टीम एबीएन, रांची। झारखंड की जनजातीय सलाहकार परिषद (टीएसी) ने छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (सीएनटी) अधिनियम के तहत आदिवासी भूमि की खरीद-बिक्री के लिए पुलिस थाना सीमा के पुनर्निर्धारण की सिफारिश की है। एक अधिकारी ने यह जानकारी दी।
परिषद ने आदिवासी जमीन की खरीद-बिक्री के लिए 26 जनवरी 1950 तक राज्य में स्थापित जिलों और पुलिस थानों को अधिनियम के तहत विचार करने की सिफारिश की है।
परिषद के सदस्यों ने कहा कि 1950 में थाने की सीमा वर्तमान की तुलना में बड़ी हुआ करती थी। छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम की धारा-46 स्थानीय पुलिस थाना क्षेत्र के बाहर आदिवासी भूमि की बिक्री को प्रतिबंधित करती है।
एक आदिवासी अपनी भूमि को बिक्री, विनिमय, उपहार या वसीयत के माध्यम से अनुसूचित जनजाति के किसी अन्य सदस्य और अपने ही पुलिस थाना क्षेत्र के निवासियों को हस्तांतरित कर सकता है।
परिषद की 26वीं बैठक बृहस्पतिवार को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अध्यक्षता में हुई। एक आधिकारिक बयान में कहा गया है कि सरकार परिषद की सिफारिश पर कानून के मुताबिक आगे की कार्रवाई करेगी।
सोरेन ने बृहस्पतिवार को संवाददाताओं से कहा- बैठक के दौरान आदिवासी जमीन की खरीद-बिक्री के लिए पुलिस थाना सीमा की बाध्यता सहित विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की गयी। कानून बनाये जाने के समय की तुलना में पुलिस थानों की स्थिति आज काफी बदल गई है। परिषद मौजूदा स्थिति के हिसाब से नियम बनाना चाहती है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि बैठक में राज्य में पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार), अधिनियम के कार्यान्वयन पर भी चर्चा की गयी। इसे पेसा अधिनियम के नाम से जाना जाता है। उन्होंने कहा कि इस पर आगे और विस्तृत चर्चा की जरूरत है।
साल 1996 में अस्तित्व में आये पेसा अधिनियम का उद्देश्य अनुसूचित क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए ग्राम सभाओं के माध्यम से स्वशासन सुनिश्चित करना है। यह अधिनियम ग्राम सभाओं को विकास योजनाओं को मंजूरी देने और सामाजिक क्षेत्रों को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का अधिकार भी देता है।
दो दशक से अधिक समय पहले इस कानून को पारित किये जाने के बावजूद नियमों के अभाव में इसे लागू नहीं किया जा सकता है। झारखंड में 24 में से 13 जिले संविधान की पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आते हैं।
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