क्या आप जानते हैं... देश का दूसरा सबसे बड़ा शिवलिंग रांची में है

 

  • राजधानी रांची में आकर्षण का केंद्र है श्री मातंगी महामृत्युंजय नाथ मंदिर का शिवलिंग 
  • जानें कैसे बनी श्री मातंगी महामृत्युंजय नाथ मंदिर की परिकल्पना 
  • दुनिया का दूसरा बड़ा नर्मदेश्वर शिवलिंग- 6 फिट 11 इंच, वजन 2500+ किलो, तैयार होकर अर्घा की ऊंचाई- 1मी, चौड़ाई- 7 फिट 11 इंच, ऊंचाई शिवलिंग की जमीन से 8 फिट
  • आदमकद मां मातंगी की प्रतिमा का निर्माण प्रस्तावित
  • कैसे मिली महामृत्युंजय नाथ और इनकी परिकल्पना  

रामदेव पाण्डेय 

मैं जब अपनी आंख खोला तो हमारे करीब मां भद्रकाली मंदिर ईटखोरी, चतरा देखा। इसे पहले लोग भदुली माई कहते थे। पर यह कौन देवी हैं, स्पष्ट नहीं था। संयोग कि मूर्ति 1968 में चोरी चली गयी। मेरे दादा स्व मुनीश्वर पाण्डेय ने पुराणों की खोजबीन और अनुसंधान कर इस देवी नाम भद्रकाली दिया। यह मंदिर के मार्बल शिलापट्ट पर बरगद पेड़ के नीचे आज भी लिखा है कि मंदिर की जानकारी का स्रोत भद्रकाली महात्म्य के लेखक मुनीश्वर पाण्डेय ने लिखा है।

इसी मंदिर के पास सहस्त्र शिवलिंग की पूजा दादा जी के साथ करते थे, तो मन में एक भावना आती थी कि क्या ऐसे बड़े शिव जी पुन: स्थापित हो सकते हैं। इसी क्रम में सदैव कामाख्या धाम और विंध्येश्वरी धाम जाता रहता था। इस बीच मुझे 2005 के करीब विंधाचल में रामेश्वरम् मंदिर (जहां राम सीता लखन जी ने वनवास के क्रम में अष्टभुजी देवी के करीब विशाल शिवलिंग की स्थापना की थी, यह शिव लिंग मोटा है) में गया और मन ही मन सोचा कि कुछ इसी तरह के शिव लिंग की स्थापना की कोशिश करूंगा। 

इसी तरह का शुक्रेश्वर महादेव का शिवलिंग कामाख्या गौहाटी (किनारा ब्रह्मपुत्र नदी) में देखा, तो मन में पूर्ण संकल्प किया कि झारखंड में अपनी जन्मभूमि के लिए कुछ करना है। अब मन में एक आंदोलन जैसी बात चल रही थी और एक बड़ा मनोरम शिवलिंग का दर्शन हो रहा था। इस दर्शन के कारण मैं दूसरे शिवलिंग को समझ नहीं पा रहा था। हमें डेढ़ फीट (31 किलो) का सफेद कवार्ज शिवलिंग मिला, जो बहुत ही महंगा और दूध की तरफ सफेद था। 

मैं नर्मदेश्वर शिव लिंग ही चाहता था और बड़ा लगभग 4 या 5 फिट का। इसके लिए उज्जैन, ओम्कारेश्वर, नीमच, महेश्वर के व्यापारी के संपर्क में गया और एक सप्ताह तक भटकता रहा। सभी लोगों ने अपना व्यापार बढ़ाने के क्रम में बहुत जानकारी दी। मैं सभी जगहों पर गया। समझा। लोग बोले कि बकावां गांव जाइये। 300 किलोमीटर का चक्कर काट सबकी बात सुना। 

अंत में मैं बकावां गया। पर हर जगह वही व्यापार की बात थी। हमें संतुष्टि नहीं मिल रही थी। यहां बडेÞ-बडेÞ शिवलिंग देखे, जो नर्मदेश्वर न होकर नीमच की खान के पत्थर के बने थे। सभी ने कहा कि 3 फिट से बड़ा नहीं मिलेगा। मैं कही भी जाता, पर रात को उज्जैन या ओम्कारेश्वर ही आकर रूकता। क्यों न मुझे दो सौ किलोमीटर बाइक चलानी पड़े। डर भी लगता था। पर मुझे बार-बार सपने और चिंतन में दिखता कि बड़ा शिव लिंग की पूजा कर रहे हैं। यह मुझे अक्टूबर 2018 में भी दिखा। तब इस बात की खोज में निकला था।

