एबीएन सेंट्रल डेस्क। अक्सर सवाल उठाया जाता है कि क्या स्वतंत्रता मिलने के बावजूद देश का कानून उतना संवेदनशील व व्यावहारिक है, जो किसी लोकतांत्रिक देश के लिए अपरिहार्य होना चाहिए। विभिन्न मामलों में कानून की परिभाषा के अंतर्गत तमाम ऐसे व्यवस्थागत अतिक्रमण हैं जिन्हें गंभीर जुर्म की श्रेणी में रखा गया है।
जाने-अनजाने में हुए ऐसे जुर्मों को लेकर जेल की सजा और आर्थिक जुर्माना यानी दोनों लागू होने को लेकर भी सवाल उठाये जाते हैं। सवाल यह भी कि जब जेल हुई है तो आर्थिक दंड क्यों? वहीं दूसरी ओर देश में अंग्रेजों के जमाने के तमाम कानून प्रचलित हैं जो स्वतंत्र देश की व्यवस्था में तार्किक नजर नहीं आते।
राजग सरकार की उस मुहिम की सराहना करनी होगी कि जिसके अंतर्गत उसके नौ साल के कार्यकाल में 1500 ऐसे कानून निरस्त किये गये, जो अमृतकाल तक पहुंचे देश में न्याय की कसौटी में खरे नहीं उतरते थे। दरअसल, तमाम कानून ऐसे थे जो अंग्रेजी राज को स्वतंत्रता सेनानियों के विरोध से संरक्षित करते थे। वहीं दूसरी ओर व्यक्तिगत आजादी पर अंकुश लगाते थे।
इसी दिशा में केंद्र सरकार ने बड़ी पहल की है और केंद्रीय मंत्रिमंडल ने जनविश्वास विधेयक पर मोहर लगा दी है। जिसके अंतर्गत 42 कानूनों में बदलाव किया जायेगा। इनके तहत आने वाले 183 प्रावधानों में बदलाव होगा। दरअसल, इस प्रयास का मकसद अदालतों में मुकदमों का बोझ कम करना, कारोबारी सुगमता बढ़ाना तथा छोटे अपराधों के मामलों में लोगों को जेल जाने से बचाना है।
दरअसल, यह पहल छोटे अपराधों के मामले में कारावास की सजा को खत्म करने का प्रयास है। ऐसे मामलों में सिर्फ आर्थिक दंड ही लगाया जायेगा। गत बुधवार को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने जनविश्वास (प्रावधान संशोधन) विधेयक 2023 को मंजूरी दे दी। दरअसल, इस विधेयक को दिसंबर 2022 में वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने संसद में पेश किया था।
इस बिल को तार्किक बनाने व इससे जुड़ी विसंगतियों को दूर करने के लिए कालांतर संयुक्त संसदीय समिति को भेजा गया था। दरअसल, इस मुद्दे पर गंभीर मंथन के लिए 31 सदस्यीय समिति का गठन विशेष रूप से किया गया। जिसमें विधायी और विधि मामलों से जुड़े विभिन्न मंत्रालयों के अधिकारियों से लंबा विमर्श किया गया।
इतना नहीं, इस मुद्दे पर विभिन्न राज्यों से भी राय ली गई। तदुपरांत, इस वर्ष मार्च में समिति ने अपनी रिपोर्ट दी थी। समिति ने राज्यों को भी ऐसे प्रावधानों में संशोधन के लिए प्रेरित करने की सलाह दी थी। समिति का मानना था कि केंद्र राज्य सरकारों व केंद्र शासित प्रदेशों को प्रेरित करे कि वे जनविश्वास विधेयक की तर्ज पर छोटे जुर्मों को अपराध की श्रेणी से बाहर रखने को कानूनी उपाय करें।
दरअसल, विधेयक के प्रावधानों के अनुसार, आर्थिक दंड का निर्धारण गलती की गंभीरता के अनुसार होना चाहिए। गलती की पुनरावृत्ति पर जुमार्ना राशि में वृद्धि की जायेगी। दरअसल, इस विधेयक में अंग्रेजी शासन के समय से चले आ रहे अनेक ऐसे कानूनों में कारावास की सजा समाप्त करने की सिफारिश है, जो मौजूदा दौर में तार्किक व न्याय की कसौटी पर खरे नहीं उतरते।
ब्रिटिश कालीन जिन कानूनों में संशोधन होना है उनमें भारतीय डाकघर अधिनियम 1898, कृषि उपज (ग्रेडिंग और मार्किंग) अधिनियम 1937, औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम 1940, सार्वजनिक ऋण अधिनियम 1944 आदि शामिल हैं। दरअसल, विधेयक में अपराध की गंभीरता के आधार पर आर्थिक दंड को तर्कसंगत बनाने और भरोसे पर आधारित शासन को बढ़ावा देने का प्रस्ताव है।
साथ ही इसमें विभिन्न अपराधों के लिये जुमार्ने में समीक्षा का भी प्रावधान है, हर तीन साल में जुमार्ने की राशि दस फीसदी बढ़ा दी जायेगी। वहीं ब्रिटिश शासन को संरक्षण देने वाले भारतीय डाकघर अधिनियम 1898 के सभी अपराधों को खत्म कर दिया जायेगा।
दरअसल, कोशिश यही है कि छोटे अपराध के लिये बड़ी सजा न मिले और आर्थिक दंड को सुधारात्मक दृष्टि से उपयोग में लाया जाये। सरकार का कहना है कि यह प्रयास कारोबार को सुगम बनाने और नागरिकों के दैनिक कामकाज को आसान बनाने में सहायक होगा। निस्संदेह, केंद्र सरकार की इस रचनात्मक पहल का स्वागत किया जाना चाहिए।
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