ईडी के समन को मुंह चिढ़ा रहे हेमन्त और केजरीवाल

 

डॉ आशीष वशिष्ठ

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। दिल्ली शराब घोटाले में मनीष सिसोदिया और संजय सिंह को कोर्ट जमानत नहीं दे रहा। मतलब अदालत यह समझती है कि इन दोनों के खिलाफ पर्याप्त सबूत हैं, अगर इनको जमानत दी गयी तो ये लोग जांच को प्रभावित कर सकते हैं।

इन दिनों देश में दो मुख्यमंत्री कानून और जांच एजेंसियों को मुंह चिढ़ा रहे हैं। इनमें पहले मुख्यमंत्री दिल्ली के अरविंद केजरीवाल और दूसरे झारखंड के हेमन्त सोरेन हैं। दोनों मुख्यमंत्रियों को भ्रष्टाचार से जुड़े अलग-अलग मामलों में प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी कई दफा नोटिस भेजकर पूछताछ के लिए बुला चुकी है। लेकिन दोनों ईडी के सामने पेश न होने के बहाने बना रहे हैं। 

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत को ईडी सात बार और केजरीवाल को तीन बार समन भेजी चुकी है। लेकिन दोनों पूरी ढिठाई और बेशर्मी से इस मामले में पॉलिटिकल विक्टिम कार्ड का जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं। दोनों ईडी की कार्रवाई को राजनीति से प्रेरित बताते हैं। और केंद्र की मोदी सरकार पर अपने विरोधियों को दबाने के लिए जांच एजेंसियों के दुरुपयोग का आरोप लगाते हैं। असल में राजनीतिक आरोपों के आड़ में ये दोनों खुले तौर पर कानून और जांच एजेंसियों का मजाक उड़ा रहे हैं।

बीती 3 जनवरी को अरविंद केजरीवाल को दिल्ली शराब नीति में कथित घोटाला केस में ईडी ने तीसरा नोटिस देकर बुलाया था। लेकिन केजरीवाल ने ईडी के सामने पेश होने से इंकार कर दिया। उन्होंने ईडी को जवाब भेजकर समन को अवैध करार दिया। जिस शराब घोटाले में केजरीवाल से पूछताछ होनी है, उस मामले में उनके दो बड़े नेता मनीष सिसौदिया और संजय सिंह महीनों से तिहाड़ में बंद हैं। मामला गंभीर है। 

जांच में केजरीवाल का नाम सामने आने के बाद से यह साफ है कि एजेंसी के पास उनके खिलाफ ठोस सुबूत होंगे। इस मामले में सीबीआई उनसे पूछताछ कर चुकी है। केजरीवाल अक्सर मीडिया और सार्वजनिक मंचों से छाती ठोककर खुद अपने को ईमानदारी का प्रमाण पत्र देते हैं। दस साल पुरानी आम आदमी पार्टी के दिल्ली और पंजाब के लगभग 20 नेता विभिन्न मामलों में जेल की सैर कर चुके हैं। इन दोनों राज्यों में आप की सरकार है।

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से ईडी को जमीन घोटाले और अवैध खनन मामले में पूछताछ करनी है। ईडी उन्हें सात समन भेज चुकी है। लेकिन हेमंत लगातार पूछताछ से भाग रहे हैं। ईडी ने अपने सातवें समन में मुख्यमंत्री से यह पूछा था कि वो स्वयं पूछताछ के लिए जगह तिथि व समय बता दें, ताकि पूछताछ की जा सके। लेकिन मुख्यमंत्री ने जो जवाब भेजा है उसमें जगह तिथि व समय का जिक्र नहीं है।

केजरीवाल और सोरेन ही नहीं विपक्ष के जिस नेता के यहां जांच एजेंसियां पहुंचती हैं, वो इसे राजनीति से प्रेरित बताकर राजनीतिक ड्रामा करने लगता है। बीते दिनों झारखंड से कांग्रेस के राज्यसभा सांसद धीरज साहू के ठिकानों से इनकम टैक्स की छापेमारी के दौरान 353 करोड़ से ज्यादा की नगदी बारामदगी हुई है। इस मामले पर भी जमकर राजनीति हुई। पश्चिम बंगाल में बीती जुलाई में, टीएमसी नेता एवं राज्य के पूर्व मंत्री पार्थ चटर्जी को स्कूल नौकरी घोटाले से जुड़े एक मामले में ईडी ने गिरफ्तार किया था।

इस साल की शुरुआत में, टीएमसी सांसद और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी से पश्चिम बंगाल स्कूल सेवा आयोग भर्ती और कोयला तस्करी मामलों के संबंध में पूछताछ की गई थी। राशन वितरण घोटाले में ममता सरकार के राज्य मंत्री मलिक को ईडी ने गिरफ्तार किया था।

फरवरी 2019 में सीबीआई की एक टीम कोलकाता के पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार से शारदा चिट फंड घोटाले में पूछताछ करने आई तो सीएम ममता बनर्जी ने केंद्र की मोदी सरकार पर सीबीआई का दुरुपयोग करने का आरोप लगाया और धरने पर बैठ गई थी। शारदा समूह ने पश्चिम बंगाल में कई पोंजी योजनाओं के जरिये कथित तौर पर लाखों लोगों को ठगा। इसमें तृणमूल कांग्रेस नेताओं के नाम सामने आये थे। सीबीआई उसकी जांच कर रही है तो राज्य सरकार ने राजनीतिक कारणों से उसे रोकने का काम किया।

