एबीएन सोशल डेस्क। सिंधु घाटी सभ्यता के बारे में पढ़ते पढ़ते अचानक उसके चित्र लिपियां एवं मोहरों ने मेरा ध्यान खींचा उत्सुकता हुई तो उसे डीकोड करने की मेरे नाना ने बचपन में मुझे मुंडाओं के इतिहास के बारे में बताया था। उन्होंने यह सब अपने पुरखों से सुना था। इस समय आप सबके साथ बांटना चाहती हूं।
अंग्रेजों के समय से छोटा नागपुर के आदिवासी के विषय में कुछ लोगों ने पुस्तक लिखी थी। उसमें मुंडा समुदाय के सिंधु घाटी सभ्यता के साथ संबंध होने के प्रमाण मिलते हैं। उन पुस्तकों को बाद में कहां रखा गया है यह मुझे ज्ञात नहीं है। इसलिए जिज्ञासा बस मैं इंटरनेट से इस विषय के बारे में जानकारी हासिल करने के लिए सर्च करने लगी।
कई सारी रिसर्च आर्टिकल स्टूडेंट और डॉक्यूमेंट के अध्ययन के बाद जैसे उनसे कांटेक्ट प्रॉब्लम मुंडारियन बाय द आफ मैन हो विद द इंडस वैली सिविलाइजेशन बाय टोनी जोसेफ दिसंबर 23 2017 का हिंदू इत्यादि सहित कई बुद्धिजीवी वर्ग जो सिंधु घाटी सभ्यता पर लिख रहे थे।
कुछ खास कुलू नहीं मिलने के वजह सेवे निर्धारित नहीं कर पा रहे थे कि वास्तव में सिंधु घाटी सभ्यता पर कौन रहता था। वैदिक आर्य द्रविडियन मुंडा जनजाति या कोई और। पर एक बात अवश्य है कि उनके शोध में मुंडा जनजाति के पूर्वज जरूर शामिल है। इतने सालों के गांव के अवशेषों के दिए निर्देश के पश्चात एक कड़ी मुंडा जनजाति की ओर साफ इशारा करती है।
हमारे पूर्वजों का मानना था कि मुंडा जनजाति ही सिंधु घाटी में बात करती थी मैं इस विषय पर क्रमश: प्रकाश डालना चाहती हूं। मुंडा सनदायक खूटकटी समुदाय है। अर्थात जब वह एक जगह से दूसरे जगह को जाते थे तभी जंगल के पेड़ों को काटते हुए। उसे रहने और खेती लायक बनाते जाते थे।
उससे यह समझ में आता है कि जब यह भारत में एक जगह से दूसरी जगह फैल रहे थे तब से उसे जगह पर सबसे पहले बसने वाले होते थे । उनके बाद दूसरे समुदाय के पीछे आते थे दूसरी बात क्योंकि मुंडा जनजाति किसी जगह पर बसने वाले पहले होते थे। इसलिए उसे जगह का नामकरण भी हुए करते थे।
प्रकृति पूजक और प्रकृति प्रेमी होने के वजह से हुए नामकरण भी प्राकृतिक चीजों के आधार पर ही करते थे। जैसे एक जगह का भौगोलिक स्थिति पशुओं पक्षियों पेड़ों और उसे जगह की खासियत के आधार पर ऐसा किया जाता था।
उदाहरण के लिए रांची के डोरंडा क्षेत्र का नाम तुरंग दा गाता हुआ जिसका अर्थ था बहता हुआ पानी। क्योंकि वहां एक छोटी सी नदी बहती थी जो उसे समय के शांत बात में अपनी अपनी की आवाज में गाती हुई प्रतीत होती थी।
इसी तरह कई और जगहें हैं जो वक्त के साथ - साथ अपना असली नाम का स्वरूप एवं मतलब खो रही हैं। हमारे पूर्वजों कहना है कि सिंधु घाटी सभ्याता वासी होने पर ही वहाँ का नामकरण मुंडा भाषा के आधार पर ही किया गया था। मोहनजोदड़ो का वास्तविक नाम मोइंजो दारू है।
मोइंजो एक पेड़ का नाम है जो वहाँ पाया जाता था। दारू का मतलब पेड़ है। इसी तरह हड़प्पा का असली नाम हड़का बा है। हम अनि बूढ़ा ओ वा मतलब बाबा। सिंधु घाटी से होते हुए मुंडा लोग कश्मीर विंध्याचल और गंगा के समतल से होते हुए मध्य प्रदेश फाररखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल उड़ीसा में फैल गए।
कश्मीर का कासोम बार था ! फासोम लंबे घास (जो में पाए जाते हैं) और बोर यानि लेबे घासों का जंगलनामका शुरूआती नाम शानि सॉफ औरअब कासोम बार से कश्मीर बन गया है। वैसे ही विंध्याचल बिंग दोशा था ।
ब्रिंग दोया मतलब रास्ता है कि जबकहा जातायानि साँप जैसा रास्त विंध्याचल की पहाड़ियसे मुंडा लोग गुजर रहे थे तो पहाड़ों के बांच की घाटी टेढ़ी मेढ़ी लगी और उन्हें साँप के तरह -साँप जैसा रास्ताऔर इसीलिए उसका नामकरण बिंग दोया किया गया जो बाद में घिस घिस कर बिंध्याचल हो गया तरह कई और नाम है जो समय के अपना मूल स्वरूप खो चुके हैं।
सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर झारखंड तक कई नदी और स्थान है कई पठार और पर्वत हैं जो झारखंड के हमारे मुंडा जनजाति के इतिहास से गहरा संबंध रखता है। समय के साथ-साथ यह मिटता जा रहा है। मुंडाओं के अतीत सेजुड़ी गहरी सच्चाई...।
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