जमशेदपुर (अन्नू रंजन)। मंदिर आराधना और पूजा-अर्चना की वह जगह है जहां देवताओं का निवास का स्थान माना जाता है। वह जगह लोगों की आस्था और विश्वास से जुड़ा होता है। भारत में कई ऐसे मंदिर हैं जिसका अपना एक विशेष महत्व है। उन मंदिरों का इतिहास भी बहुत पुराना है। कुछ इसी तरह का झारखंड के सरायकेला जिला अंतर्गत गम्हरिया क्षेत्र में भी एक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है, जो क्षेत्र के लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र है और इसका अपना एक अलग ही इतिहास है। यह मंदिर वर्षों से गांव की चौहद्दी के बाहर अवस्थित है, जिसे लोग घोड़ा बाबा मंदिर के नाम से जानते हैं। इस मंदिर के प्रति लोगों की आस्था ही इसे खास बनाती है। गम्हरिया और आदित्यपुर के बीच औद्योगिक क्षेत्र से सटा घोड़ा बाबा मंदिर शहर के लोकप्रिय मंदिरों में एक है। मंदिर का इतिहास लगभग 350 साल पुराना है। सरायकेला के प्रथम राजा ने इस मंदिर की स्थापना कराई थी। यूं तो इस मंदिर का देव नाम बड़ामथान है, जो घोड़ा बाबा मंदिर के नाम से विख्यात है। राजा ने इसकी स्थापना मुख्य रूप से बंगाली समाज के लिए की थी, जहां वे अपने देव की आराधना या पूजा कर सकते थे। किंतु वर्तमान में सभी संप्रदाय के लोगों की आस्था इससे जुड़ गई है। यही कारण है कि अब यहां हर समाज के लोग प्रतिदिन पूजा अर्चना के लिए जुटते हैं। मान्यता है कि यहां मनोकामना पूर्ति के लिए जो लोग प्रार्थना करने आते हैं। सच्चे मन से आराधना करने वालों की हर मनोवांछित मुरादें पूरी होती हैं। इस मंदिर की लोकप्रियता और इसके प्रति लोगों की आस्था, मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ बयां करती है। झारखंड के अलावा अन्य कई राज्यों में ऐसे मंदिर हैं और घोड़े की पूजा की जाती है। इस मंदिर में दो घोड़ों की प्रतिमाएं हैं, जिसमें एक काले जबकि दूसरा सफेद रंग का घोड़ा है। बताया जाता है कि काला घोड़ा भगवान कृष्ण जबकि सफेद घोड़ा उनके भाई बलराम का प्रतीक है। वहीं, साथ में एक बंदर की भी प्रतिमा स्थापित है जो उनकी सुरक्षा का प्रतीक है। इसके अलावा मंदिर के बाहरी भाग में एक वटवृक्ष है जो बोड़ाम बाबा (ग्राम देवता) का निवास स्थान माना जाता है। बताया जाता है कि यह वटवृक्ष 100 वर्षों से भी अधिक समय से वहीं स्थित है। वृक्ष के चारों ओर एक गोल घेरा बना हुआ है जिसके भीतर आम श्रद्धालुओं का प्रवेश वर्जित है। पूरा मंदिर परिसर करीब 13 एकड़ जमीन में फैला हुआ है। लोगों की आस्था है कि मन्नत पूरी होने पर लोग यहां घोड़े, हाथी और बंदर की मिट्टी की मूर्ति चढ़ाते हैं। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां ब्राह्मण पूजा नहीं करते बल्कि केवल कुम्हकार समाज के लोग ही मंदिर के पुजारी होते हैं जिन्हें देवरी (पंडित) के नाम से जाना जाता है। मंदिर कमेटी के अध्यक्ष मनोरंजन बेज ने बताया कि भगवान बलराम ब्रह्मचर्य धर्म का पालन करते थे। इसलिए कुंवारी कन्याएं ही यहां का प्रसाद ग्रहण कर सकती हैं। इस मंदिर में चढ़ाया गया प्रसाद भी शादीशुदा महिलाओं को ग्रहण करने की मनाही होती है। प्रतिवर्ष मकर संक्रांति (टुसु पर्व) के दूसरे दिन नया साल प्रारंभ होने पर इस मंदिर में भव्य पूजनोत्सव सह मेला का आयोजन किया जाता है। इस पूजनोत्सव में बंगाली संप्रदाय के अलावा सभी धर्म व संप्रदाय को लोग भाग लेते हैं। इस पूजनोत्सव में आसपास के क्षेत्रों से हजारों लोगों की भीड़ जुटती है जो पूजा अर्चना के साथ साथ मेले का भी जमकर लुत्फ उठाते हैं। आगंतुक श्रद्धालु सबसे पहले घोड़ा बाबा मंदिर में पूजा पाठ कर अनाज का पहला भोग चढ़ाते हैं। इसके बाद ही अपने खेतों का नया अन्न ग्रहण कर नववर्ष की शुरुआत करते हैं। समय के साथ जैसे ही लोगों की आस्था इस मंदिर के प्रति बढ़ रही है, मेले व पूजनोत्सव में श्रद्धालुओं के जमा होने का सिलसिला भी बढ़ रहा है। इस कारण इसकी प्रसिद्धि भी बढ़ रही है।
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