श्रीमद्भागवत से सहज संभव है नित्य सनातन एवं शाश्वत-स्वरूप का बोध

 

एबीएन सोशल डेस्क। हे भारत के भरत.! सभी जीवात्माओं में दैवत्व बीज रूप में विद्यमान है। लेकिन इस अखंड सत्य शाश्वत अविनाशी स्वरूप का बोध न होना ही दु:ख का मूल कारण है। जैसे मां सीता जी की खोज के लिए हनुमान जी को लंका जाने के लिए समुद्र लांघना था, लेकिन वे हिचकिचाहट कर रहे थे। 

तब जामवंत जी ने उनको याद दिलाया कि आप में वह शक्ति वह क्षमता है। तो हनुमान जी ने समुद्र लांघ कर लंका में प्रवेश कर गये। इसी तरह सद्गुरु की कृपा से आसानी से समझ में आ जाता है। आध्यात्मिक विचारों द्वारा अंत:करण को ब्रह्म-रसाभिसिक्त शक्ति में भिंगोते रहे। आत्मसत्ता का बोध हमेशा कल्याण करने वाला है। 

अपने शाश्वत अविनाशी स्वरूप का बोध न होने के कारण मानव अपनी अनंतता से अपरिचित है। अत: आध्यात्मिक पथ का अवलंबन एवं आत्म-अवबोध की तत्परता जगायें। स्वयं में समाहित भगवद-तत्त्व चिन्मय एवं अखण्ड आनन्द लबालब है। उस शाश्वत और नित्य स्वरूप का बोध मांगल्य-मोद और मुक्ति प्रदाता है। 

अत: साधन विधियों में आत्म अनुसंधान और सदगुरू अनुग्रह लेते रहे। नित्य सनातन एवं शाश्वत-स्वरूप का बोध श्रीमद्भागवत से सहज संभव है। श्रीमद्भागवत भवतारक साधन है।अपने वास्तविक स्वरूप की स्मृति और बोध का फलादेश है-निर्भयता और अखण्ड-आनन्द के अनुभव का स्थायी बन जाना। 

अत: आत्मस्थ रहें। जीव अपने स्वरूप को माया के कारण भूल जाता है। जिस प्रकार सूर्य की किरणें सूर्य से पृथक नहीं हैं, उसी प्रकार जीव भी वास्तव में ब्रह्म से पृथक नहीं है। अज्ञान के कारण ही जीव अपने उस वास्तविक रूप को नहीं पहचान पाता, जिस अंशी का वह अंश है। चेतन जीव अपना संबंध जड़ शरीर, मन, बुद्धि, अहंकार अथवा किसी कल्पित रूप से मान बैठता है। 

जीव का यही अज्ञान आत्मज्ञान की कमी के अतिरिक्त कुछ नहीं है। आत्मज्ञान का बौद्ध होते ही प्रभु की सद्गुरु रूपी शक्ति प्रकट हुई है। संत-सद्गुरु ही प्रभु प्राप्ति कराने के मूल साधन हैं। मनुष्य शरीर पूर्ण मुक्त है, पर पूर्ण सद्गुरु के मिलने पर ही वास्तविकता का ज्ञान होता है। अपने चैतन्य स्वरूप को तभी जान पायेंगे, जब मन स्थिर और शांत होगा। 

अशांत मन से कभी भी अपने आत्म-स्वरूप का बोध नहीं कर सकते। क्योंकि मन बड़ा हटी है यह तब पूर्णरूप से शांत होगा, जब हम अपनी अन्तर सत्ता के प्रति समरूप से जागरूक एवं सचेत होंगे तथा जागरूकता के उस बोध में पूर्णतया अवस्थित होंगे। तभी अपने आत्म-स्वरूप का बोध होगा। बंधुओं, अपने पूर्वजन्म कृत कर्मों से कोई जीव बच नहीं सकता, यही ईश्वरीय न्याय है। 

