मैथिलीशरण गुप्त : द्विवेदी युग के प्रतिनिधि कवि

 

डॉ हराधन कोईरी 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। मैथिलीशरण गुप्त भारतीय संस्कृति और संस्कार के उन्नायक कवि हैं। 12 दिसंबर को उनकी 59वीं पुण्यतिथि है। पुण्य तिथि के अवसर पर उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का पुनरावलोकन करने के साथ-ही उनके काव्यादर्शों को आत्मसात कर हिंदी साहित्य में फिर से स्थापित करने की आवश्यकता है। 

उनकी कविताओं में राष्ट्रीय भावना, वैष्णवी आस्था और समन्वय की विराट चेष्टा है। समाज की उन्नति में पारिवारिक जीवन मूल्यों की बड़ी भूमिका होती है। गुप्त जी अपनी कविताओं में पारिवारिक मूल्यों के संरक्षण के प्रति अधिक तत्पर दिखते हैं। 

उनकी यह तत्परता साकेत में सर्वत्र दिखाई पड़ती है, जिसके कारण उन्हें कौटुम्बिक कवि भी कहा गया है। वे सच्चे अर्थों में आस्था और विश्वास के कवि हैं। अपने काव्य गुरु आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के उपकार को स्वीकारते हुए साकेत की भूमिका में लिखते हैं : 

करते तुलसीदास भी कैसे मानस नाद? 

यदि उन्हें महावीर का मिलता नहीं प्रसाद। 

गुप्त जी साहित्य में हो रहे उत्तरोत्तर परिवर्तनों को अभिव्यक्त करने में सफल कवि थे। उनकी इस कालानुसरण की क्षमता को देखते हुए आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने ठीक ही लिखा है- गुप्त जी की प्रतिभा की सबसे बड़ी विशेषता है कालानुसरण की क्षमता अर्थात् उत्तरोत्तर बदलती हुई भावनाओं और काव्य प्रणालियों को ग्रहण करते चलने की शक्ति। 

मैथिलीशरण गुप्त ने दो प्रबंध काव्य साकेत और जय भारत एवं उन्नीस खंड काव्यों की रचना की है। इसके पीछे द्विवेदी युगीन संस्कार और उनकी मयार्दावादी दृष्टिकोण रहा है। उनकी प्रसिद्धि का आधार ग्रंथ साकेत में उन्होंने रामकथा को दुहराया ही नहीं है बल्कि रामकथा का पुनर्मूल्यांकन किया है। 

इसके साथ ही उर्मिला और कैकेयी के जैसे उपेक्षित पात्रों को अपनी सहानुभूति से अधिक संवेदनशील और युगानुकूल बनाया है। चित्रकूट की सभा में कैकेयी कहती हैं - 

युग युग तक चलती रहे यह कठोर कहानी 

रघुकुल में भी थी एक अभागिन रानी। 

निज जन्म जन्म तक सुने जीव यह मेरा 

धिक्कार! उसे था महास्वार्थ ने घेरा। 

कैकेयी का यह चरित्र कवि की मौलिक प्रतिभा का परिचायक है। इतना ही नहीं गुप्त जी के राम वाल्मीकि और तुलसी के राम से भिन्न हैं। उनके राम इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आये हैं। राम स्वयं कहते हैं- 

मैं आया उनके हेतु जो कि तापित हैं, 

जो विवश, विकल, बलहीन, दीन, शापित हैं। 

भव में में नव वैभव व्याप्त कराने आया, 

नर को ईश्वरता प्राप्त कराने आया 

संदेश यहाँ मैं नहीं स्वर्ग का लाया, 

इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आया। 

मैथिलीशरण गुप्त को उपेक्षितों के कवि कहा गया है। उन्हें ऐसा कहना उचित भी है। उन्होंने भारतीय साहित्य में उपेक्षित नारी पात्रों को देखने की एक नई दृष्टि दी है। उसी का परिणाम है कि उनके प्रसिद्ध काव्य साकेत में उर्मिला के चरित्र को विशेष प्रतिष्ठित मिली है। 

