एबीएन एडिटोरियल डेस्क। पहले टेपरिकॉर्डर में लोग फिल्मों के डायलॉग सुना करते थे। शोले, मुगले आजम, मजदूर जैसी फिल्मों के डायलॉग खूब चले। कुछ फिल्मों के डायलॉग दो कैसेट में आते थे। वोल्युम1-2 करके।मैने भी बचपन में मुगले आजम के डायलॉग कैसेट खूब बजाये हैं।
उसकी शुरुआत धीर गंभीर आवाज में ऐसे होती थी... मैं हिंदूस्तान हूं... फिल्म में अकबर को शहंशाह , महाबली और सलीम को साहब ए आलम संबोधित किया गया है। तब की बेवकूफी ऐसी कि दो घंटे डायलॉग सुनते और इंतजार कि हां अब ये वाला गाना बजेगा...
फिर बजता... हमें काश तुमसे मोहब्बत न होती?
फिर कुछ मिनट खालिस उर्दू में अनारकली के लिये अकबर और सलीम में फालतू की किचकिच के बाद गाना बजता... तेरी महफिल में किस्मत आजमा कर हम भी देखेंगे।मार्के की बात ये थी कि पूरे डायलॉग को सुनने के बावजूद मेरा बाल मन ये न जान पाया था कि इस लड़ाई में शहंशाह जीता कि साहब ए आलम?
एक बार मैने अपने पापा से पूछा कि पापा अंत में किसकी जीत हुई? पापा ने कुछ गोल मोल सा बता दिया था कि सलीम मरने से बच गया था क्योंकि तोप के नाल को किसी ने ऊपर उठा दिया और अनारकली को दीवार में चुनवा देने के नाम पर सुरंग के रास्ते भारत से बाहर भेज दिया गया और सलीम को बता दिया गया कि अनार कली दीवार में चुनवा कर मुआ दी गयी। लेकिन मेरी उत्सुकता बनी रही। बाद में फिल्म देख कर ये पता चला कि पूरी फिल्म सलीम के एक नाचने वाली दाई अनारकली के प्यार के इर्द गिर्द फैंटेसी पर बनी थी।
लेकिन फिल्म के संवाद और स्कूल के इतिहास के किताब को पढ़ने का दिमाग पर गहरा मानसिक असर हुआ। मैं लंबे समय तक भारतीय इतिहास को सिर्फ मुगलों का इतिहास ही समझ बैठा। मेरी बाबर, हुमायू, अकबर, जहांगीर के प्रति सिंपैथी थी। उन स्कूली किताबों में अकबर की तस्वीर के नीचे कैप्शन में "अकबर महान" लिखा होता था। अकबर से युद्ध में हेमू के आंख में तीर लगकर मरने के वाकये को पढकर मैं खुश होता था। एक बार गांव में दशहरे में नाटक खेला गया "राणा संग्राम" उसमें भी मेरी इच्छा बाबर को जीतते देखने की ही थी।
अकबर के बचपन के बारे में पढ कर लगता था कि बेचारा टुअर था। उसका बाप हुमायूं तो सीढियों से गिर कर मर गया था और दस बारह वर्ष की उम्र में ही गद्दी पर बैठना पड़ा था।
मेरी छोटी बहन ने आर्ट्स लिया था। मैने साइंस से आनर्स करने के बाद उसके इतिहास के पूरे किताब को पढ़ा। तब कुछ कुछ अहसास कि मैं अब तक सिर्फ मुगलों के इतिहास को ही भारत का इतिहास समझे बैठा था।
दरअसल, स्कूली किताबों और बौलीवूड की फिल्मों ने मुगलों को लेकर हमें बचपन में ब्रेनवाश किया था। समय के साथ हमें भान हुआ कि बाबर, औरंगजेब ने क्या किया और मुगलों का काल ही पूरा भारतीय इतिहास नहीं बल्कि वह एक अध्याय भर है। तब स्कूली इतिहास के किताब में कहीं ये नहीं पढ़ा कि औरंगजेब ने हिंदुओं पर कितने कर लगाये, कितने मंदिर ढहाये। वैसे ही टीपू को भी पढ़ाया गया।
अभी एक सूचना है कि यूपी के स्कूली किताबों से मुगलों का इतिहास घटाया जायेगा। यानि अब ढाई सौ साल का इतिहास एक सामान्य अध्याय की तरह ही होगा। ठीक ही है। अब हर सच्चाई को किताबों में शामिल करना चाहिए। हमलावरों की सही तस्वीर, यहां के शासकों के हार जीत का भी सही विवरण हो, धर्म, विध्वंस, प्रतिकार और उन शासकों का भी विस्तृत इतिहास होना जरूरी है जो मुगलों से पहले भी थे बाद भी। वर्ना अब तक तो यही पढ़ते आये हैं कि भारत का इतिहास मने सिर्फ मुगल काल। बाकी सब कल्पनाएं हैं।
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