धूमकेतु के चारों ओर मिला पानी

 

  • नासा के जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप ने की चौंकाने वाली खोज

एबीएन नॉलेज डेस्क। नासा के जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप ने सौरमंडल में पानी के भंडार का पता लगाया है। वैज्ञानिकों को पहली बार धूमकेतु के आस-पास जल वाष्प  के प्रमाण मिले हैं। लंबी जद्दोजहद के बाद वैज्ञानिकों को यह सफलता मिली है। वैज्ञानिकों का कहना है जल वाष्प वाला यह स्थल मंगल और बृहस्पति के बीचोंबीच स्थित है।

गौरतलब है कि 2005 में कैसिनी नामक नासा के एक अंतरिक्ष यान ने चंद्रमा की सतह पर बर्फीले कणों की खोज की थी लेकिन जेडब्ल्यूएसटी की ताजा रिपोर्ट से अब पता चलता है कि अब इसकी मात्रा पहले की तुलना में अधिक हो गयी है। जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप की रिपोर्ट से वैज्ञानिकों का उत्साह बढ़ गया है।

नेचर पत्रिका में प्रकाशित हुई रिपोर्ट
जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप दुनिया की सबसे बड़ी दूरबीन है। नासा ने इसे दिसंबर 2021 में अंतरिक्ष में भेजा था। इस दूरबीन ने धूमकेतु और उसके आस-पास की दुनिया की गहन छानबीन की है।

इस खोजबीन के तहत ही वेब स्पेस टेलीस्कोप को धूमकेतु के आसपास जल वाष्प मिले हैं। इसे बड़ी सफलता के तौर पर माना जा रहा है। वास्तव में पहली बार सौरमंडल में गैस पायी गयी है। यह पानी के भंडार होने की ओर इशारा करता है। अब वेब स्पेस टेलीस्कोप की रिपोर्ट के आधार पर वैज्ञानिक लेखकों ने बताया है कि इससे सौरमंडल में पानी के स्रोतों को विस्तार से समझने मंन मदद मिल सकती है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक इससे दुनिया भर के वैज्ञानिकों को अन्य ग्रह प्रणालियों के अध्ययन में भी काफी सहायता मिलेगी। इससे अंतरिक्ष के कई रहस्य सुलझ सकते हैं। इससे ये भी जाना जा सकेगा कि पृथ्वी जैसे ग्रह से सौरमंडल में मिले जल स्रोत का क्या रिश्ता है?

जल वाष्प का किया जा सकता है संरक्षण
नासा के वैज्ञानिकों ने वेब स्पेस टेलीस्कोप की रिपोर्ट के आधार पर भविष्य की कई योजनाओं और अनुमानों की ओर भी ईशारा किया है।

वैज्ञानिकों ने बताया है कि इससे साबित होता है कि पानी की बर्फ को बृहस्पति की कक्षा के अंदर संरक्षित किया जा सकता है। अगर ऐसा होगा तो काफी अहम हो सकता है।
हालांकि वैज्ञानिकों ने यह भी कहा है कि जिस धूमकेतु के आस पास जल वाष्प मिले हैं, वे सामान्य धूमकेतु नहीं हैं। उसे 238पी/रीड नाम दिया गया है।

वैसे वैज्ञानिकों को दो बातों पर आश्चर्य हुआ कि यह अन्य धूमकेतुओं के उलट है क्योंकि इसमें कोई कार्बन डाइऑक्साइड नहीं है। दूसरे – फिलहाल यह नहीं बताया जा सकता कि यहां पानी आखिर कैसे आया।

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