टीम एबीएन, चतरा। शारदीय नवरात्र के पवित्र दिनों में हर मंदिर और घरों में श्रद्धालू देवी अराधना में लीन हैं। ऐसा ही देवी दरबार जिले के इटखोरी में मां भद्रकाली है, जहां से लोगों की असीम आस्था जुड़ी है। यहां मां के दर पर मांगी गयी मुराद जरूर पूरी होती है। भद्रकाली मंदिर में श्रद्धालुओं को अपार शांति और अदभुत शक्ति की अनुभूति होती है। लोग दूर-दूर से माता भद्रकाली के दरबार में अपनी मन्नत लेकर पहुंचते हैं। माता के दरबार में जो भी सच्चे मन से शीश झुकाकर मन्नत मांगता है, माता उसकी हर मनोकामना पूर्ण करती हैं। यह मंदिर सिद्ध पीठ में शुमार है। मां के भद्र रूप माता भद्रकाली की पूजा आदिकाल से होती आ रही है।
यहां एक ही शिला पर कमल के आसन पर मां भद्रकाली की आदमकद प्रतिमा वरदायिनी मुद्रा में विराजमान हैं। माता की बायीं ओर महाकाली और दाहिनी ओर माता सरस्वती भक्तों को दर्शन दे रही है। मंदिर में स्थापित मां भद्रकाली की मूर्ति लोकमानस में दूर्गा के रूप में पूजित है। प्रात:काल में सूर्योदय से पहले ही सिंह द्वार से प्रवेश के साथ ही भक्तों का मां के दरबार में हाजिरी लगाना प्रारंभ हो जाता है।
अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए अर्जी लगाने का सिलसिला प्राचीन समय से चला आ रहा है। भक्ति और उपासना की अनोखी डोर भक्तों को मां के आशीर्वाद से बांधे हुए खास दृश्य निर्मित करती है। मंदिर की तीनों दिशाओं में कलकल बहती मुहाने नदी और मनमोहक हरी- भरी वादियां भी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। मुहाने व बक्सा नदी के संगम पर अवस्थित मां भद्रकाली मंदिर झारखंड के विख्यात मंदिरों की श्रेणी में आता है।
मंदिर के पुजारियों का कहना है कि नवरात्र के दौरान मंदिर परिसर में जप, पाठ पूजन से मनोवांछित फल मिलता है। यहां साल भर भक्तों की भीड़ रहती है। नवरात्र को लेकर विशेष पूजा पद्धति के लिए मंदिर प्रसिद्ध माना जाता है। यह मंदिर सिद्ध पीठ में शुमार है। पुजारी नागेश्वर तिवारी का कहना है कि माता भद्रकाली की पूजा आदिकाल से होती आ रही है।
मान्यता है कि नवरात्र के 9 दिन जो भी भक्त देश की किसी भी कोने से से आकर यहां जो मन्नत मांगते हैं सभी की मन्नत पूरी होती आयी है। शारदीय नवरात्र में यहां पर कलश स्थापना के बाद प्रत्येक दिन पंडितों के द्वारा सप्तशती का पाठ किया जाता है। नवरात्र में मनोकामना कलश रखने का सिलसिला एक कलश से शुरू हुआ था जो साल दर साल बढ़ते चला गया। इस वर्ष पांच दर्जन से अधिक मनोकामना कलश की स्थापना की गयी है।
मां भद्रकाली मंदिर में दैनिक पूजा विधान में प्रतिदिन ब्रह्म मुहूर्त में माता भद्रकाली की पूजा किया जाता है। प्रात: कालीन और संध्याकाल में आरती वाद यंत्रों की लय और ताल पर किया जाता है। पूजा विधान में पुजारियों द्वारा संकल्प करा कर मां के मस्तक पर लाल गुड़हल के फूल अर्पित किया जाता है। जिससे माता प्रसन्न होती हैं और भक्तों की हर मनोकामना को पूरा करती हैं।
मां भद्रकाली मंदिर परिसर से मूर्ति चोरी की घटना ने यहां पशु बकरे की बलि देने की परंपरा ही बदल दी। पहले मंदिर में बकरे की बलि दी जाती थी। इस घटना के बाद यहां शाकाहारी बलि देने का चलन शुरू हो गया। नौवीं-दसवीं शताब्दी में बसी इस नगरी में साठ वर्ष पहले तक मन्नत पूरी होने की खुशी में श्रद्धालु बकरे की बलि देते थे। इस बीच 1968 में इस मंदिर से मूर्ति चोरी हो गयी, बाद में मां भद्रकाली की मूर्ति कोलकाता से बरामद हो गयी।
इसके बाद तो स्थानीय लोगों में माता के प्रति आस्था और गहरी हो गयी। लोगों को लगा कि यहां बलि के कारण ही माता की मूर्ति चोरी हुई। शायद अब माता नहीं चाहतीं कि यहां किसी की जान ली जाये। इसके बाद से बलि प्रथा बंद कर दी गयी। अब नवरात्र पर भक्त माता को कुष्मांड (भतुआ), ईख और फलों की बलि अर्पित करते हैं। मां भद्रकाली मंदिर परिसर के किसी भी होटल के व्यंजन में प्याज और लहसुन तक का इस्तेमाल नहीं होता।
सिद्धपीठ मां भद्रकाली में नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की विधि-विधान से पूजा होती है और मां के मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगता है। नवरात्रि के दौरान माता की विशेष पूजा-अर्चना से भक्तों की सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। नवरात्र की अष्टमी तिथि को यहां शास्त्रों की पूजा की जाती है। इस दौरान भक्त उपवास रखकर देवी की भी पूजा करते हैं।
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