पंचसूतक क्या है?...

 

पंडित निरंजन शास्त्री

एबीएन सोशल डेस्क। धर्मशास्‍त्रों में जनन, मरण, रज, उच्छिष्‍ठ तथा जाति से पांच प्रकार के सूतक माने गये हैं, अर्थात् घर में किसी का जन्म या मृत्यु होने पर, घर की किसी स्‍त्री के रजस्वला होने पर सूतक की प्राप्‍ति होती है। अतः इस सूतक के समय उस घर में पूजा आदि वैदिक कर्मों का निषेध किया गया है। 

उसी प्रकार उच्छिष्‍ठ का ग्रहण तथा कुछ विशिष्‍ट जाति के लोगों के साथ संपर्क न करने का भी विधान है। किंतु वीरशैव आचार्य एवं संतों ने विशेष परिस्थितियों में उपर्युक्‍त सूतकों को स्वीकार नहीं किया है, जैसे कि इष्‍टलिंग का धारण तथा उसकी पूजा के लिए जनन, मरण और रज इन तीन प्रकार के सूतकों की प्रवृत्‍ति नहीं होती। इसी प्रकार पादोदक और प्रसाद के सेवन के प्रसंग में उच्छिष्‍ठ-सूतक को भी नहीं माना जाता। 

इसका तात्पर्य यह है कि वीरशैव-धर्म में दीक्षा के समय गुरु अपने शिष्य को इष्‍टलिंग देता है और उसे आमरण शरीर पर धारण करने का आदेश करता है। यह दीक्षा स्‍त्री तथा पुरुषों के लिए समान रूप से होती है। दीक्षा-संपन्‍न स्‍त्री यदि रजस्वला अथवा प्रसूता होती है, तो उस समय उस स्‍त्री को इष्‍टलिंग की पूजा करने का अधिकार है या नहीं? 

यह शंका होने पर वीरशैव आचार्य ने इष्‍टलिंग धारण करने वाली स्‍त्री को इष्‍टलिंग की पूजा का अधिकार प्रदान किया है। जैसे पौण्डरीक आदि दीर्घकालीन सत्रों का संकल्प करके त्याग करते समय यजमान की पत्‍नी यदि रजस्वला हो जाती है, तो भी वह स्‍नान करके गीला वस्‍त्र पहनकर पुन: याग में सम्मिलित होती है। उसी प्रकार वीरशैव धर्म में दीक्षित स्‍त्री रजस्वला या प्रसूता होने पर भी उसी दिन स्‍नान एवं गुरु के चरणोदक का प्रोक्षण करके शुद्‍ध होकर अपने नित्यकर्म इष्‍टलिंग की पूजा करने की अधिकारी होती है। 

इष्‍टलिंग की पूजा के अतिरिक्‍त पाक आदि अन्य कार्यों के लिए वीरशैव धर्म में भी सूतक माना जाता है। जैसे हस्तस्पर्श के अयोग्य होने पर भी जिह्वा मंत्रोच्‍चारण के लिए योग्य है, उसी प्रकार रजस्वला या प्रसूता स्‍त्री पाक आदि अन्य लौकिक कर्म करने के लिए अयोग्य और अपवित्र होने पर भी इष्‍टलिंग के धारण एवं उसकी पूजा के लिए वह अग्‍नि, रवि तथा वायु के समान सदा पवित्र रहती है। 

घर में किसी की मृत्यु होती है, तो उस घर के लोग भी शव संस्कार के बाद स्‍नान एवं गुरु के चरणोदक के प्रोक्षण से घर को शुद्‍ध करके अपने अपने इष्‍टलिंग पूजा रूप नित्यकर्म को बिना किसी बाधा के यथावत् अवश्‍य पूरा करते हैं। अतः वीरशैवों को इष्‍टलिंग की पूजा में मरणसूतक भी नहीं लगता। (लेखक झारखंड की राजधानी रांची के प्रख्यात ज्योतिर्विद हैं। उनका सम्पर्क नम्बर 8434745454 है।)

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