एबीएन सेंट्रल डेस्क। भाजपा ने 24 जुलाई को एक भव्य कार्यक्रम के आयोजन में राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण उत्तर प्रदेश में अपने वोट आधार का विस्तार करने के लिए विपक्षी दलों के 18 बड़े नेताओं के नामों की घोषणा की। लोकसभा में 80 सांसद भेजने वाले उत्तर प्रदेश को लेकर भाजपा की स्पेशल रणनीति से बाकी सब चौंक गये। देश और उत्तर प्रदेश में सत्तारुढ़ भगवा पार्टी में बड़े पैमाने पर विपक्षी दिग्गजों के शामिल होने से राजनीतिक जानकारों की भौंहें तन गयी हैं।
लोकसभा चुनाव- 2024 से पहले यूपी में बीजेपी के गेम प्लान का स्पेशल हिस्सा
राजनीति में हर कदम के पीछे कोई बड़ा कारण से होता है। राजनीति के विश्लेषकों ने इसे लोकसभा चुनाव-2024 से पहले अन्य पिछड़ी जाति (डइउ) और अनुसूचित जाति (रउ) के मतदाताओं को लुभाने के लिए बीजेपी के गेम प्लान का हिस्सा बताया है। क्योंकि उत्तर प्रदेश में ये दोनों सामाजिक वर्ग वोट बैंक का सबसे बड़ा ब्लॉक हैं। यह रुझान 17 जुलाई को शुरू हुआ जब सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के प्रमुख ओम प्रकाश राजभर ने अपनी पार्टी के भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए में शामिल होने के फैसले की घोषणा की थी।
केंद्रीय गृह और सहकारिता मंत्री और भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख चुनावी रणनीतिकार अमित शाह से नई दिल्ली में ओमप्रकाश राजभर की मुलाकात के एक दिन बाद यह घटनाक्रम सामने आया था। राजभर ने कुछ महीने पहले ही समाजवादी पार्टी से नाता तोड़ लिया था। सपा के साथ उन्होंने यूपी विधानसभा चुनाव-2022 लड़ा और छह सीटें जीतने में कामयाब रहे थे। राजभर खुद गाजीपुर जिले की जहूराबाद विधानसभा सीट से जीते थे। उन्होंने सपा प्रमुख अखिलेश यादव पर सहयोगियों को महत्व नहीं देने का आरोप लगाया था।
इसके तुरंत बाद, यूपी के पूर्व विधायक दारा सिंह चौहान ने पाला बदल लिया और समाजवादी पार्टी से भाजपा में शामिल हो गए। कुछ ही दिनों में, भाजपा ने फिर से हमला किया और विभिन्न राजनीतिक दलों से लगभग 18 बड़े नेताओं को शामिल करने की घोषणा की। इनमें उत्तर प्रदेश के अपने प्रमुख प्रतिद्वंद्वी सपा से 11, बहुजन समाज पार्टी (इरढ) से पांच, कांग्रेस से एक और राष्ट्रीय लोक दल से एक दिग्गज शामिल है। विपक्षी दलों से भाजपा में आए इन स्पेशल 18 में दो पूर्व सांसद और दो पूर्व मंत्री शामिल हैं।
सबसे खास बात यह है कि साल 2019 के आम चुनाव में वाराणसी सीट पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ सपा की टिकट पर चुनाव लड़ने वाली शालिनी यादव भी भाजपा में शामिल हो गईं। अपने पहले संसदीय चुनाव में शालिनी यादव ने लोकसभा चुनाव-2019 में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ वाराणसी सीट से चुनाव लड़ा था और 4.75 लाख से अधिक वोटों के बड़े अंतर से हार गई थीं। वह 2019 में ही समाजवादी पार्टी में शामिल हुई थीं।
राजभर के आने से भाजपा को गैर-यादव ओबीसी पर पकड़ मजबूत करने में मदद
यूपी के राजनीतिक विश्लेषकों ने इस राजनीतिक बदलावों को भाजपा के अपने ओबीसी और एससी वोट आधार को बढ़ाने की योजना के रूप में चिह्नित किया है। खासकर पूर्वी यूपी में वोट बैंक का यह समूह चुनावों में अक्सर निर्णायक भूमिका निभाते हैं। लखनऊ के भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान विभाग के एचओडी शशिकांत पांडे ने कहा, चूंकि ओमप्रकाश राजभर पाला बदलने वाले पहले व्यक्ति थे, इसलिए राजभर से ही शुरू करते हैं।
पूर्वी यूपी के जिलों में ओबीसी और एससी की आबादी का एक बड़ा हिस्सा होने के कारण राजभर समुदाय अक्सर लगभग दो दर्जन लोकसभा सीटों से चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के लिए निर्णायक कारक की भूमिका निभाता है। राजभर के शामिल होने से भाजपा को गैर-यादव ओबीसी पर अपनी पकड़ मजबूत करने में मदद मिलेगी।
शशिकांत पांडे ने कहा कि भाजपा में नये शामिल होने वालों की सूची में छह ओबीसी नेता और तीन एससी नेता शामिल हैं। सत्यपाल यादव, सुनीता यादव, साहब सिंह सैनी, राजपाल सैनी और सुषमा पटेल ओबीसी वर्ग से हैं जबकि अंशुल वर्मा, जगदीश सोनकर और गुलाब सरोज अनुसूचित जाति वर्ग से हैं। इनमें से कुछ प्रमुख नेताओं की संक्षिप्त प्रोफाइल पर एक नजर डालते हैं।
ओबीसी में राजपाल सैनी ने अपना करियर बीएसपी से शुरू किया, 2002 में विधायक चुने गये और 2010 में राज्यसभा भेजे गये। हालांकि, बाद में राजपाल सैनी राष्ट्रीय लोक दल में शामिल हो गए और सामाजिक न्याय मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में तैनात हुए।
साहब सिंह सैनी दो बार सपा विधायक और अखिलेश यादव सरकार में पूर्व मंत्री थे। वह बीजेपी में शामिल हो गए और यूपी के सहारनपुर में सक्रिय राजनीति में लौटने से पहले 2022 में उत्तराखंड में राष्ट्रीय क्रांतिकारी मोर्चा का गठन किया।
सुषमा पटेल ने अपना करियर बीएसपी से शुरू किया और 2017 में जौनपुर जिले की मुंगरा बादशाहपुर सीट से विधायक चुनी गईं। 2022 में वह एसपी में शामिल हो गईं थी।
इस बीच, जगदीश सोनकर को 2022 के यूपी चुनाव के लिए सपा ने टिकट देने से इनकार कर दिया, जिसके कारण उनके वफादारों ने विरोध प्रदर्शन किया और इस्तीफा दे दिया। इससे पहले उन्होंने 2002 और 2007 में दो बार शाहगंज विधानसभा सीट जीती थी और बाद में 2012 और 2017 में मछलीशहर निर्वाचन क्षेत्र से जीत हासिल की।
2019 तक भाजपा सदस्य रहे अंशुल वर्मा भाजपा के लखनऊ कार्यालय में तैनात एक सुरक्षा गार्ड को अपना इस्तीफा सौंपने के लिए सुर्खियों में आए थे। उस वर्ष आम चुनाव से पहले भाजपा द्वारा टिकट नहीं दिए जाने के बाद वह सपा में शामिल हो गए। वर्मा ने 2014 में भाजपा के लिए हरदोई सीट से लोकसभा चुनाव जीता था।
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