बकावां गांव जहां मिलते हैं नर्मदेश्वर 

बाणलिंग अर्थात नर्मदेश्वर की पूजा करने से घर की गरीबी दूर चली जाती है और धन, ऐश्वर्य एवं मोक्ष, चारों पुरुषार्थ की प्राप्ति होती है। यदि आप लंबे समय से बीमार हैं तो रोजाना महामृत्युंजय मंत्र बोलते हुए शिवलिंग का जलाभिषेक करें, इससे सभी रोगों से मुक्ति मिलती है। श्रावण के महीने में इसकी पूजा विशेष फलदायी मानी गयी है और भगवान शिव की कृपा से हर मुंहमांगी इच्छा पूरी होती है। 

भगवान शंकर ज्ञान के देवता हैं और लिंगाष्टक में कहा गया है : बुद्धिवि वर्धन कारण लिंगम्, अत: शिवलिंग पूजा बुद्धि का वर्धन करती है तथा साधक को अक्षय विद्या प्राप्त हो जाती है। नर्मदेश्वर शिव लिंग में ब्रह्मा, विष्णु, पार्वती और शिव तीनों का वास होता है। इनकी पूजा से सृष्टिकर्ता ब्रह्मा, पालक विष्णु, शक्ति शिवा और संहारक शिव की पूजा एक साथ होती है। 

नया विश्वनाथ मंदिर मीरघाट काशी (स्थापित श्री करपात्री जी महाराज) में स्थापित बाबा विश्वनाथ जी भी नर्मदेश्वर शिव लिंग है। यह भी मधु कलर का है और रांची के महामृत्युंजय नाथ भी नर्मदेश्वर मधु कलर के हैं। दोनों नर्मदेश्वर शिवलिंग और दुनिया का पहला नर्मदेश्वर शिवलिंग ऊंचाई 8 फिट जो इंदौर में स्थित है। बकावां गांव के पास नर्मदा नदी से ही प्राप्त हुआ है। 

इस गांव में मैं 4 जनवरी को आया। पर शाम हो गयी तो फिर भटक गया। भूल गया। सभी कारखानों में गया पर बात नहीं बनी। मैं किसी के यहां रूकना नहीं चाहता था और 70 किमी दूर होटल था, जहां उदास होकर लौट गया। फिर 6 जनवरी 2019 (शनिश्चरी अमावस्या) को ओमकारेश्वर से लगभग 70 किलोमीटर दूर नर्मदा नदी के तट पर स्थित बकावां गांव है जो इंदौर, खंडवा और खरगोन जिला के समीप नर्मदा के किनारे बसा है। यहीं मुझे दूसरे दिन कृष्णा केवट मिला। 

यहीं आसपास नर्मदेश्वर शिव लिंग अद्भुत रंगों में पाया जाता है। फिर इसमें घिसाई कर पत्थर के अंदर के रंग को निकाला जाता है। शिव नर्मदा नदी के पत्थर और शालीग्राम गंडक नदी के पत्थर का ही पूजा जाता है। सीमेंट या अन्य पत्थर के शिवलिंग या किसी मूर्ति की पूजा का प्रावधान शास्त्रीय नहीं है। 

बकावां में उस दिन हम कृष्णा केवट से मिले। बहुत ही सहृदय वह मुझे कई कारखानों पर ले गया। सब जगह वही नीमच का पत्थर था। कई दलाल मिले। बहुत समझाया। पर कृष्णा ने कहा घर चलिये। अब शाम हो जायेगा। चाय पी लीजिये। मैं फिर उदास हताश था। कृष्णा की पत्नी ने चाय पिलाई और इलायची दिया। बोली- आज रात आप रूक जाइये। पर मैं उचित नहीं समझ रहा था। उसी के कहने पर कृष्णा मुझे दौर नदी किनारे छोटे वर्कशॉप की ओर ले गया। सैकड़ों शिवलिंग निर्मित, अर्धनिर्मित सभी आकार के थे। पर 3 फिट से बडेÞ नहीं थे। 

