एबीएन एडिटोरियल डेस्क। युवा दिवस अवसर पर खबर मन्त्र और एबीएन के संयुक्त तत्वावधान में उर्सुलाइन इंटर कॉलेज रांची के सभागार में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। युगपुरुष स्वामी विवेकानंद जी का जन्म दिन पर आयोजित कार्यक्रम में छात्राओं ने हिस्सा लिया।
यह समाज और राष्ट्र के बिखरे हुए ऊर्जा के स्रोत युवाओं को संगठित और अनुशासित करके उनकी ऊर्जा को किसी सकारात्मक लक्ष्य और समाज उत्थान के कार्य हेतु अगर प्रयोग में लिया गया तो यह युवा शक्ति हर लक्ष्य को भेदती हुई सफलता के नए आयाम गढ़कर देश और समाज को हिमालय की बुलंदियों तक पहुचा सकेंगे। इसके लिए उचित शिक्षा, सही मार्गदर्शन एवं अभिभावक, शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ताओं व सरकारी तंत्र के पारस्परिक समन्वय की महती आवश्यकता है।
अतएव शिक्षा को रोजगारपरक, अहिंसामुक्त, क्रियाशील, मूल्यपरक एवं प्रकृति से सम्बन्धित करके ही निर्भय, स्वानुशासित, अहिंसात्मक जीवन दृष्टि वाले, आत्मनिर्भर, सहकारप्रिय एवं गीता में र्विणत आत्मन्येवात्मना तुष्ट (अपने भीतर स्वयं से तृप्त) युवाओं का निर्माण किया जा सकता है।ऐसे युवकों के द्वारा ही देश में सामाजिक सौहार्द्र, सुख-शान्ति व समृद्धशाली समाज की स्थापना की जा सकती है जिसके द्वारा ही आधुनिक सभ्यता के उज्जवल भविष्य का सपना साकार हो सकेगा।
आज प्रश्न यह है कि युवा शक्ति को संभालने और दिशा देने की सामर्थ्य किसमे है जबकि वर्तमान भारतवर्ष में 13 से 35 वर्ष की आयु वाले लगभग 42 करोड़ यूवाओं की मानवीय पूंजी है जो कि दुनिया के किसी भी अन्य देश की तुलना में बहुत अधिक है अर्थात हमारा देश इन दिनो सर्वाधिक युवा देश है जिसमें से 70 प्रतिशत (लगभग 29 करोड़) ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करते हैं।
गांव में रहने वाले युवाओं तथा शहरों में निवास करने वाले लगभग 13 करोड़ युवा दोनो के रहन-सहन, क्षमता, रूचि, परिवेश, शिक्षा आदि एकदम अलग है। गांवों की शिक्षा व्यवस्था और शहरों की सुविधाए, दोनो में जमीन-आसमान का फर्क है। इसलिए ग्रामीण युवाओं को आज शिक्षा एवं रोजगाार के पर्याप्त अवसर प्राप्त नही हो पा रहे हैं और वे विकास की दौड़ में पीछे छूट रहे हैं।
जबकि किसी भी राष्ट्र की युवा शक्ति उसके रचनात्मक कार्यों का आधार होती है परन्तु जब युवाओं को अपनी योग्यता व शक्ति का सदुपयोग करने का अवसर नही मिलता तो वह अपने वास्तविक मार्ग से भटक जाते हैं। ऐसी परिस्थितियों में युवा शक्ति रचनात्मक कार्यो में व्यस्त न रहकर विध्वंसक कार्यों की ओर अग्रसर होतीे है।
आज हमारे देश में ग्रामीण युवा शक्ति के सामने अनेक गम्भीर चुनौतियां हैं जिनमें आर्थिक विषमता, मूल्यरहित शिक्षा, शिक्षा का रोजगारोन्मुखी न होना, उचित मार्गदर्शन का अभाव एवं टेलीवीजन के द्वारा सेक्स और हिंसा का ग्लैमराइजेशन किया जाना आदि हैं। जिसके कारण उत्पन्न अमीरी-गरीबी की बढ़ती खाई, बेरोजगारी, सामाजिक रिश्तों का अभाव, पारिवारिक विघटन, उपभोगवादी संस्कृति का प्रसार, टूटते सामाजिक-राजनैतिक मूल्यों ने इन युवाओं के भीतर निराशा पैदा कर दी है।
आज हमारे देश में उचित मार्गदर्शन के अभाव में भारतीय युवा पीढ़ी दिग्भ्रमित है और कुप्रवृत्तियों की पगडंडियों में भटककर अपराध और आतंकवाद पर चल रही है। कश्मीर में जारी आतंकवादी गतिविधियों तथा देश के कोने-कोने में पैर पसारते नक्सलवाद में गुमराह युवा वर्ग की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसके अतिरिक्त देश की बढ़ती जनसंख्या ने भी युवा वर्ग को दिशा से भटकने के लिए मजबूर कर दिया है।