वहीं यशोधरा काव्य में गौतम की पत्नी यशोधरा को। विष्णुप्रिया काव्य में चेतनदेव की पत्नी विष्णुप्रिया को और रत्नावली काव्य में तुलसीदास की पत्नी रत्ना आदि की वेदना को सशक्त सहानुभूति दी है। साथ -ही नारी स्वाभिमान की अभिव्यक्ति भी करायी है। यशोधरा अपनी सखियों से कहती हैं-  

सिद्धि हेतु स्वामी गये ये  

गौरव की बात  

पर चोरी चोरी गये, 

यह बड़ा व्याघात। 

आगे फिर यशोधरा कहती हैं। हम क्षत्राणी हैं और क्षत्रिय धर्म की निर्वाह करना जानते हैं। हमें दुख इस बात की है कि मेरे पति ने मुझे पहचाना परंतु जाना नहीं। यशोधरा कहती हैं- 

स्वयं सुसज्जित करके क्षण में 

प्रियतम को, प्राणों के पण में 

हमीं भेज देतीं हैं रण में, 

क्षात्र धर्म के नाते  

सखी, वह मुझसे कहकर जाते। 

कविवर मैथिलीशरण गुप्त साहित्य को केवल मनोरंजन की वस्तु नहीं मानते हैं, बल्कि उसमें जीवन के लिए संदेश भी होना चाहिए। भारत-भारती में वे कहते हैं- 

केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए 

उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए।

वे भारत की समृद्ध ज्ञान- विज्ञान की परम्परा का गौरव गान भी किया है। साथ-ही उन्होंने भारतीय ऋषि-मुनियों की उस सनातन परम्परा का उल्लेख किया है जो विश्व को बहुत कुछ दिया है। भारत-भारती के अतीत खंड मे वे लिखते हैं - 

संसार को हमीं ने ज्ञान भिक्षा दान की, 

आचार की, व्यवहार की, व्यापार की, विज्ञान की। 

भारतीय का अतीत बहुत ही गौरवशाली रहा है, किन्तु वर्तमान हमारा ठीक नहीं है। इसीलिए गुप्त जी अगाह करते हैं- 

देखो हमारा विश्व में नहीं उपमान था, 

नर-देव के हम और भारत? देवलोक समान था।

आज हर क्षेत्र में मूल्यों का विघटन हो रहा है। ऐसे समय में मैथिलीशरण गुप्त जैसे कवियों की कविताओं का दायित्व बढ़ जाता है। समाज में पढ़े लिखे लोग आजकल ऐसे असामाजिक तत्वों से जुड़ जाते हैं जहां से निकल पाना उनके लिए मुश्किल हो जाता है। 

मूल्यों का यह गिरावट अब साहित्यों में भी होने लगा है। साहित्य अब लोककल्याण की भावना से च्युत होकर स्वार्थ साधना व प्रतिष्ठा का विषय बन गया है। ऐसे समय में गुप्त जी का साहित्य सर्वाधिक प्रासंगिक और पठनीय हो जाता है। वे भारत की भारतीयता बनी रहे इसके लिए भी सचेत करते हैं- 

हम कौन थे, क्या हो गये हैं और क्या होंगे अभी? 

आओ विचारें आज मिलकर ये समस्याएं सभी।

गुप्त जी उदार हृदय के कवि थे। समन्वय के कवि थे। इसलिए राम,श्याम और बुद्ध में भेद नहीं करते हैं। उन्होंने सिखों पर लिखा, इस्लाम पर लिखा,ईसा मसीह पर लिखा। वे सभी धर्मों और संप्रदायों के प्रति सहिष्णु थे। 

इसलिए वे हिंदी साहित्य जगत में राष्ट्र कवि, दद्दा, संस्कृति के व्याख्याता, मानवता के उदघोषक, आधुनिक तुलसी, उपेक्षितों के कवि, और युगद्रष्टा कवि आदि कहलाये। शांतिप्रिय द्विवेदी ने ठीक ही कहा है - किसी माला में प्रथम मणि उपवन में प्रथम पुष्प और गगन में प्रथम नक्षत्र का जो महत्वपूर्ण स्थान हो सकता है वही स्थान वर्तमान हिन्दी में मैथिलीशरण गुप्त का है। (लेखक गोस्सनर महाविद्यालय, रांची के स्नातकोत्तर हिंदी विभाग के सहायक प्राध्यापक हैं।)

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