मनीषियों ने इस विषय में हमारा मार्गदर्शन किया है। वे कहते हैं कि हर समय मनुष्य को ईश्वर याद बनी रहे। कैसी भी अवस्था क्यों न हो, उसी की शरण में रहना। इसका अर्थ यही है कि अपने सभी दैनिक कार्यों और दायित्वों का भली-भांति निर्वहण करते हुए परम प्रभु याद बनी रहे। सभी द्वन्द्वों को सहन करते हुए अपने संपूर्ण शुभाशुभ कर्मों का फल उस ईश्वर को अर्पित करते रहना चाहिए। 

व्यवहार में ऐसा करने वाला व्यक्ति कभी अभिमानी नहीं बनता। श्रीगीता में यही उपदेश दिया है कि केवल कर्म करना ही मनुष्य का अधिकार है, फल की कामना नहीं। कर्मफल का हेतु बनने पर मनुष्य में अकर्मन्यता का भाव आने लगता है। कर्म किये बिना और कोई उपाय नहीं है। 

दु:ख हो या सुख हर समय प्रभु का स्मरण करता है, उसके जीवन में सुख आये अथवा दु:ख, वह हर स्थिति में समान रहता है। दोनों को प्रसाद समझकर ग्रहण करता है। जिसका मन उस निरंकार प्रभु से जुड़ा रहता है, उसे ही प्रभु की प्राप्ति होती है। आना और जाना इस चक्रव्यूह से मुक्त होता है। परम प्रभु को सच्चिदानंद स्वरूप कहा गया है। 

विराट का ही एक अंश होने से जीवात्मा भी उन्हीं गुणों से सुशोभित है। सत्, चित और आनंद-ये तीनों मिलकर कारण शरीर का ढांचा बनाते हैं। सत् अर्थात् शाश्वत अजर-अमर और अविनाशी स्वरूप। चित् अर्थात् चेतना, दिव्य गुणों से सुसज्जित, उच्चस्तरीय आदर्शों, आस्थाओं से युक्त। 

आनंद अर्थात् भाव-संवेदनाओं, सरसता, मृदुलता से सिक्त अंत:करण आशा उत्साह, संतोष के परस्पर समन्वय पर आधारित जीवनक्रम है। आत्मा का सहज स्वभाव है-ऊंचा उठना, अपने विराट स्वरूप की स्वयं को प्रतिमूर्ति बनाने के लिए इन्हीं गुणों से स्वयं को समृद्ध करना तथा अंतत: समस्त आवरणों को हटाते हुए अपने चरम लक्ष्य को प्राप्त करना। 

परिष्कृत जीवात्मा इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए आध्यात्मिक पुरुषार्थ करती है एवं जीव ब्रह्म सम्मिलन से निस्सृत परमानन्द की स्थिति को प्राप्त करती है। आत्म तत्व की गहराई को समझना सबसे बड़ी उपलब्धि माना गया है। 

जिसने स्वयं को जानकार जीवन लक्ष्य की पूर्ति की आवश्यकता को समझ लिया, वह महामानव बनता है और देव समुदाय में सम्मिलित होकर अपना ही नहीं, बल्कि अन्य असंख्यों का कल्याण भी करता है। अपने में ओत-प्रोत ब्रह्मसत्ता को जागृत करना और स्वयं में देवत्व का उदय करना ही आत्मबोध का परिणाम है और यह बोध ही ज्ञान साधना का चरम लक्ष्य है।

जो स्वयं को नहीं जानता है, वह सत्य को कैसे जान सकता है? सत्य को जानने का द्वार स्वयं से होकर ही आता है। इसलिए जिसने स्वयं को जान लिया उसने संसार को इच्छानुकूल बनाने और पदार्थों तथा प्राणियों को उल्लास प्रदान कर सकने का मार्ग हस्तगत कर लिया। जय राजेश्वर राधे-राधे जय श्री कृष्णा राम राम हरि ॐ

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