शिक्षा में सामाजिक व नैतिक मूल्यों के अभाव ने युवाओं को नैतिक मूल्यों के सरेआम उल्लंघन की ओर अग्रसर किया है। मसलन मादक द्रव्यों व धूम्रपान की आदतें, यौन शुचिता का अभाव आदि ने विद्यालयों को विद्यास्थल के बजाए राजनीतिक अखाड़ा, असामाजिक व अनैतिक कार्यों की जन्मस्थली बना दिया है। दुर्भाग्यवश आज के गुरूजन भी प्रभावी रूप् में सामाजिक व नैतिक मूल्यों को स्थापित करने में असफल रहे। युवाओं के समक्ष एक अन्य चुनौती उचित मार्गदर्शन का अभाव है।
आदर्श नेतृत्व ही युवाओं को सही दिशा दिखा सकता है, पर जब नेतृत्व ही भ्रष्ट हो तो युवाओं का क्या? किसी दौर में युवाओं के आदर्श गांधी, नेहरू, विवेकानन्द, आजाद, सुभाष जैसे लोग या उनके आसपास के सफल व्यक्ति, वैज्ञानिक और शिक्षक रहे। पर आज के युवाओं के आदर्श वही हैं जो शार्टकट के माध्यम से ऊंचाइयों पर पहुंच जाते हैं।
फिल्मी अभिनेता, अभिनेत्रियां, विश्वसुन्दरियां, भ्रष्ट अधिकारी, उद्योगपति, राजनीतिज्ञ और अपराध जगत के डान आदि उनके आदर्श बन गये हैं। फलस्वरूप अपनी संस्कृति के प्रतिमानों और उद्यमशीलता को भूलकर रातोरात ग्लैमर की चकाचैंध में वे शीर्ष पर पहुंचना चाहते हैं। पर वे यह भूल जाते हैं कि जिस प्रकार एक हाथ से ताली नहीं बज सकती, उसी प्रकार बिना उद्यम के ठोस कार्य भी नहीं हो सकता।
राष्ट्रीय युवा नीति का लक्ष्य युवाओं की पूर्ण क्षमता हासिल करने के लिए उन्हें सशक्त बनाने और उसके जरिए देश को राष्ट्रों के बीच सही जगह हासिल करने में समर्थ बनाना है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए नीति में पांच भली-भांति परिभाषित उदेश्यों और प्राथमिकता वाले 11 क्षेत्रों की पहचान की गई है। इसमें प्रत्येक प्राथमिक क्षेत्र में नीति के लिए भी सुझाव दिया गया है।
प्राथमिक क्षेत्रों में शिक्षा, कौशल विकास और रोजगार, उद्यमिता, स्वास्थ्य एवं स्वस्थ जीवनशैली, खेल, सामाजिक मूल्यों का संवर्द्धन, समुदाय से जोड़ना, रानीति एवं शासन में भागीदारी, युवाओं को संलग्न करना, समावेश और सामाजिक न्याय शामिल हैं। यह नीति 15 से 29 वर्ष के आयु वर्ग के सभी युवाओं की जरूरतें पूरी करेगी जो 2011 की जनगणना के अनुसार कुल आबादी का 27.5 प्रतिशत हैं।
राष्ट्रीय युवा नीति का लक्ष्य युवाओं की पूर्ण क्षमता हासिल करने के लिए उन्हें सशक्त बनाने और उसके जरिए देश को राष्ट्रों के बीच सही जगह हासिल करने में समर्थ बनाना है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए नीति में पांच भली-भांति परिभाषित उद्देश्यों और प्राथमिकता वाले 11 क्षेत्रों की पहचान की गयी है। इसमें प्रत्येक प्राथमिक क्षेत्र में नीति के लिए भी सुझाव दिया गया है। प्राथमिक क्षेत्रों में शिक्षा, कौशल विकास और रोजगार, उद्यमिता, स्वास्थ्य एवं स्वस्थ जीवनशैली, खेल, सामाजिक मूल्यों का संवर्द्धन, समुदाय से जोड़ना, राजनीति एवं शासन में भागीदारी, युवाओं को संलग्न करना, समावेश और सामाजिक न्याय शामिल हैं।
यह नीति 15 से 29 वर्ष के आयु वर्ग के सभी युवाओं की जरूरतें पूरी करेगी जो 2011 की जनगणना के अनुसार कुल आबादी का 27.5 प्रतिशत हैं। युवा वर्ग देश का भविष्य होने के साथ-साथ हमारे देश के विकास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। भारत में युवाओं संख्या सर्वाधिक है। भारत की लगभग 65 प्रतिशत जनसंख्या की आयु 35 वर्ष से कम है। सरकार का पूरा ध्यान युवाओं के माध्यम से विकास लाने पर केन्द्रित है।
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