इसी बीच मुझे एक लंबा शिवलिंग का आकार दिखा जो गर्दे से भरा था। मैंने पहली बार देखा, तो ध्यान नहीं दिया। फिर आगे से जाकर वापस लौटा, तो फिर शिवलिंग दिखा। मैंने कृष्णा से पूछा कि यह क्या है? कृष्णा ने कहा- नर्मदेश्वर पिंड आॅरिजनल। मैंने कहा- पक्का। कृष्णा बोला- हां, मैंने पूछा लंबाई- उसने कहा 6 फिट। 

मैंने कहा- इसके मालिक से बात करो। उसने कहा- उससे हमारी बात नहीं होती है। पर नाम उसका नाम हरे राम है। मैंने कहा- फिर उसके सामान की गारंटी तुम कैसे लेते हो? कृष्णा ने कहा- जो सच है वो है। मैं दूसरे व्यक्ति से बात करा दूंगा। कुछ दूर चला, तो हरे राम और अपना कामन मित्र राजेश को बुलाया। परिचय कराया तथा शिवलिंग की खरीद की बात की। 

उसने शिवलिंग की बात सुनते ही कहा कि इसे सालों पहले खर्डी गांव के पास से नर्मदा नदी से हम और हरे राम लाये थे और घटना सुनायी। फिर कृष्णा चला गया और हरे राम को बुलाया गया। उसने आते ही कहा कि खर्डी गांव के पास से तुमने लाया था। अब मैं शुद्धता पर खरा देख रहा था। शिवलिंग को धोया गया जो 6 फिट 11 इंच था। वजन 1100+ किलो। ऊपर मधु कलर का अद्भुत चमकदार। मैंने फोटो खिंचवायी। अब मुझे दक्षिणा तय करनी थी। हरे राम के घर बैठे चाय पिया वो बोला ढाई लाख रुपये। खैर मामला पटा।

 मैं किसी भी तरह से पिछड़ना नहीं चाहता था। पर दूसरी ओर रुपया भगवान नहीं है। पर भगवान भी इसी से हैं। जो हो सब तय हुआ। मन से थक गया था। हरे राम भी आज मेहमानी पर रोक रहा था। मैं किंकर्त्तव्यविमूढ़, थका और जीता हुआ था। अपनी औकात से भारी भरकम रकम और मिलने की सफलता। हर्ष और धन का तनाव दोनों था। अब शिवजी को पाने के लिए कई आर्थिक प्लान की ओर सोच रहा था। 

खैर अब तो कागजात और संकल्प दोनों हो चुका था। बकावां में जहां इसे पहले भी दुनिया का पहला नर्मदेश्वर शिवलिंग 8 फिट मिला था। जो अभी इंदौर में स्थापित है। दूसरे न पर यह झारखंड का शिवलिंग अब तक है। 

कैसे हुआ महामृत्युंजय का नामकरण 

इसी ऊहापोह के दौर में था। तब तक मेरे एक आईएएस मित्र डॉ माधव सिंह भैया का फोन आया। दोनों दंपति का फोन और व्हाट्सएप्प था कि इस कुंडली को देखें और उपाय बतायें। आप कहा हैं? मैंने उन्हें कहा- त्र्यम्बकेश्वर (नासिक) में। जबकि मैं ओमकारेश्वर के करीब था। एक कुंडली थी 1988 की। मेरा सॉफ्टवेयर उज्जैन में था। अब मुझे तत्काल उज्जैन आना था। बकावां से 200 किलोमीटर घने जंगल और घाटी को पार करना था। 

6 जनवरी 2019 की शाम 4 बज चुका था। दिया गया कुंडली रांची के बड़े आइएएस की पत्नी की थी। बुध में शनि का मारकेश था। मैडम दिल्ली के बड़े अस्पताल में आईसीयू में भर्ती थी। मैंने बाबा से कहा कि अब आप मैडम को बचायें। मैंने ग्रंथों के अनुसार जल चढ़ाया और आमंत्रण किया। मैडम 6 जनवरी को अस्वस्थ थी और 12 जनवरी 2019 को दिव्य पुत्र संतान की प्राप्ति हुई, तो आप महामृत्युंजय नाथ कहे जाओगे। मैडम आज प्रसन्न हैं। 