बिहार में लालू यादव और उनके परिवार के सदस्य भ्रष्टाचार के मामले में जांच का सामना कर रहा है। भ्रष्टाचार और अपराध में लिप्त पक्ष और विपक्ष के तमाम नेता जांच एजेंसियों के राडार पर हैं। कई नेता जेल की सजा भी काट रहे हैं। सीधी-सी बात है अगर किसी का दामन पाक साफ है तो उसे जांच एजेंसी पूछताछ के लिए क्यों बुलाएगी? अगर कोई बेगुनाह है तो उसे अदालत सजा क्यों देगी? अदालत या जज किसी पार्टी के कार्यकर्ता या नेता नहीं हैं।

दिल्ली शराब घोटाले में सिसोदिया और संजय सिंह को कोर्ट जमानत नहीं दे रहा। मतलब अदालत यह समझती है कि इन दोनों के खिलाफ पर्याप्त सबूत हैं, अगर इनको जमानत दी गई तो ये लोग जांच को प्रभावित कर सकते हैं। यूपी में समाजवादी पार्टी के पूर्व मंत्री आजम खां, उनकी पत्नी और बेटा जेल में बंद हैं। लालू प्रसाद यादव चारे घोटाले में सजायाफ्ता हैं। क्या बिना किसी कसूर के अदालत ने उन्हें सजा सुनाई है।

भ्रष्टाचार के एक मामले में बीती 22 दिसंबर को यूपी में बसपा सरकार में शिक्षा मंत्री रहे राकेश धर त्रिपाठी को 3 साल कैद की सजा हुई है। बीती 21 दिसंबर को मद्रास हाई कोर्ट ने भ्रष्टाचार और आय से अधिक संपत्ति के मामले में डीएमके नेता और तमिलनाडु के उच्च शिक्षा मंत्री के पोनमुडी को दोषी ठहराते हुए तीन साल की कैद और 50 लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है। पोनमुडी की पत्नी विशालाक्षी को भी दोषी ठहराया गया है।

सवाल यह है कि, क्या इन नेताओं को अदालत से मिली सजा राजनीति से प्रेरित है? वास्तव में, राजनीतिक भ्रष्टाचार पर राजनीतिक दलों के बीच गजब का आपसी तालमेल और सहमति का इतिहास रहा है। सार्वजनिक मंचों से एक दूसरे के खिलाफ चाहे कितना भी कीचड़ उछाला जाए, लेकिन चुनाव बाद भ्रष्टाचार की बात नहीं होती थी। लेकिन 2014 में केंद्र की मोदी सरकार आने के बाद से भ्रष्टाचार खासकर राजनीतिक भ्रष्टाचार के खिलाफ चली आ रही सहमति और तालमेल पर जोरदार प्रहार किया गया। नतीजतन, आज कई भ्रष्ट नेता और प्रभावशाली लोग जेल की रोटियां खा रहे हैं।

जब कानून के हाथ तथाकथित प्रभावशाली लोगों और नेताओं की गर्दन तक पहुंचने लगते हैं, तो वो जांच एजेंसियों के दुरुपयोग और राजनीतिक प्रतिशोध का बाजा बजाने लगते हैं। जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग कानून और जांच एजेंसियों से बचने के लिए जब तरह—तरह के हथकंडे अपनाते हैं तो इससे समाज में गलत संदेश जाता है। इससे आम आदमी के मन में कानून और जांच एजेंसियों के प्रति अनादर का भाव उपजता है और कानून का राज स्थापित करने में कठिनाइयां आती हैं।

राजनीतिक दल और नेता अपनी गिरेबां में झांकने की बजाय सत्ता पक्ष पर जांच एजेंसियों के दुरूपयोग का आरोप लगाते हैं। एजेंसियां का दुरुपयोग हर दल की सरकार करती है, यह कड़वी हकीकत है। बीते साल यूटयूबर मनीष कश्यप को वीडियो बनाने के लिए राजद्रोह और अन्य गंभीर मामलों में जेल में ठूंसकर बिहार और तमिलनाडु की सरकारों ने किस तरह जांच एजेंसियों और पुलिस का दुरुपयोग किया, उसे पूरे देश ने देखा। 2012 में महाराष्ट्र कांग्रेस की सरकार ने कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी के एक कार्टून से नाराज होकर उन्हें राजद्रोह के आरोप में जेल भेजा था। जांच एजेंसियों और पुलिस के दुरुपयोग के तमाम उदाहरण हैं।

केजरीवाल और सोरेन का ईडी के सामने पेश न होना उन्हें संदेह के घेरे में खड़ा करता है। अगर वो पाक-साफ हैं तो उन्हें ईडी के समाने अपना पक्ष रखना चाहिए। ये दोनों एजेंसी के सामने पेश होने की बजाय इस बात की तैयारी कर रहे हैं कि गिरफ्तारी के बाद वो अपने परिवार के किसी सदस्य को सीएम की कुर्सी पर कैसे बिठा सकते हैं। फिलवक्त केजरीवाल और सोरेन की राजनीति और बयानबाजी इस ओर इशारा कर रही है कि उन्हें अपने भविष्यफल का ज्ञान है। ईडी को इस मामले में उचित कार्रवाई करके मिसाल स्थापित करनी चाहिए। कानून के राज की स्थापना के लिए भी यह जरूरी है। (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

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