टीम एबीएन, रांची। शिव प्रकृति पुरुष हैं। अष्ट भैरव हैं। अष्ट मंगल हैं। शिव अष्टमूर्ति हैं। शिव की प्रकृति आठ रूपों में बंटी है : पृथ्वी, जल, आग, हवा, आकाश, मन, बुद्धि और अंहकार है। इंद्रियां, मन और बुद्धि भौतिक प्रकृति से है। यही आठ वसुधा के समान और सम्मिलित रूप ब्रह्मांड में हैं और जो ब्रह्मांड में हैं।
वह इस मानव शरीर में है, इसलिए मानव शरीर और शिव लिंग को भी पिंड कहा जाता है। मानव शरीर की रचना में आठ प्रकृति है। इसमें पांच उंगलियां और ज्ञान इंद्रियां पांच देवता के प्रतिनिधि हैं। इस प्रकृति के जीव रूप में कामदेव के पांच बाण है : रूप, रस, गंध, स्पर्श और आकाश। जो देवता, गन्धर्व, मनुष्य और पशु-पक्षी सभी जीवों में है।
शिव काम कैलाश को दबाकर बैठे हैं, तो बसहा बैल धर्म को गतिमान रूप में सवारी बनाकर रखे हैं। काम कैलाश पर शिव के अलावा कोई चढ़ भी नहीं सकता है, जहां आज भी ओमकार स्वयं प्रतिध्वनित होती है। जबकि पास ही एवरेस्ट उसे हजार मीटर बड़ी चोटी है। उस पर सैकड़ों पर्वतारोही ध्वज फहराये। शिव ही अमृत और अकाल मृत्यु के कारण हैं।
शिव कामारि होकर भी कुशल गृहस्थ हैं, जो इस पंचबाण को जीत लिया वह कामारि हो गया। वह सत्यम शिवम सुंदरम को प्राप्त कर लिया। गीता में कृष्ण ने भी कहा- मैं देवताओं में शंकर हूं। शिव के पूजन से कृष्ण सहित ब्रह्मांड के सभी देवताओं की पूजा हो जाती है। रूद्र अष्टाध्यायी के वैदिक मंत्र में गणेश, विष्णु लक्ष्मी, इंद्र, सूर्य, रूद्र, सोम, महामृत्युंजय देव, अग्नि, शिव सहित सभी वैदिक देवता की पूजा केवल रुद्राभिषेक करने से प्राप्त होती है।
यह शिव अपने को त्रिदेवों में विभक्त करता है। ब्रह्मा, विष्णु महेश होकर ब्रह्म कहलाता है। यही सत, रज, तम है। यही पिता, कब और वात है। यही दर्शन शास्त्र में इड, इगो और सुपर इगो है। इसलिए दुनिया के जो प्रकृति पूजा है वे शैव है। सनातनी है।
हर व्यक्ति को साल में एक बार शिव का रूद्राभिषेक जरूर करना चाहिए। यही काल है और स्थिति है, जो अमर है, जो अमर होगा। वहीं देवता आपको भी अमर करेगा। शिव ही पूजनीय और वंदनीय हैं। उक्त बातें बरियातू हाउसिंग कॉलोनी स्थित राम-जानकी मंदिर में आयोजित शिवपुराण की कथा में पंडित रामदेव पाण्डेय ने आज कही।
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