इसी बीच कांके रोड के डी शर्मा जी को ईएनटी की दिक्कत हुई। मैं उज्जैन में ही था। यह 7 जनवरी की बात है। शर्मा जी के परिजन विनय जी फोन किये इनका स्वास्थ्य का कुछ कीजिये। महीनों से बीमार थे और रांची के प्रतिष्ठित डॉ ने कैंसर की संभावना जतायी थी। इससे परिवार और भयभीत था। हमने फोटो भेजकर विनय और विभा दी को कहा- कुछ नहीं होगा। 

पूरी जांच में कैंसर नहीं पाया गया। इस तरह बाबा भोला कई को जीवन देकर अपना नाम खुद महामृत्युंजय नाथ रखने को प्रेरित किये। 6 मार्च 2019 को झारखंड रांची की धरती पर बाबा पधारे। इस बीच रांची के कई जगहों पर बाबा की स्थापना की। बात मन में आयी। तब तक बाबा की रोज पूजा हो इसलिए मनन विद्यालय रांची के अंदर स्थित मंदिर में जुलाई 2019 तक रखा गया, जहां पूजा होती रही। 

इसके बाद डायमंड सिटी ओइना रांची (ईस्टर्न इस्टेट डेवलपर प्रा लि) के संस्थापक संजीव कुमार श्रीवास्तव से बात हुई। इस बीच भादो पूर्णिमा 2019 को बाबा को बैठाया गया। क्योकि बड़ा शिव लिंग होने के कारण पहले स्थापित कर बाद में मंदिर बनाया जायेगा। इसमें शिव सपरिवार और महाविद्या मातंगी देवी की स्थापना का प्रस्ताव है, जो संभवत: 2022 के करीब पूरा हो सकता है। 

  • विशेषता 

महामृत्युंजय नाथ के मंदिर का 24गुणा 24 फिट का गर्भ गृह होगा। इसके साथ छह फिट का परिक्रमा स्थल होगा। मुख्य मंदिर में पूरब, दक्षिण और उत्तर से दरवाजा होगा। आप जिस दरवाजे पर होंगे, तो प्रतिमा आपको जरूर दिखेगी,  जिसमें एक महामृत्युंजय नाथ का मन दिखेंगे।  

  • मंदिर के आश्रम

आश्रम में गृहस्थ महंत के अलावे अन्य पुजारी रहेंगे। इसमें वैदिक संस्कृति के लिए बच्चों का प्रशिक्षण होगा। भगवान का भोग कच्ची पक्की दोनों होगा।  

  • मंदिर की पूजन व्यवस्था  

मंदिर सुबह 6 बजे खुलेगा। 6:30 बजे प्रात: कालीन आरती होगी। दोपहर 12 बजे मंदिर का पट बंद होगा। दोपहर 3:30 बजे मंदिर का पट खुलेगा। शाम 7 बजे संध्या आरती होगी। रात 9 बजे मंदिर का पट बंद हो जायेगा।  

मंदिर में रिहाईशी इलाका लगभग तीस एकड़ में फैला हुआ है। इसमें मंदिर के आगंतुक को देखते हुए मॉल, मार्केट आदि भी मंदिर परिसर में ही होगा। मंदिर परिसर में नवग्रह और सभी सताइस नक्षत्र के पौधे और पेड़ तथा तरह-तरह के फूल के पौधे रहेंगे। 

  • स्थापना 

मेरे मित्र यजमान संजीव श्रीवास्तव और उनकी पत्नी अनु श्रीवास्तव (सीइओ- ईस्टर्न इस्टेट रांची- डायमंड सिटी) ने इरवा के पास इसे स्थापित करने की पेशकश रखी। इस जगह मैं इस संदर्भ में एक जगह गया, जहां निर्देशन स्वप्न या ख्याल में था, तो वह देखकर मैं आश्चर्यचकित हो गया। यहां फलदार बेल, पांकर, नीम,  आम, धतुरा, अकवन आदि के वर्षों पुराने पेड़ तो पहले से तीर्थ जैसा है। जैसा अभी दिख रहा है।

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