुजीब को गिरफ़्तार कर पूर्वी पाकिस्तान की जन भावनाओं को सैनिक ताकत से कुचलने का आदेश दे दिया। अगले ही दिन, तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के लोगों ने मुजीबुर्रहमान की ओर से बांग्लादेश की स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। आज भी बांग्लादेश अपना स्वतंत्रता दिवस समारोह प्रति वर्ष 26 मार्च को ही मनाता है। बांग्लादेशियों ने मुक्ति बाहिनी का गठन किया और पश्चिमी पाकिस्तान की सेना का मुकाबला किया।पूर्वी पाकिस्तान में मुक्तिबाहिनी गुरिल्लाओं ने पाकिस्तानी सैनिकों के खिलाफ लड़ने के लिए भारतीय बलों के साथ हाथ मिलाया। उन्होंने भारतीय सेना से हथियार और प्रशिक्षण प्राप्त किया।सैन्य कार्यवाही में बेतहाशा कत्लेआम हुआ। पाक सेना द्वारा किए जा रहे जुल्मों के चलते लाखों शरणार्थियों ने भारत की ओर रुख किया। तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना के दुर्व्यवहार की खबरें भारत आने लगीं तो जनभावना के दबाव में भारत ने बंगाली शरणार्थियों के लिए अपनी सीमाएं खोल दी। अप्रैल, 1971 में बांग्लादेश से भारत आने वाले शरणार्थियों की तादाद इतनी बढ़ गई कि सीमावर्ती राज्यों ने अपने हाथ खड़े कर दिए। तब भारत सरकार पर यह दबाव पड़ने लगा कि वह वहां पर सैन्य हस्तक्षेप करे। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अप्रैल में आक्रमण करने का मन बना लिया था। उन्होंने थल सेनाध्यक्ष जनरल मानेकशॉ की राय ली। 3दिसंबर, 1971 को इंदिरा गांधी तत्कालीन कलकत्ता में एक जनसभा को संबोधित कर रही थीं। इसी दिन शाम के वक्त पाकिस्तानी वायुसेना के विमानों ने भारतीय वायुसीमा को पार कर पठानकोट, श्रीनगर, अमृतसर, जोधपुर, आगरा आदि सैनिक हवाईअड्डों पर बम गिराना शुरू कर दिया। इंदिरा गांधी ने उसी वक्त दिल्ली लौटकर मंत्रिमंडल की आपात बैठक की।भारतीय सेना ने जवाबी कार्रवाई की और कई हजार वर्गकिलोमीटर पाकिस्तानी क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। भारतीय नौसेना के पश्चिमी नौसेना कमान ने 4-5 दिसंबर की रात कोडनाम ट्राइडेंट के तहत कराची बंदरगाह पर एक आश्चर्यजनक हमला किया, जिसे आॅपरेशन त्रिशूल नाम दिया गया। भारत की ओर से पाकिस्तान की इतनी भारी-भरकम फौज का आत्मसमर्पण कराना इतना सहज भी नहीं था। पाकिस्तानी फौज के कमांडर जनरल नियाजी को मनाने की तैयारी भारतीय सेना के पूर्वी कमान के स्टाफ आॅफिसर मेजर जनरल जेएफआर जैकब को दी गई थी।जैकब के नेतृत्व में भारतीय सेना ढाका की तरफ आगे बढ़ी।13दिसंबर को सेना प्रमुख जनरल मानेकशॉ के आदेश के बाद तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के सभी शहरों पर भारतीय सेना ने कब्जा कर लिया था। 14 दिसंबर को भारतीय सेना ने एक गुप्त संदेश को पकड़ा कि दोपहर ग्यारह बजे ढाका के गवर्नमेंट हाउस में एक महत्वपूर्ण बैठक होने वाली है, जिसमें पाकिस्तानी प्रशासन बड़े अधिकारी भाग लेने वाले हैं। भारतीय सेना ने तय किया कि इसी समय उस भवन पर बम गिराए जाएं।बैठक के दौरान ही मिग 21 विमानों ने भवन पर बम गिरा कर मुख्य हॉल की छत उड़ा दी। गवर्नर मलिक ने लगभग कांपते हाथों से अपना इस्तीफा लिखा। जैकब ढाका पहुंचे तो उनकी कार पर मुक्तिवाहिनी के सैनिकों ने हमला बोल दिया क्योंकि वह पाकिस्तानी सेना के अधिकारी की कार में सवार थे। लेकिन जब उन्होंने उतरकर अपना परिचय दिया,तब वे चले गए।ढाका में मौजूद पाकिस्तानी सेना के जनरल नियाजी ने पहले तो आत्मसमर्पण करने से मना कर दिया। पाकिस्तानी जेनरल नियाजी आत्मसमर्पण को तैयार हो गए थे। वर्ष 1971के युद्ध में करीब 3,900 भारतीय सैनिक वीरगति को प्राप्त हो गए थे,जबकि 9,851 घायल हुए थे। इस युद्ध की सफलता का श्रेय पूरी तरह इंदिरा गांधी, भारतीय सेना और बांग्लादेश की मुक्तिबाहिनी को जाता है। सोवियत संघ ने युद्ध में भारत के साथ पूर्वी पाकिस्तानियों का पक्ष लिया। दूसरी ओर, रिचर्ड निक्सन की अध्यक्षता में संयुक्त राज्य अमेरिका ने आर्थिक और भौतिक रूप से पाकिस्तान का समर्थन किया। अमेरिका और चीन द्वारा भारी दबाव में भी इंदिरा गांधी जरा भी नहीं डरी और पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए। इस अदम्य संकल्प और साहस को देख दुनियाभर ने इंदिरा गांधी को आयरन लेडी का खिताब दिया था। तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष अटल बिहारी वाजपेयी ने इंदिरा को दुर्गा की संज्ञा देते हुए उनका सम्मान भी किया था।
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